Friday, 31 March 2017

चुनावी ब्रह्मास्त्र बनेगा मोबाइल

क्या भारत की राजनीति बदल गयी है ? क्या भारतीय राजनीति की तेवर बदल गयी है ? क्या भारतीय वोट बैंक का मिजाज बदल गया है ? क्या अब चुनावी जनसभाओं का दौर खत्म हो जाएगा ? ऐसे तमाम सवाल हो सकते हैं, क्योंकि पीएम नरेंद्र मोदी का मानना है कि 2019 में चुनाव मोबाइल पर लड़ा जाएगा । तो मोबाइल वाले चुनाव को समझना जरूरी है ।

मिजाज समझना जरूरी

राजनीति में बदलाव को समझना सबसे अहम होता है । वोटरों के मिजाज से लेकर मुद्दों की बुनियाद तक में बदलाव होता रहता है । गाहे-बगाहे हमारे देश में वोटरों के मिजाज को नजरअंदाज किया जाता रहा है । खासकर लोकसभा 2014 के चुनाव से पहले की बात करें तो ।

विश्व पटल की नजर से

याद कीजिए साल 2008 का अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव, जिसने इतिहास रचते हुए बराक ओबामा को चुना । बराक ओबामा उस वक्त के बदलाव को बखूबी समझते हुए फेसबुक को अपने चुनाव प्रचार का हथियार बनाया । फेसबुक पर बराक ओबामा का प्रयोग हिट रहा, वे अमेरिकियों के मिजाज को टटोलने में कामयाब हुए और फेसबुक चुनाव प्रचार का एक सशक्त साधन बन गया । एक वक्त तो ऐसा भी आया था, जब पाकिस्तान में ब्लॉग से राजनीतिक लामबंदी हुई थी । माना जाता है कि उस वक्त पाकिस्तान में हुए आंदोलन का असर ही था कि साल 2007 में परवेज मुसर्रफ तख्ता पटल करने में कामयाब रहे ।

भारत की राजनीति में नया मोड़

बात भारत की करें तो साल 2014 भारत की राजनीति में नया मोड़ लेकर आया । सूर्य की तरह बीजेपी का पूरे देश में उदय हुआ । राजनीति के नवोदित सूर्य की संज्ञा ''मोदी लहर'' दिया गया । ऐसे में दिल्ली विधानसभा और फिर बिहार विधानसभा में करारी हार ने फिर साबित किया कि लहर का असर तभी होता है, जब मिजाज को परखा जाए । यूपी-उत्तराखंड, मणिपुर विधानसभा 2017 के नतीजे शायद उसी का मिसाल है । जहां बीजेपी ने समाजवादी पार्टी, बहुजन समाजवादी पार्टी और कांग्रेस को सोचने तक का मौका नहीं दिया ।

लोकसभा चुनाव 2019 की तैयारी

 पूरे देश के क्षत्रप जहां हार की समीक्षा और मोदी लहर को चुनौती देने की रणनीति बनाने में जुटे हैं । पीएम नरेंद्र मोदी लोकसभा चुनाव 2019 के लिए प्लान बना रहे हैं । पीएम और उनके सलाहकारों को लगता है कि 2019 सोशल साइड्स वाला होगा । मोबाइल सबसे महत्वपूर्ण होगा । लिजाहा पीएम ने विजय मंत्र देते हुए सभी सांसदों को सोशल साइड्स पर सक्रिय होने के लिए कहा है ।

मोबाइल पर चुनावी लड़ाई की पड़ताल

सोशल साइड्स पर विचारों और मान्यताओं का इको चैंबर बनता है। सोशल साइड्स ट्रैंडिंग के माध्यम से इको चैंबर का विस्तार करते हैं । आसान शब्दों में कहे तो आपके लाइक और हिट्स से इको चैंबर बनाया जाता है । ये सोशल साइड्स का भ्रामक विस्तार है । इससे निपटने की दिशा में फिलहाल कोई काम नहीं हुआ है । हां बढ़ावा देने में जरूर कई देशों ने इस्तेमाल किया है । जिसमें अब भारत भी जुड़ना चाहता है । क्योंकि विश्व के सबसे युवा देश में सोशल साइड्स स्वीट प्वाजन की तरह फैल रहा है । लाजिमी है राजनीतिक दल इसका फायदा लेना की जुगत जरूर लागएंगे । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ऐलान इसी की एक कड़ी है । क्योंकि मिजाज समझना जरूरी है  ।


Monday, 26 December 2016

#HANDSOME #CHAIWALA

Saturday, 24 December 2016

अंत की परिभाषा

असमंजस की स्थिति सबसे आसान होती है
क्योंकि एक रास्ते का विकल्प जानना मुश्किल है
असमंजस सदैव दो रास्तों का विकल्प देता है
ठीक उस झूठ की सच्चाई की तरह
कि आदमी मिट्टी का है और मिट्टी ही शुद्ध है
भ्रांतियों की आयु निर्धारित नहीं
शोध भ्रांतियों का काल है
विजय और पराजय एक दपंत्ति हैं
जिसके कोख में हमेशा युद्ध गर्भ धारण करता है
अस्त की उष्मा आसमान की लहू है
पलायन की उस बेला की तरह, जिसमें मां-बेटे अलग होते हैं
गुजरना अनुभव करना होता है
और अंत की परिभाषा अनुभव है





