तुम्हारी आंखों में ना जाने कितने
रास्तें हैं
जब भी मैं इन आंखों को देखता हूं
भटक सा जाता हूं
कभी सोचता हूं...
वो जो रौशन रास्तें हैं,
जो इन आंखों के किनारे-किनारे
तुम्हारे दिल तक का सफर तय करते हैं
पर, मैं भी सफर कर के देखूं क्या ?
लेकिन डरता हूं...
दिल के तुम्हारे उस चौराहे से
जहां पर रास्ते खत्म होते हैं
और एक पतली सी पगडंडी आती है
तुम्हें पता है...
ये पगडंडी इतनी पतली है कि
मेरा जिस्म इसमें समा भी नहीं सकता
यहां से सिर्फ, मैं अपनी दिल की धड़कनों
को
तुम्हारे दिल तक भेज सकता हूं
लेकिन...क्या तुम्हारा दिल …
मेरी धड़कनों की आवाज को सुन सकता है
जो पगडंडियों के रास्ते तुम्हारे दिल तक
पहुंचा है
है ना अजीब सवाल...
ये रास्तें भी तो अजीब है
जहां मैं अपनी धड़कनों को छोड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा
और तुम उस आवाज को नहीं सुन पा रही हो...
जो मेरे दिल में धड़कनें बन के, धक-धक
कर रही हैं ।