गुप्तगु के सिलसिले से अल्फ़ाजों की सौदेबाजी हुई
कि देखो लब्ज़ों से अफ़साने बन गये
अंज़ुमन दो दिन... और दो हजार लब्ज़ों की सौदेबाजी
हां... जैसे
अचानक से लब्ज़ों का सैलाब लग गया हो
कुछ भी तो नया नहीं था
इस गुप्तगु के सिलसिले में
की-बोर्ड पर तेजी से उंगली चलाने के सिवा
लब्जों के मतलब वही थे
मौसम का मिज़ाज
और नई तरह की अंग्रेजी वाली हिन्दी वही थी
हां... फितूर नहीं था
जो आशिकों में होती है
(माफ कीजियेगा फितूर हम में भी है पर आशिकी...? )
तो समझ में आया
अफ़साने लब्ज़ों से तो बन जाते हैं
पर गुप्तगु से
मौसकी के धून नहीं बनते ।
No comments:
Post a Comment