
काम ढ़ेला भर और तनख्वा 50 हजार....जी हां ये उन लोगों का वेतन है जिनको देश चलाने का जिम्मा सौंपा जाता है । मंहगाई थमने के नाम नहीं ले रही है । सूखा अपना प्रकोप पहले ही दिखा चुका है । कई राज्य को सूखा ग्रसित भी घोषित किया जा चुका है । लेह में बादल तो लालगंढ़ में मानव-दल....ये सभी इस देश के प्रमुख समस्या हैं । लेकिन हमारे सभी सासंद को इन सभी मुद्दों से कोई बहस नही है, उन्हें तो बस ओहदों का इस्तमाल कैसे किया जाय । इसका फिक्र रहता है । खासकर कांग्रेस की नीति समझ से परे लगती है । मंहगाई के इस आलम में सासंदो के वेतन में तीन गुना के बढ़ोतरी....ऐसा लगता है कि ये गरीबों के मुहं पे तमाचा हैं.....या फिर गरीबों के उस पंचलाइन का मजाक है जो सोनिया गांधी रट्ट लगाये रहती है....आम लोग...आम लोग....आम लोग..
....सोनिया गांधी आम लोग का स्लोगन गाके के सत्ता में तो आ गई । लेकिन उनकी नीति कभी आम लोगों के हित में नही रहा । इसीका जीता-जागता उदाहरण ही सासंदो का वेतन वृद्धि बिल का पास होना है । केन्द्र सरकार को सुरेश तेन्दूलकर समिति या फिर अर्जुन सेन गुप्ता के रिपोर्ट का सूध नही है । इसलिए ही तो सासंदो के वेतन में बेतहासा वृद्धि की गई है । सासंदो को अब तनख्वाह में पचास हजार रुपया मिलेगा जो पहले 16 हजार हुआ करता था । दैनिक भत्ता भी एक हजार बढ़ा के दो हजार कर दिया गया है । वहीं कार्यालय भत्ता बीस हजार से बढ़ा के चालीस हजार रुपया कर दिया गया है । इसके अलावे इनके पेंशन को आठ हजार रुपया से बढ़ा के बीस हजार कर दिया गया है । ये तो एक संक्षिप्त आंकड़ा है जिसे रुपया के रुप में प्रस्तुत किया जा सकता है । लेकिन यात्रा...मेडिकल....आवास इसका ब्योरा भी इसी रफ्तार से बढ़ाया गया है । इसके बावजूद सासंद सब की बेरुख़ी इस बात को साफ जाहिर करता है कि उनके लिए देश का विकास कोई खास मायने नही रखता है । बल्कि निजी विकास की अहमियत उनके लिए बड़ी बात है । खासकर कांग्रेस की ढुल-मुल नीति तो अमिर को अमिर और गरीब को और गरीब की राह ही दिखाती है । बहरहाल देश मंहगाई और सूखा का मार झेल रहा है और केन्द्र सरकार जनता के प्रतिनिधियों को तीन गुना से भी अधिक वेतन देने के बिल पे मुहर लगाती है । तो शायद यही कहा जा सकता है कि केन्द्र सरकार को लोकसभा से आगे नही दिख रहा है । दरअसल केन्द्र सरकार को आम जनता से क्या लेना-देना । उन्हें तो आम जनता के प्रतिनिधियों से लेना-देना होता है । और शायद यहीं वज़ह है कि "आम जनता पस्त और आम जनता के नुमाइंदे मस्त"
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