Saturday, 4 January 2014

ईक बात कहूं तुमसे...

ये कैसी कसक है कि उनकी याद दूर होती नहीं

हर बार मुझे उनसे कुछ कहना होता था

सकुचा के बातों बात में हिम्मत जुटा के

मैं कहता
...
ईक बात कहूं तुमसे...

वो लव्ज़ों को ओठों पे लाके

हां में सिर हिलाती

उसकी आंखें, मेरे चेहरे के हर भंगिमा को

पढ़ने का कोशिश करता

और मैं अनजुमन ही कहता...

कुछ नहीं.
..
शायद उसे भी मालुम था

मेरे ‘कुछ नही’ का मतलब

तभी तो उसके हां में सर हिलाने

में उत्साह होता था

अभिनव की नई छटा और

उत्सव का नया रंग होता था

क्या वाकई उसे ‘कुछ नही’ का मतलब पता था ...

या यूहीं उनकी नज़दिकियों ने

मेरे दिल के साथ है फ़रेब किया

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