चल शाम तू जा रही जिस कदर
मै भी अपने घर को चला
तू ढल रही जिस कदर
मै भी थक चूका
क्या तू कल फिर हसीं शाम आएगी
अपने आगोश में मौसम की जवानी और रात होने का अहसास लाएगी
अगर हाँ
तो क्यू ???
तम्हारे हिस्से का ये कैसा पल है
तम्हारी आवारगी का ये शिला है या
मोहब्बते रंजिश में तुम रोज़ आती हो
खैर ...
तम्हारे आने जाने का ये सिलसिला
मुझे उत्साहित करता है
तुम रोज़ ढल के आ सकती हो
तो क्या मै रोज़ थक के तम्हारे साथ नही जा सकता हूँ
मै भी अपने घर को चला
तू ढल रही जिस कदर
मै भी थक चूका
क्या तू कल फिर हसीं शाम आएगी
अपने आगोश में मौसम की जवानी और रात होने का अहसास लाएगी
अगर हाँ
तो क्यू ???
तम्हारे हिस्से का ये कैसा पल है
तम्हारी आवारगी का ये शिला है या
मोहब्बते रंजिश में तुम रोज़ आती हो
खैर ...
तम्हारे आने जाने का ये सिलसिला
मुझे उत्साहित करता है
तुम रोज़ ढल के आ सकती हो
तो क्या मै रोज़ थक के तम्हारे साथ नही जा सकता हूँ
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