Wednesday, 2 November 2016

"रौशन" दो दीये

"रौशन"
दो दीये अरमानों के
उस शहर में जलाना तुम
जहां तुम्हारे एहसास
पल रहे हैं, बढ़ रहे हैं



ह्रदय की अभिलाशायें
दूर देश में रच-बस जाने से मिट जाती नहीं
तुम दीये की बाती को
मन की आंचल से बनाना
ताकि उसके लौ से
तुम खुद को रौशन कर सको


ये अलग बात है
कि मां की हाथों से गुत्थे हुए मिट्टी के वो दीये
उस शहर में नहीं मिलेंगे
लेकिन …
तुम उस पल को महसूस करना
उस मिट्टी की खूशबू में खोना
जिसमें प्यार, स्नेह, और विजय की ऊर्जा है

सपनों का आंगन सजाना तुम
जहां तुम्हारे अपने
तुम्हें दुलार रहे हैं
और तुम्हारी आंखें बिना लजाये
शरारतों की ऐसी रंगोली बना रही है
जिसमें तुम्हारे अपनों के
सारे रंग समाये हुए हैं


तुम चाहो तो...
उस छत पर भी दीये जलाना
जहां कबूतरों का
खुला आशियां होता है
जिसके लिए दिवाली का कोई मतलब नहीं होता
लेकिन रोशनी किसी की जागीर ना बने
इस भ्रम को तोड़ना तुम
दो दीये समानता के
उस शहर में जलाना तुम




मैं तुम्हें इस बात के लिए नहीं कचोट रहा हूं
कि दूर शहर में तुम अपनों से दूर हो
बल्कि
तुम कमजोर ना पड़ो
अपनी भावनाओं से लड़ते-लड़ते
इसलिए एकता के दीये जलाना तुम

Saturday, 14 May 2016

लहू के दो राज्य:- Bihar-Jharkhand

मैं ना किस्मतकार था, ना दशहत का अवतार था, ना मैंने कभी किसी की निगहबानी ली, ना ही किसी की शोहबत में गुलामी की, मैं तो बस लोकतंत्र के माथे पर बिंदी की तरह चमकता एक गैर हिमायती, गैर रसूखदार कलमकार था । मैं कागज पर आग से कलम बोता था, लिखता था मैं दर्द जमाने के और खूद लिखने से पहले खूब रोता था, मैं ना अलंकार छंदों की भाषा बोलता-लिखता था, मुझको तो बस दर्द दिखाई देता था, मैं जनमानस के आक्रोश को शब्द संस्कार देता था, मैं एक कलमकार था । 

आज ना सिर्फ मेरी हत्या हुई है, बल्कि मेरे खून से लोकतंत्र को रक्तचत्रित कर दिया गया है, लेकिन मैं उन खूंखार नादानों को समझाने के लिए श्मशान से आह्वान दे रहा हूं कि मरा तो सिर्फ मेरा शरीर है, मेरी कलम की आग की लपटे तो और तेज हो गयी है । मेरे उस कलम से अब ज्वाला फूटेगा और भस्म कर देगा लोकतंत्र के दैत्य को, जो सियासी रहनुमायी पर खुद को आका समझ बैठे हैं । मेरी हत्या पर मैं खुद गोपालदास नीरज की कविता के माध्यम से सुशासन और अच्छे दिन वाले सरकार को संदेश देना चाहता हूं ।

मैं देख रहा हूं भूख उग रही है गलियों बाजारों में
मैं देख रहा हूं ढूढ रही बेकारी कफन मजारों में
मैं देख रहा हूं दूध उगलने वाली धरती प्यासी है
मैं देख रहा हर दरवाजे पर छाई मौत उदासी है
खुद मिट जाऊंगा या यह सब सामान बदलकर छोड़ूंगा
इंसान है क्या मैं दुनिया का भगवान बदलकर छोड़ूंगा
मैं अंगारे ही गाऊंगा जब तक दिनमान न निकलेगा
आंधी खुद ही बन जाऊंगा जब तक तूफान न निकलेगा
मैं यूं ही अपने शीश रहूंगा पहने ताज कफनवाला
जब तक मेरे शव पर चढ़कर मेरा बलिदान न निकलेगा
मेरा है प्रण जब तक यह काली निशा नहीं उजियाली हो

तब तक रौशनी सकल जग को मेरे लहू की लाली हो
मैं नवयुग-निर्माता हूं रूढ़ी विधान बदल कर छोड़ूंगा
इंसान है क्या मैं दुनिया का भगवान बदलकर छोड़ूगा



