बाबरी मस्जिद मुकदमे के पैरोकार और मुद्दई
हाशिम अंसारी ने रामलला को आजाद देखने की ख्वाहिस क्या जाहिर की.....राजनीतिक
गलियारों में खलबली मच गई...हाशिम अंसारी के बयान पर विपक्ष रणनीति तैयार करता
उससे पहले ही अंसारी ने प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ कर सभी को चौंका दिया...अंसारी
ने कहा कि मोदी सियासी फायदा उठाने वाले नहीं हैं... वे कौम की मदद करने वाला
अच्छे इंसान हैं....वहीं मुद्दई हाशिम अंसारी के बायन पर यूपी के कैबिनेट मंत्री
आजम खान आक्रमक हो गए हैं...उन्होंने अंसारी पर तंज कसते हुए कहा कि हासिम अंसारी
की उम्र हो गई है...वो बीमार चल रहे हैं...ये वो नहीं बल्कि उनका फस्ट्रेशन बोल
रहा है...92 वर्षीय हाशिम अंसारी पिछले 65 साल से बाबरी
मस्जिद का मुकदमा लड़ रहे हैं। उनकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इस मुकदमे में वह
मुस्लिम पक्ष की तरफ से सबसे दमदार पैरोकार माने जाते हैं।
1949 में जब विवादित स्थल से मूर्तियां बरामद हुई थीं, उस समय जिन लोगों को अरेस्ट किया गया था, उनमें हाशिम भी थे। 1961 में जब वक्फ बोर्ड ने मुकदमा दायर किया था, उसमें भी हाशिम मुद्दई बनाए गए थे। लिहाजा आजम खान को लगता है कि जिस मुद्दे के सहारे उनकी राजनीति चलती रही है...वो उनसे छिनता जा रहा है...और इसलिए ही वो कह रहे हैं कि अगर सभी कोई भी इस मुद्दे से विद ड्रॉल कर लेता है तब भी मुकदमा चलेगा.. राजनीतिक पार्टियां विवादित ढ़ांचे के सहारे सियासी रोटियां सेकती रही है......लेकिन सवाल अभी मजूं बना हुआ है कि क्या रामलला आजाद हो पाएगा? क्या वाकई में विवादित ढ़ांचा को लेकर आम सहमति बन पाएगी ? क्या कोर्ट कचहरी के बाहर दोनों पक्षों में रजामंदी बन पाएगी ? बहरहाल जिस तरह से सितायतदां हमेशा विवादित ढ़ाचा को मुद्दा का शक्ल देते रहे हैं उससे तो लगता है कि मुद्दों का ये मलवा इतनी जल्दी साफ होने वाला है ।
1949 में जब विवादित स्थल से मूर्तियां बरामद हुई थीं, उस समय जिन लोगों को अरेस्ट किया गया था, उनमें हाशिम भी थे। 1961 में जब वक्फ बोर्ड ने मुकदमा दायर किया था, उसमें भी हाशिम मुद्दई बनाए गए थे। लिहाजा आजम खान को लगता है कि जिस मुद्दे के सहारे उनकी राजनीति चलती रही है...वो उनसे छिनता जा रहा है...और इसलिए ही वो कह रहे हैं कि अगर सभी कोई भी इस मुद्दे से विद ड्रॉल कर लेता है तब भी मुकदमा चलेगा.. राजनीतिक पार्टियां विवादित ढ़ांचे के सहारे सियासी रोटियां सेकती रही है......लेकिन सवाल अभी मजूं बना हुआ है कि क्या रामलला आजाद हो पाएगा? क्या वाकई में विवादित ढ़ांचा को लेकर आम सहमति बन पाएगी ? क्या कोर्ट कचहरी के बाहर दोनों पक्षों में रजामंदी बन पाएगी ? बहरहाल जिस तरह से सितायतदां हमेशा विवादित ढ़ाचा को मुद्दा का शक्ल देते रहे हैं उससे तो लगता है कि मुद्दों का ये मलवा इतनी जल्दी साफ होने वाला है ।

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