Sunday, 28 October 2012

लब्जों से तस्वीर बनाने को जी चाहता है


रौशन कुमार

लब्जों से तस्वीर बनाने को जी चाहता है, एक ऐसी तस्वीर जिसमें होठों के मुस्कान पर जज्बातों के एहसास रख दुं, उम्मिदों का बेपनाह लेप चढ़ाऊं तुम्हारी उंगलियों पर और रंग बादलों का लेके निले आसमान की तरह तुम्हे सजाऊं । तुम ताजा सुबह और अलसाये शाम की तरह दिखो और मैं सारे कायनात से कह सकूं कि तस्वीरों के जहां में भी मेरा इश्क कितना रौशन है ।

Wednesday, 24 October 2012

हवाओं का आसियां

धरती और आसमान के बीच हवाओं का आसियां होता है । तितली, भंवरे, जुग्नू आज सब परेशान है । इंसान पुतला फूंक रहा हैं, आज रावण का कल मनमोहन का परसो मायावती, नीतीश, गडकरी और ना जाने कौन-कौन । रावण खुशी-खुशी फूंका जा रहा हैं, लेकिन नेताओं को फूंकने पर क्फर्यू लग जाता है । हवाओं के आसियां पर कफर्यू नहीं लगाया जा सकता है, लेकिन ज़हर तो हवाओं में भी घोला जा सकता है । मत घोलो ज़हर की आसियां हवाओं का भी उजर जायें और तितली, भंवरे, जुग्नू सब परेशान रहे ।।

Saturday, 20 October 2012

“दिल, दिमाग और दवात"

तुम्हारी गज़ल सी मुखरे पर बिछी रौशन मुस्कान का मैं कायल हूं । समुंद्र सी गहरी, झील सी प्यारी, रात सी काली, बोलती आंखों की जुबान का मैं कायल हूं । मैं गुलाब की पत्तियों सी सजी, आफ़ताब की ओस से ज़री, प्रभा की पहली रोशनी सी लग रही, तुम्हारे होठों के सुर्ख मिस्ठान का कायल हूं । पलकों की भूलभुलइयां, गालों पर बनती कुइयां के दिदार का मैं कायल हूं । तुम यकीन नहीं मानोगी, तुम्हारी गेशुओं से उलझ के निकली हुई मदमस्त हवाओं में वासंतिक लालिमा होती है, सावन की भीगी-भीगी खूशबू होती है, माघ का ठंडापन और जयेष्ठ का प्यास होता है, चंदन की महक, चिड़ियों की चहक और न जाने कौन-कौन से तत्वों का संगम होता है । मैं इस अद्वतीय संगम के व्याख्यान का कायल हूं । 

"दिल, दिमाग और दवात के संगम की उपज"