Sunday, 21 July 2013

ये रस्में-रिवाज़, ये रवायतें

ये मज़हबों के इल्म भी
ख़लल डालते हैं ईमान से
हमें सोख़ गुलशन की दरकार थी
ये हुर रौशन कहां से आ मिला

बड़े नाज़-नख़रे, बड़ी सोखियां
गुप्तगु हुई तो पता चला


वो रकीब मेरा, मैं हबीब सा
नुर-ए-इश्क हमपे मेहरबां हुआ

दो दिल जुड़े, दो जहां मिला
दो मज़हबें ना मिल सकी
ये रस्में-रिवाज़, ये रवायतें
ये मज़हबी दस्तुर के वायदें

मेरी आशिकी को कत्ल किया
खुदा मज़हबों के इल्म ने
क्या है वज़ह इस सितम का रब
या तू रज़ा है मज़हबों के इल्म से

देखो लब्ज़ों से अफ़साने बन गये

गुप्तगु के सिलसिले से अल्फ़ाजों की सौदेबाजी हुई
कि देखो लब्ज़ों से अफ़साने बन गये

अंज़ुमन दो दिन...
और दो हजार लब्ज़ों की सौदेबाजी
हां... जैसे
अचानक से लब्ज़ों का सैलाब लग गया हो

कुछ भी तो नया नहीं था
इस गुप्तगु के सिलसिले में
की-बोर्ड पर तेजी से उंगली चलाने के सिवा

लब्जों के मतलब वही थे
मौसम का मिज़ाज
और नई तरह की अंग्रेजी वाली हिन्दी वही थी

हां... फितूर नहीं था
जो आशिकों में होती है
(माफ कीजियेगा फितूर हम में भी है पर आशिकी...? )

तो समझ में आया
अफ़साने लब्ज़ों से तो बन जाते हैं
पर गुप्तगु से
मौसकी के धून नहीं बनते ।

मेरे गरीब दिल का कोई संविधान नहीं है



मेरे गरीब दिल का कोई संविधान नहीं है
इसका ये मतलब नहीं
कि इसकी इच्छाओं का कोई संरक्षक नहीं
मैं बिना शपथ लिए हुए ही
अपने दिल का संविधान रचता हूं

मुझे संवेदनाओं के मत नहीं चाहिए
जिसके बहुमत से
असंवेदनाओं की बाढ़ आ जाए

इसे बाजारु और बनावटीपन स्नेह से नफरत है
इसलिए नहीं कि...
इसका भाव लगाया जा सकता है
बल्कि इसलिए...
क्योंकि इससे स्नेह का भ्रष्टाचार फैलता है
मर्यादाओं की सीमाएं टूटती है
और कानून की मांग बढ़ती है

कानून का मतलब है...
संविधान...
जिसमें धाराओं और अनुच्छेदों का विस्तार हो

और मैं
स्नेह का भ्रष्टाचार
असंवेदनाओं की बाढ़
और कई तरह की अनियमिताओं को
अपने दिल पर बर्दाश्त नहीं कर सकता
भले ही गरीबी कितनी क्यूं ना हो
इसलिए
मेरे दिल का कोई संविधान नहीं है ।