अजमल कसाब
को फांसी देना ना आश्चर्यजनक है और ना ही भारत के लिए कोई बड़ी उपलब्धि । हां,उपलब्धियों
के फेहरिस्त में इसे शामिल करके कुछ राजनीतिक दल लाभ जरुर कमाना चाहेंगे । दरअसल
आश्चर्यजनक इसलिए नहीं क्योंकि कसाब कई दफे खुद ही फांसी की गुहार लगा चुका था ।
और उसके बोले गए आखिरी वाक्य से ये जगजाहिर भी होता है “ या खुदा मुझे माफ करना कि ऐसी गलती मुझसे दोबारा ना हो” । और उपलब्धि इसलिए नहीं क्योंकि 30 करोड़ राजस्व की बर्बादी के बाद दी
गई फांसी कभी भी उपलब्धि की तादिर नहीं बन सकती है । । हिन्दुस्तान में एक गफलत का
महौल बन गया था कि आम लोगों के पैसे, खुखार दरिंदों को पालने में ही खत्म हो जाता
है ।
खून का रंग
लाल होता है और दहशत खूनी रंग से सना हुआ मुक्कमल तस्वीर होती है । लेकिन ये
दहशतगर्त ना जाने क्यूं सदियों से ये नहीं समझ रहें हैं कि तस्वीर की कोई तकदीर
नहीं होती । हाल के कुछ वर्षों में कई ऐसी घटनाएं सामने आयी है जो दहशती तस्वीर
बनाने में सफल हुए । कई दहशतगर्त तो ऐसे कारनामों को अंजाम तक पहुंचाये जिनकी याद
में आज भी रुहें कांप उठती है । लिहाजा लोग ये मान के चलने लगे थे कि जिस तरह
भ्रष्टाचार और बेमानी समाज का अभिन्न अंग बन गया है ठीक उसी तरह हमें दहशत को भी
स्वीकार कर लेना चाहिए
जम्मू
से लेकर जमशेदपुर तक कोकराझाड़ लेकर कश्मीर तक या यूं कहें लाल किला से लेकर संसद
भवन तक हर कहीं दहशत मुंह बांये खड़ी थी। सच मायने में दहशत को ये लगने लगा था कि उसे
पनाह देने के लिए हिन्दुस्तान ने हां में सर हिला दिया है । इसी कड़ी में अमेरीका
के सद्दाम हुसैन पर लिए गये उस सख्त फैसले को कैसे भूला जा सकता है । जिसमें हुसैन
को पहले सत्ता से बेदखल किया जाता है। फिर उसके ही देश में उसे फांसी की सजा
मुकर्रर की जाती है । और सबसे भयानक तो ये था कि ईद से एक दिन पहले फांसी देना ।
लेकिन हिन्दुस्तान जैसे इन सब घटनाओं से महरुम हो । जैसे उसे इस बात का कभी इल्म
ही ना हुआ हो कि दहशत को थामने के लिए तमाम देश कड़े फैसले ले रहे हैं
दरअसल
सीरिया और मिश्र ने विश्व मानचित्र पर एक ऐसा उदाहरण पेश किया है जिसका मिशाल देना
बहुत मुश्किल है । मुअव्वर गद्दाफी और हुस्नी मुबारक अपने अपने देश में अजीज
शंहशाह के तौर पर जाने जाते थे । लेकिन दहशत और तानाशाही रवैये ने वहां के जनता को मजबूर कर दिया कि उनके तकदीर
का भी फैसला कर दिया जाए । इसलिए इतिहास गवाह बनी, गद्दाफी ने पहले अपने बेटे का
मौत देखा फिर खुद की, हुस्नी मुबारक का हस्र कुछ अच्छा रहा । उसे ताउम्र का सजा
हुई और सजा के तौरान ही मौत ।
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