Monday, 28 June 2010

हम चले कॉलेज जब

इक तमन्ना ले के निकले
हम चले कॉलेज जब
क्या पता था दिल लुटेगा
हम चले कॉलेज जाब

चॉद रौशन हुआ
हम चले कॉलेज जब
कुछ मिला,कुछ मिल गया
हम चले कॉलेज जब

बेफ्रिक, बेशबरी का आलम
और एहसासों का दौर
कितने ख्वाबों का सफर था
हम चले कॉलेज जब

सामने आये जो तुम
हम सभंल पाये नही
खो गया शायद था कुछ
हम चले कॉलेज जब

दास्तां तो थी अधूरी
जाने कितने कारवां के
बस सफर बढ़ने लगी थी
हम चले कॉलेज जब

दिप का अगर नाम लेलू
बदनामी रौशन की होगी
लौ बन के जल लिये
हम चले कॉलेज जब

लाइब्रेरी भी सुना हुआ था
खाली-खाली लग रहा था
नजरो में कोइ बस चुका था
हम चले कॉलेज जब

साथ दोस्तो का रहता
तन्हा-तन्हा फिर क्यूं लगता
ऐसी हालत पहली दफा था
हम चले कॉलेज जब

घर से आया सोच के
पढ़ना है जी-जान से
जान से ही जी लगा था
हम चले कॉलेज जब

कुछ चुनीन्दे है फ़साने
ख्वाब और मेरे दरमिंया के
यूं ही नही लिख दिया हुं
हम चले कॉलेज जब  

इक तमन्ना ले के निकले
हम चले कॉलेज जब
क्या पता था दिल लुटेगा
हम चले कॉलेज जाब

Saturday, 19 June 2010

रावण को बिहार नसीब नही...

बिहार की राजनीति को पुरा भारत जानता है । केन्द्रीय सरकार खासकर बिहार के राजनीति को बड़े नजदीक से लेती है । आजादी के 6 दशक से लेकर अभि तक बिहार के राजनीति को केन्द्र की राजनीति से जोड़कर देखा जाता रहा है । ऐसा हो भी क्यूं ना..इस राज्य को राजनीति का आखाड़ा माना जाता है । लेकिन क्या वज़ह ऐसा रहा कि राजनीति में अपना स्थान रखने वाला बिहार कभी किसी के लिए बाजार नही बन सका । बाजार की दूर्दशा ने ही बिहार को कभी कॉरपोरेट राज्य नही बनने दिया । एक जमाने में जब झारखंड साथ हुआ करता था तो बिहार के बाजार को सिर्फ यह कह कर नाकार दिया जाता था कि कारखाना, मजदुरी के लिए होती है और मजदूर कभी बाजार नही बना सकते । शायद यही धारणा अभि तक बनी हुइ । बिहार के लोगो को रावण देखने का मौका नही मिल पाया है,या यूं कहे बिहार के लोगो को रावण दिखाना ही नही था । इसकी वजह साफ है बाजार ... बिहार में मनीरत्नम ने रावण रीलीज नही की....कोई जानना नही चाहा की ऐसा मनीरत्नम ने क्यूं किया । लेकिन एक बात जो निकल के सामने आई वोहै बिहार में सिनेमा का बाजार .... सभी जानते है कि बिहार और उत्तर प्रदेश में ही सबसे ज्यादा सिनेमा देखी जाती है । ऐसे में बिहार में रावण का रीलीज ना होना बिहार के सिनेमा घर और वहां के टिकट के रेट से संबंध रखता है । 10,20,या 30 रुपये में बिहार में आसानी से कोई भी नई सिनेमा को रीलीज के दिन ही सिनेमाघर में देखा जा सकता है । मनीरत्नम के लिहाज से रावण को 150 से 1500 वाले दर्शक की दरकार थी । जो उन्हें बिहार में नही मिल सकता था । इसलिए रावण को बिहार में रीलीज नही की गई । लेकिन जिस तरह से रावण को मुंह की खानी पड़ी उससे तो अब बिहार के वो दर्शक भी नही मिलेगें जिसे मनीरत्नम बाजार की श्रेणी में गिनते ही नही ।

Thursday, 17 June 2010

रावण की एंट्री



मनीरत्नम की रावण इस कलयुगी रामायण में कितना सफल होगा । ये तो कल १८ जुन के रीलिज के बाद ही पता चलेगा । लेकिन एक बाद तो ये साफ हो गया है कि रावण में वो नयाब चीज देखने को मिल सकता है जिसके लिए मनीरत्नम जाने जाते हैं । इस से पहले मनीरत्नम की आई फिल्म गुरु सुपरहिट रही थी । और सबसे मजेदार बात उस फिल्म ये थी कि अभिषेक उस फिल्म में अपने पुरे जीवन को जीते हैं । एक कॉरपोरेटर के पुरे समझ को मनीरत्नम ही भाव और भाषा में उतार सकते थे । बहरहाल रावण आने वाला है उत्पात मचाने नही वल्की मनोरंजन करने.....

