
भारत ईक बार फिर फुटबॉल विश्वकप के आगोश में सिमटा जा रहा है। मीडिया जिस तरह से इस खेल का कवरेज कर रही है, उससे तो लगता है कि भारतीय टीम भी खेल के इस महाकुभं में शिरकत करने वाला है । लोगो का उत्साह और बाजार के रुप में आया ये एक महिने का खेल भारत के उस वर्ग का परचार कर रहा जिसे लोग इंडिया पुकरते हैं । टीवी पे फुटबॉल का खुमार शायद टीआरपी के रफ्तार को कायम रखने के लिए किया जा रहा है । लेकिन टीआरपी के आड़ में बाजार के भागीदारी को नकारा नही जा सकता । शायद यही वज़ह है कि फुटबॉल के खेल में १३३वें स्थान पे रहने वाला भारत इस खेल का कवरेज इतना बढ़-चढ़ के कर रहा है । अभी हाल ही से संपन्न हुआ हॉकी विश्वकप किसी को याद भी नही होगा, वज़ह दो है, पहला इस खेल का बाजार से दूरी और दूसरा सरकार का उदासीपन । कभी हॉकी में सर्वोच्य शिखर पर रहने वाला भारत आज दूसरे राउंड तक भी नही पहुंच पाती है । हम हमेशा मीडिया के सिरे ठेकरा बांध देते है और सरकार को इसका लाभ भी मिल जाता है । सरकार अगर राजनीति तक ही सिमित रहती है तो देश के सर्वांगिक विकास की कल्पना नही की जा सकती है । लेकिन ये इस देश की विडंबना ही है कि यहां हर चीजो पे जमके राजनीति की जाती है । आई पी एल पे हुइ राजनीति क्रिकेट के खेल को जहां शर्मशार करता है, वहीं सरकार के नीति का खुलासा भी साफ तरह से देखा जा सकता है ।फुटबॉल का ब्यार से भारतीय को बहुत कुछ सिखने की जरुरत है ।
खासकर भारत के सरकार को तो जरुर सोचना चाहिए कि आखिर वो कौन सी स्थिती है जिस कारण भारतीय फुटबॉल हाशिये पे है । खैर फुटबॉल के विश्वकप के बहाने ही अगर हम फुटबॉल से जुड़ पाते है तो भी ये फुटबॉल इंडिया के लिए अच्छा ही होगा ।
खासकर भारत के सरकार को तो जरुर सोचना चाहिए कि आखिर वो कौन सी स्थिती है जिस कारण भारतीय फुटबॉल हाशिये पे है । खैर फुटबॉल के विश्वकप के बहाने ही अगर हम फुटबॉल से जुड़ पाते है तो भी ये फुटबॉल इंडिया के लिए अच्छा ही होगा ।
bahut aacha laga aapka blog padkar
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