मैं ना सिर्फ सीवान का राजदेव रंजन था, ना सिर्फ चतरा का इंद्रदेव यादव था । मैं तो सुशासन का प्रश्नकाल था, हूं और रहूंगा । अच्छे दिनों पर सवाल था, हूं और रहूंगा


Monday, 28 March 2016

भूख से मौत


एक-एक दाने को मोहताज हैं...
घर में चूल्हा है...लेकिन पकाने के लिए ना ही अनाज है...
एक निवाला, सच्चा सपना हो गया...
ये खाट पर सोया बुजुर्ग, मौत का अपना हो गया...
फिर भी कहते हैं, हम में मानवता वर्तमान है
बोलो भइया, क्या सचमुच में भारत महान है ?
दर्द है, बेबसी है, गुमनामी है,
मुफलिसी, मजबूरी, मौत है
ये किसी का घर है, आंगन है
चारों ओर पसरा सन्नाटा से ना समझ लेना ये मसान है
बोलो भइया क्या सचमुच में भारत महान है ?
युग है, कलयुग है
समाज, शासन, सरकार है
हां भइया इनका एक छोटा सा परिवार है
बेटा है, कमाता है
वक्त का तकाजा है
लोभ है ? पाप है ?
पैसा क्या वाकई में अभिशाप है ?
ये बुजुर्ग उस अभागे बेटे का बाप है
ऐसे समाज, शासन, सरकार पर
शर्म है, धिक्कार है, बेजान है
बोलो भइया क्या सचमुच में भारत महान है ?


                                      दरअसल भारत महान है । ये हम आप बचपन से पढ़ते, गाते और गर्व करते आए हैं । लेकिन बिहार के शेखपुरा में एक बुजुर्ग की भूख से हुई मौत के बाद भारत के महान होने पर शक पैदा करता है । क्या किसी महान देश में एक बुजुर्ग को एक निवाला नहीं मिलता है ? क्या महान देश का बेटा, अपने बाप को यतीम की तरह छोड़ सकता है ? क्या महान देश का समाज एक बुजुर्ग को कई महीनों तक पल-पल मरता देख सकता है ? बिहार के शेखपुरा के बरबीघा ऐसा ही हुआ है, जहां एक बुजुर्ग की भूख से मौत हो गयी । बेटा हरियाणा में कमाता है, और पैसे की चाहत उसे बाप से ज्यदा है ।
                                        जिसकी मौत हुई उसका नाम जागो मांझी था । जागो की पत्नी भी लकवा ग्रस्त है । जागो की जिन्दगी भले ही जैसी भी रही हो, लेकिन मरने के बाद भी जागो को कफन तक नसीब नहीं हुआ । जागो का अंतिम संस्कार करने वाला भी कोई नहीं था । हालांकि स्थानीय वार्ड पार्षद ने जागो के लिए कफन का इंतजाम किया और उसके बेटे को सूचित कर दिया । वहीं सबसे हैरत की बाद है कि जागो की मौत के बाद अब सियासत तेज हो गयी है । खुद को दलितों का पैरोकार कहने वाले केंद्रीय खाद्य मंत्री रामविलास पासवान ने जागो मांझी की मौत पर बिहार सरकार को जिम्मेदार ठहराया । उनका मानना है कि सरकार ठीक ढंग से दलितों का ख्याल नहीं रख रही है । वहीं बिहार सरकार के खाद्य मंत्री जागो की मौत को आम बता रहे हैं । उनका मानना है कि जागो बीमारी से मरा है । बहरहाल सवाल वही है कि क्या वाकई हमारा देश महान है ।

कुछ निम्नलिखित सवाल भी प्रासांगिक है ।

भूख से मौत पर सियासत ?
मुफलिसी, मजबूरी, मौत बन गया है सियासी मुद्दा ?
क्या संवदेनहीन हो गया है हमारा समाज, शासन और सरकार ?
क्या जागो मांझी की मौत के बाद जागा है सियासतदां ?
मौत के बाद जांच का क्या मतलब ?
क्या जागो मांझी की मौत के बाद बदलेगी तस्वीर ?
क्या गरीबी को भुनाने में लगे हैं सियासतदां ?
क्या गरीबी, भुखमरी सिर्फ मुद्दे बन कर रह गए हैं ?
क्यों मौत से पहले महीनों तक कोई नहीं था सुध लेनेवाला ?
क्या जागो की मौत फिल्मी नथ्था की तरह हो गया है ?
वोट के लिए फिल्मी नथ्था को मारने पर उतारू थी राजनीतिक पार्टियां ?
केंद्रीय खाद्य मंत्री रामविलास पासवान अब तक कहां थे ?
क्या बिहार के सभी गरीबों को मिल रहा है सरकारी अनुदान ?
क्या सभी गरीबों के पहुंच में है खाद्य सुरक्षा अधिनियम ?
क्या खाद्य डीलरों का भ्रष्टाचार भूख दूर करने में है मुख्य बाधा ?
क्या सरकार के पास भुखमरी से लड़ने के लिए नहीं है कोई तंत्र और योजना ?