Saturday, 12 June 2010

विज्ञापन पर राजनीति


विज्ञापन विवाद इस बार बिहार के राजनीति में तहलका मचा रहा है । बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का एक साथ विज्ञापन में नज़र आना बिहार के राजनीति में भुचाल मचा दिया है । हलांकि बिहार में भाजपा, जदयू गठबंधन सरकार है लेकिन हाल ही में आने वाला बिहार विधान सभा चुनाव इस लिहाज से ज्यादा महत्वपुर्ण है कि राजनीति की कौन सी दिशा चुना जाए । नीतीश कुमार हमेशा अपने छवी को एक शांतचित रुप देते आये हैं । लेकिन रात्रिभोज को रद्द करना और विज्ञापन पे कारवाई का फरमान साफ करता है कि वो किस कदर बिहार के चुनाव को लेते हैं । एक ओर जहां नीतीश को सबसे सफल मुख्यमंत्री माना जाता है वहीं नरेन्द्र मोदी गुजरात के विकास का सारा ठिकरा अपने उपर बाधते है । हलांकि नरेन्द्र मोदी आज जिस तरह से बिहारीयों का गुनगान कर रहें थे, उस से तो साफ होता है कि भाजपा अपनी स्थिती ओडिशा की राजनीति की तरह नही करना चाहता है । बहरहाल जिस तरह से राजनीति में विवाद परचार का साधन बनता जा रहा है । तो आने वाला बिहार चुनाल और कई तरह के विवाद को झेल सकता है । अब देखना ये है कि विपक्षी दल इस का कुछ फायदा उठाते है या फिर वो भी इसी तरह के राजनीति में शामिल हो जाते हैं ।

Friday, 11 June 2010

फुटबॉल विश्वकप के आगोश में सिमटा भारत


भारत ईक बार फिर फुटबॉल विश्वकप के आगोश में सिमटा जा रहा है। मीडिया जिस तरह से इस खेल का कवरेज कर रही है, उससे तो लगता है कि भारतीय टीम भी खेल के इस महाकुभं में शिरकत करने वाला है । लोगो का उत्साह और बाजार के रुप में आया ये एक महिने का खेल भारत के उस वर्ग का परचार कर रहा जिसे लोग इंडिया पुकरते हैं । टीवी पे फुटबॉल का खुमार शायद टीआरपी के रफ्तार को कायम रखने के लिए किया जा रहा है । लेकिन टीआरपी के आड़ में बाजार के भागीदारी को नकारा नही जा सकता । शायद यही वज़ह है कि फुटबॉल के खेल में १३३वें स्थान पे रहने वाला भारत इस खेल का कवरेज इतना बढ़-चढ़ के कर रहा है । अभी हाल ही से संपन्न हुआ हॉकी विश्वकप किसी को याद भी नही होगा, वज़ह दो है, पहला इस खेल का बाजार से दूरी और दूसरा सरकार का उदासीपन । कभी हॉकी में सर्वोच्य शिखर पर रहने वाला भारत आज दूसरे राउंड तक भी नही पहुंच पाती है । हम हमेशा मीडिया के सिरे ठेकरा बांध देते है और सरकार को इसका लाभ भी मिल जाता है । सरकार अगर राजनीति तक ही सिमित रहती है तो देश के सर्वांगिक विकास की कल्पना नही की जा सकती है । लेकिन ये इस देश की विडंबना ही है कि यहां हर चीजो पे जमके राजनीति की जाती है । आई पी एल पे हुइ राजनीति क्रिकेट के खेल को जहां शर्मशार करता है, वहीं सरकार के नीति का खुलासा भी साफ तरह से देखा जा सकता है ।फुटबॉल का ब्यार से भारतीय को बहुत कुछ सिखने की जरुरत है ।
खासकर भारत के सरकार को तो जरुर सोचना चाहिए कि आखिर वो कौन सी स्थिती है जिस कारण भारतीय फुटबॉल हाशिये पे है । खैर फुटबॉल के विश्वकप के बहाने ही अगर हम फुटबॉल से जुड़ पाते है तो भी ये फुटबॉल इंडिया के लिए अच्छा ही होगा ।

Tuesday, 8 June 2010

न्याय का अन्याय



यूनियन कार्बाइड के पूर्व प्रमुख और भोपाल गैस त्रादसी के मुख्य अभियुक्त वारेन एंडरसन भले ही अभी भी फरार हों, लेकिन केशव महिंद्रा और उनके छह साथियों को दिया गया दो साल की सज़ा लोगो के दर्द के लिहाज से महज एक मजाक सा लगता है । 26 साल के एक लम्बे इंतजार के बाद फैसला ये आयेगा शायद, दोषियों को भी नही लगा होगा । तमाम तरह के अटकलें और फिर मामूली सी सजा । जहाँ इस फैसले को लेकर भोपाल समेत सारी दुनिया अचम्भित है वही कॉर्पोरेट वल्डॅ के लिए राहत भरी खबर है । अब तो ऐसा लगने लगा है कि भोपाल गैस त्रादसी और दुनिया के सबसे बड़े औद्योगिक दूर्घटना में लोगो की जान की कीमत मशीन के किसी पार्ट में हुई खराबी की तरह आकीं गई है । जिसका मुवावज़ा महज कुछ पैसा होता है । इस तरह के सज़ा से आम लोग तो ये मानने लगे है कि आखिर सजा तो हुई ।