
सरकार कांग्रेस की है, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह है, परन्तुनीति, तानाशाही और हिटलरशाही है। लगातार पिछले दोसालों से बाबा रामदेव भ्रष्टाचार को खत्म करने की कवायदमें जुटे थे, लेकिन उन्हें नहीं पता था कि ये भ्रष्टाचारकांग्रेसियों के लिए ऑक्सीजन है। जिस तरह ऑक्सीजनके बगैर हमारा जीना मुश्किल है, ठीक उसी तरह भष्टाचारके बिना कांग्रेसी मठ सलामत नहीं रह सकता। शायद यहीवजह है कि बाबा के सत्याग्रह को दबाने के लिए सभी तरह के हथकंडे अपना रही है। कूटनीति का इस्तेमाल कियागया, दबाव की स्थिति बनाई गई, प्रलोभन दिया गया, लेकिन इन सब के बावजूद बाबा का सत्याग्रह पर डटे रहनादेश की जनता के लिए जागृति बम जैसा था। इसमें न शोला था न ही धमाका। बस एक आस थी भ्रष्टमुक्त औरस्वच्छ राष्ट्र के निर्माण का। इस जागृति बम को देश के हर कोने में फैलने देने से रोकने के लिए सत्याग्रह कोकुचलना ही सरकार की आखिरी मंशा थी। इसलिए रामलीला मैदान को रात के आखिरी पहर में रणभूमि में तब्दीलकर दिया गया। आपको याद होगा अंग्रेजों के चुंगल से देश को आजादी आधी रात को मिली थी लेकिन आधी रातको ही इन काली चमड़ी के अंग्रेजों ने लोकतंत्र को फिर से बंधक बना लिया।
देश को एक बार फिर जालियावाला बाग हत्याकांड और इमरजेंसी के दिनों का याद करना पड़ा। दिग्विजय सिंहऔर कपिल सिब्बल जैसे आला कांग्रेसी नेता बाबा को यह सलाह दे रहें हैं कि वे अपने काम से मतलब रखें। क्या वेयही सलाह अपने सरकार को नहीं दे सकते ? कपिल सिब्बल और दिग्विजय सिंह को भी तो मालूम होना चाहिएकि उनका काम देश की सेवा करना है, देश को गुमराह करना नहीं। लोकतांत्रिक तरीके से चुने गये लोग जनता केसेवक होते हैं शासक नहीं। लगातार दूसरी बार चुनी गई इस सरकार को इस बात का घमंड हो गया है कि वहजनता की माई बाप है। उनकी नीतियां जनता का खून चूसने वाली है और हांफता विपक्ष कुछ भी कर पाने कीस्थिति में नहीं है। अण्णा हजारे और स्वामी रामदेव जैसे लोग इसलिए आंदोलन के लिए आगे आये हैं। काले धनको देश का धन धोषित करने, काले धन को वापस लाने, और काले धन रखने वाले पर दण्डात्मक कार्रवाई करनेकी मांग करना राजनीति नहीं है, यह तो देशहित में की गई मांग है।
जिसतरह से स्वामी रामदेव को इन सब मांगों से दूर रहने के लिए दबाव बनाया गया और उनपर अत्याचार किएगये, लाठियां बरसाई गई और सिर्फ यह कहकर इस घटना को खारिज कर दिया गया कि बाबा योगगुरु हैं, उन्हेंराजनीति नहीं करना चाहिए। तो क्या भारतीय लोकतंत्र में संतो पर किये गये अत्याचार के लिए कानून का कोईअलग पैमाना है? क्या भारतीय लोकतंत्र में साधु-संतो को राजनीति करने की इजाजत नहीं है। कूटनीति के जनकचाणक्य भी तो एक सन्यासी थे।
अपने पापों को छुपाने के लिए ये नेता किसी भी हद तक जा सकते हैं। बाबा को अगर आरएसएस या भाजपा कासमर्थन मिल भी रहा है तो इसमें गुणाह क्या है। क्या इनका समर्थन मिल जाने से बाबा की मांगे गलत हो गईं औरगांधी के नाम की डुगडुगी लेकर देश की आबरू से खिलवाड़ करने वाले पाक साफ हो गये ?
आखिर यह कैसा दंभ। किस बात का दंभ। काग्रेस समझ जाये कि कमजोर विपक्ष ही उसकी बर्बादी का कारणबनेगा। क्योंकि इस देश के लोगों को पता चल गया है कि विपक्ष से कुछ नहीं होने वाला। वे राजघाट पर नाचने गानेके सिवा कुछ नहीं कर सकते। लोगों को घरों से बाहर निकालने की क्षमता अब उनमें नही रही। अरे भईया अवसानतो हिटलर का भी हुआ था और मुसोलनी का भी। लोकतंत्र के वेश में पोषित इस तानाशाही को खत्म करने के लिएआईए एक और तहरीर चौक बनायें। भरत के वंशजो एकबार फिर परीक्षा की घड़ी आ गयी है।
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