Wednesday, 29 September 2010

प्रेम में पाप के वजूद का होना


मानसिक विकार एक प्रकार का रोग है जिसके कई वज़ह हो सकते हैं । लेकिन प्रेम अगर विकार बन जाए तो मुश्किलात की शुरुआत मानी जा सकती है । हां लोगो को इसे समझने में जरा वक्त लगेगा लेकिन वास्तविकता से इंकार नही किया जा सकता । मैं प्रेम के उस स्वरुप का चित्रण कर रहा हुं जो वास्तव में प्रेम मात्र कहा जा सकता है । परन्तु वो किसी भी संदर्भ में प्रासंगिक नही होता है । कुछ इसी तरह के माहौल से जब मैं रु-ब-रु हुआ तो थोड़ा सा अजीब लगा । अजीब इसलिए कह रहा हूं क्योकि उस माहौल को अध्ययन-अध्यापन के लिए बनाया गया है । लेकिन प्रेम रस में लीन जोड़ें अपने आस पास चल रहे गतिविधियों से मानो कोसों दूर हों । उनके हाव भाव उनके प्रेम में पाप के वजूद को निखार कर सामने ला रहा था । या यूं कहा जा सकता है कि वो यौवन के उस स्वाद को चखना चाह रहे थे जो एक मर्यादित रिश्ता बनने के बाद बनता है । कई दफा मेरे मन में ख्याल आता रहा कि आखिर ये है क्या....आधुनिकता....लेकिन आधुनिक तो मैं भी हुं फिर एक आधुनिक दूसरे आधुनिक के व्यवहार पर मंथन कतई नही कर सकता । खैर प्रेम था तो सभी चुप थे । लेकिन इन चुप्पियों में भी कई सवाल थे जो दोनो के अलग होने के बाद पुछा जाना था । और ऐसा हुआ भी .....पहला ही सवाल था.....बेटा तेरी तो एश है, मजे ले ले....लेकिन इन सभी सवाला का जवाब उसकी हंसी थी । मानो उसने कलिंग साम्राज्य जीत लिया हो । वासना की प्राप्ति सचमुच कलिंग साम्राज्य के सिंहासन पर विजय है । परन्तु वासना के चर्मोत्कर्ष पर से लौट जाना मानसिक विकार का जनक है ।

1 comment:

  1. अध्ययन और अध्यापन का माहौल प्रेमपूर्ण ही रहना चाहेए । ज्यादातर संस्थाओं का यह अंग बन चुका है, कोसने के बजाय इसे स्वीकार करें । प्रेम में पाप कतई संभव नहीं। जैसे बिना सेक्स के आप किसी स्त्री से प्रेम नहीं कर सकते। यौन आचरण में केवल दो वर्जना है- बलात्कार और वादे से मुकरना । वासना के शिखर से लौटना मानसिक विकार नहीं। वहां तक न पहुँचने को दर्द को मानसिक विकार नहीं कह सकते, यदि संभव हो तो इस पंक्ति को दुरस्त कर लें ।

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