पत्थरों का क्या कसूर...
वो तो वजूद के लिए तड़पता है...
साथ होने से चट्टान की शक्ल...
और जुदा होने से रेत बनकर मिट्टी में मिल जाता है...
शायद मैं भी वो पत्थर हूं...
मुझे भी अपनी वजूद तलाशनी है...
पर मुझमें तो जान है, ख्वाहिशें है, संवेदनाएं हैं...
तो क्या वही मेरी शक्ल है...
ये इतना आसान नहीं...
इससे इत्तेफाक कर लेना...
तो क्या अपने व्यक्तित्व के पहचान के लिए...
करनी होगी खोज मुझे...
अपने ही नाम रौशन की सार्थकता को लेकर मंथन करने से उपजे शब्द...
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