Thursday, 28 March 2013

अजनबी बनके मैं तुमसे रहुं सदा


अजनबी बनने के लिए अक्सर ईमानदारी का सहारा लेता हूं । खुद से थोड़ी सी बेवफाई और ढ़ेर सारी उम्मीद, उम्मीद इस बात की कि शायद ईमानदारी से निभा रहा अजनबीपन खत्म होगा कभी । आप सब को नज़र-ए-रौशन कर रहा हूं इसी गूथ्थम-गूथ्थी से उपज़े शब्दों को...।



मुझसे उम्मीद तू कर मेरे दोस्त
अजनबी बनके मैं तुमसे रहुं सदा

इतना आसान नहीं होगा मेरे लिए
फिर भी...
कर वादा कि ...
मेरे परेशां वक्त में भी,
तू मुझसे ना मिलेगा कभी

अचानक से अजनबी बनना
बहुत मुश्किल है...
पर तेरे ख़्वाहिश को जिंदा रखना
मेरी चाहत है...

लिख के अपनी बातों को मिटा सकता हूं
कह कर अपनी बातों को दोहरा सकता हूं
लेकिन वो बात ही...
क्यूं कहूं तुमसे
जिसमें लिखने की गुंजाइश हो
जिसमें कहने की जरूरत हो
और....
ये तभी मुमकिन है
जब...
हम इतने अजनबी बने कि
मेरे चौराहे पर खड़े होने से
तुम अपना एक रास्ता बदल दो

मुझसे उम्मीद तू कर मेरे दोस्त
अजनबी बनके मैं तुमसे रहुं सदा

शाम की धूप
जो रात की आगंन में ना खिलता हो कभी
रात का चांद
जो सुबहों की रोशनी से ना मिलता हो कभी
मेरे अजनबी-पन पर भी ये इनाय़त हो
कि हिज़्र के लम़्हें मेरे हो
और ख़्वाब का आइना हो उसका

इतना आसान नहीं होगा मेरे लिए
फिर भी...
टूटते तारों से भी लोग उम्मीद करते हैं

तू मुझसे भी उम्मीद कर मेरे दोस्त
अजनबी बनके मैं तुमसे रहुं सदा












Friday, 15 March 2013

आगरा के कुछ अनछुए पहलु


मेरे जेहन में हमेशा ये रहता था कि ताज की वजह से आगरावासियों की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई होगी, 

लेकिन जमीनी स्तर पर हकीकत इससे काफी परे है । वहां के एक रिक्सेवाले ने बताया आगरा का 

समाजशास्त्र ।वह कहता है साहब ताजमहल आगरा के लोगों के लिए हमेशा से शोषण का कारखाना रहा है । 

राजा के तानाशाही वर्ताव ने ताजमहल के कारीगरों पर जो जुल्म किए हैं वो तो जग जाहिर है, आपने भी 

किताब में पढ़ी होगी, लेकिन आज के ये मुर्ति वाली माता (मायादेवी) और लेपटॉप वाले बाबा (अखिलेश 

यादव) ने भी कम जुल्म नहीं ढ़ाये हैं । ताज की खूबसुरती ने वहां के पारंपरिक रोजगार (जूता-चप्पल 

निर्माण) को काफी प्रभावित किया है । सरकार ने खूबसुरती के नाम पर आगरा से सभी चमड़ा कारखाना 

को बंद करा दिया । यहां पर संसाधन होने के बावजूद भी कोई नये कारखाना की बात नहीं कर सकता है । 

ये बेरोजगारी ताज की देन है । ताजमहल शानो-शौकत, रुतबा, की बात है, लेकिन हम तो गरीब हैं, ना ही 

रुतबा है, ना ही शानो-शौकत । इसलिए रोज जलिल होते हैं, कभी अपने देश के लोगों के सामने तो कभी 

फिरंगियों के सामने । साहब सरकार का ताजमहल पर इतना ताम-झाम होता है कि यहां की जनता 

परेशान रहते हैं । आपलोगों को तो लगता है कि आपकी वजह से (ताज-पर्यटक) यहां के लोगों का रोजी 

रोटी चलता है । लेकिन इसमे सच्चाई कम है । हम दिल्ली के जितने नजदिक हैं उस हिसाब से हमारी 

प्रगति नही हूई है, वजह है ताज । नहीं तो हम भी नोयडा, गुड़गांव की तरह डेवलोप हो गये होते । आखिर 

हमसे मेहनती तो नहीं है वहां के लोग । ताजमहल की बुनियाद ने आगरा के आसमान को हड़्ड़प लिया है । 

और क्या बताउं साहब आपको किताब लिखनी हो तो बताना हमने सुना है, ऐसे ही बातों को लिखकर लोग 

महान लेखक बन जाते हैं ।