हिन्दी दिवस
पिछले सप्ताह (14 सितम्बर) हिन्दी दिवस के रुप में मनाया गया । देश के तमाम हिन्दी संगठन इस जद्दो-जेहद में लगे रहें के किस तरह हिन्दी को विश्व मंच पर भारत का प्रतिनिधीत्व सौपा जाय । हिन्दी के विद्धानों ने हिन्दी के प्रगति के लिए अपने विचार और सिद्धांत को लगभग सभी संचार माध्यम से जनता को रु-ब-रु कराने की कोशिश की । कईयों ने तो अपने विचार को हिन्दी के विधायो में पिरो कर प्रस्तुत किया हैं । चूँकि मैं हिन्दी से पत्रकारिता कर रहा हूँ और हिन्दी प्रदेश से हूँ इसलिए स्वत: मेरी हिन्दी से लगाव कुछ अधिक हो जाती है और मेरी भी लेखनी हिन्दी दिवस पर रुक न सकी । और इस तरह मैं प्रस्तुत करता हूँ अपनी स्वरचित कविता ................. “ हिन्दी ”
हिन्दी
हम चाहते हैं हिन्दी निशां हो
हम चाहते हैं हिन्दी कारवां हो
हम चाहते हैं हिन्दी जां हो
हम चाहते हैं हिन्दी ये जहां हो
है जन से कहना, जनमत बनाना
हिन्दी को अपनी प्रतिष्ठा दिलाना
हम भारत के हैं, नये भारत बनाना
हिन्दी भाषा जन साधारण तक पहुचाना
हम चाहते हैं हिन्दी निशां हो
हम चाहते हैं हिन्दी हिन्दुस्तान हो
कठिनाईयों से भरी रास्ता हैं
हिन्दी का अभी जो दूर्दशा चल रहा है
बहुत सोचने की ये मंथना है
भारतीय हैं हम, फिर क्यूँ इंग्लिश यहां हैं
हम चाहते हैं हिन्दी निशां हो
हम चाहते हैं हिन्दी ये जहां हो
परछाइयों में हमें न है चलना
भूल के सब कुछ, रौशन हिन्दी को है करना
आओ मिलाओं मेरे हाथ से हाथ
हिन्दी पुछेगी फिर इंग्लिश से औकाद
हम चाहते हैं हिन्दी निशां हो
हम चाहते हैं हिन्दी हिन्दुस्तान हो
ये राष्ट्रभाषा हिन्दी हमारी
सत-सत नमन हम हैं तेरे आभारी
तुम अस्मिता हो मेरे देश की
तुम पिता हो मेरे संदेश की
हम चाहते हैं हिन्दी निशां हो
हम चाहते हैं हिन्दी ये जहां हो
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