Saturday, 15 October 2011

चल शाम तू जा रही जिस कदर

चल शाम तू जा रही जिस कदर
मै भी अपने घर को चला
तू ढल रही जिस कदर
मै भी थक चूका

क्या तू कल फिर हसीं शाम आएगी
अपने आगोश में मौसम की जवानी और रात होने का अहसास लाएगी
अगर हाँ
तो क्यू ???
तम्हारे हिस्से का ये कैसा पल है
तम्हारी आवारगी का ये शिला है या
मोहब्बते रंजिश में तुम रोज़ आती हो
खैर ...
तम्हारे आने जाने का ये सिलसिला
मुझे उत्साहित करता है
तुम रोज़ ढल के आ सकती हो
तो क्या मै रोज़ थक के तम्हारे साथ नही जा सकता हूँ

Wednesday, 12 October 2011

तर्क करना वाजिब नहीं होगा

लोगों के आक्रोश और देश में व्याप्त धांधली का माहौल कभी भी किसी को भी
अपने आगोश में ले लेगा शायद यही वजह है की प्रशांत भूषण पिट गये और
अन्ना टीम हस्त्प्रद हैं .
नेतागण भले इस बात को यह कह कर मुकर जाये कि मेरे पास इस विषय में कोई जानकारी नहीं है
लेकिन ये वारदात उनको सचेत राजनीति करने पर मजबूर कर देगा, अन्यथा अंजाम के विषय में
तर्क करना वाजिब नहीं होगा