मैं
ना
किस्मतकार
था, ना
दशहत
का
अवतार
था, ना
मैंने
कभी
किसी
की
निगहबानी
ली, ना
ही
किसी
की
शोहबत
में
गुलामी
की, मैं तो
बस
लोकतंत्र
के
माथे
पर
बिंदी
की
तरह
चमकता
एक
गैर
हिमायती, गैर
रसूखदार
कलमकार
था
। मैं
कागज
पर
आग
से
कलम
बोता
था, लिखता था
मैं
दर्द
जमाने
के
और
खूद
लिखने
से
पहले
खूब
रोता
था,
मैं
ना
अलंकार
छंदों
की
भाषा
बोलता-लिखता था, मुझको
तो
बस
दर्द
दिखाई
देता
था,
मैं
जनमानस
के
आक्रोश
को
शब्द
संस्कार
देता
था,
मैं
एक
कलमकार
था
।
आज
ना
सिर्फ
मेरी
हत्या
हुई
है,
बल्कि
मेरे
खून
से
लोकतंत्र
को
रक्तचत्रित
कर
दिया
गया
है,
लेकिन
मैं
उन
खूंखार
नादानों
को
समझाने
के
लिए
श्मशान
से
आह्वान
दे
रहा
हूं
कि
मरा
तो
सिर्फ
मेरा
शरीर
है,
मेरी
कलम
की
आग
की
लपटे
तो
और
तेज
हो
गयी
है
। मेरे
उस
कलम
से
अब
ज्वाला
फूटेगा
और भस्म
कर
देगा
लोकतंत्र
के
दैत्य
को, जो
सियासी
रहनुमायी
पर
खुद
को
आका
समझ
बैठे
हैं
। मेरी
हत्या
पर
मैं
खुद
गोपालदास
नीरज
की
कविता
के
माध्यम
से
सुशासन
और
अच्छे
दिन
वाले
सरकार
को
संदेश
देना
चाहता
हूं
।
मैं
देख
रहा
हूं
भूख
उग
रही
है
गलियों
बाजारों
में
मैं
देख
रहा
हूं
ढूढ
रही
बेकारी
कफन
मजारों
में
मैं
देख
रहा
हूं
दूध
उगलने
वाली
धरती
प्यासी
है
मैं
देख
रहा
हर
दरवाजे
पर
छाई
मौत
उदासी
है
खुद
मिट
जाऊंगा
या
यह
सब
सामान
बदलकर
छोड़ूंगा
इंसान
है
क्या
मैं
दुनिया
का
भगवान
बदलकर
छोड़ूंगा
मैं
अंगारे
ही
गाऊंगा
जब
तक
दिनमान
न
निकलेगा
आंधी
खुद
ही
बन
जाऊंगा
जब
तक
तूफान
न
निकलेगा
मैं
यूं
ही
अपने
शीश
रहूंगा
पहने
ताज
कफनवाला
जब
तक
मेरे
शव
पर
चढ़कर
मेरा
बलिदान
न
निकलेगा
मेरा
है
प्रण
जब
तक
यह
काली
निशा
नहीं
उजियाली
हो
तब
तक
रौशनी
सकल
जग
को
मेरे
लहू
की
लाली
हो
मैं
नवयुग-निर्माता
हूं
रूढ़ी
विधान
बदल
कर
छोड़ूंगा
इंसान
है
क्या
मैं
दुनिया
का
भगवान
बदलकर
छोड़ूगा
मैं
ना
सिर्फ
सीवान
का
राजदेव
रंजन
था,
ना
सिर्फ
चतरा
का
इंद्रदेव
यादव
था
। मैं
तो
सुशासन
का
प्रश्नकाल
था, हूं
और
रहूंगा । अच्छे
दिनों
पर
सवाल
था, हूं
और
रहूंगा

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