Saturday, 7 January 2012

तुम इतने निर्दयी कैसे

तुम इतने निर्दयी कैसे
 
मेरे अँसुवन नैनों के नीर
 
दोनों मेरे हो के भी 

सावन मोती बहतें हैं 

निश्छल ह्रदय

 व्याकुल मन मेरा

प्रीत की आस लगाये था

तुम मधुमास 

बसंत तुम फागुन 

सरसों फूल सुनहरी सी 

ज्येष्ठ दोपहरी आग सा झुलसा 

नियत तुम्हारी जो पढ़ ली 

कुंठित प्रेम

कलंक की भाषा 

अभिनव छवि दिखाई थी 

तुम जोवन भूख की माया 

मेरा प्रेम विहंगम सा 

रूप रतन सब तेरे तेज

मुझपे असर ना कर पाया

विचलित हूँ 

की बिसराऊँ कैसे 

पर विवस नहीं हूँ उस माया से 

यह मोह भंग में कष्ट है

लेकिन 

तुम इतने निर्दयी कैसे 

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