Friday, 30 July 2010

कभी किसी रोज

कभी किसी रोज

एहसास तुमसे पुछेगा


पास आकर तुम्हारे दिल के

दिल की हर बात तुमसे पुछेगा

छुपा लेना अपने सारे जज्बातों को

क्योकि.....

बयां-ए-जज्बात ना जाने क्या कह देगें
और फिर मैं चाहता भी तो नही
कि....
यादों की तस्वीर फिर से उभरे
सांसों में फिर से वो तुफान हो
मिलने की व्याकुलता
और होंठो पे मेरा नाम हो
क्योकि.....
ये सब तो बस
एक वहम सा है
कभी किसी रोज
ये वहम टुटेगा
एहसास तुमसे पुछेगा
पास आकर तुम्हारे दिल के
दिल की हर बात तुमसे पुछेगा

कभी किसी रोज
हां कभी किसी रोज...


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