तुम इतने निर्दयी कैसे
मेरे अँसुवन नैनों के नीर
दोनों मेरे हो के भी
सावन मोती बहतें हैं
निश्छल ह्रदय
व्याकुल मन मेरा
प्रीत की आस लगाये था
तुम मधुमास
बसंत तुम फागुन
सरसों फूल सुनहरी सी
ज्येष्ठ दोपहरी आग सा झुलसा
नियत तुम्हारी जो पढ़ ली
कुंठित प्रेम
कलंक की भाषा
अभिनव छवि दिखाई थी
तुम जोवन भूख की माया
मेरा प्रेम विहंगम सा
रूप रतन सब तेरे तेज
मुझपे असर ना कर पाया
विचलित हूँ
की बिसराऊँ कैसे
पर विवस नहीं हूँ उस माया से
यह मोह भंग में कष्ट है
लेकिन
तुम इतने निर्दयी कैसे
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