जब
कोई खड़ा होता है, तो वह परंपरा का निर्वहन करता है । लेकिन प्रगति तो चलने से
होता है । ऐसे में परंपरा का निर्वहन करना और फिर प्रगति को गति देना दोनों एक साथ
करना होता है । प्रगति के पथ पर चलने के लिए प्रयोग का सहारा लेना होता है । बिना
प्रयोग के विकास की अवधारणा नहीं रखी जा सकती है । शायद यही वज़ह है कि ईश्वर ने
मनुष्य को दो पांव दिए । जिससे वह परंपरा और प्रगति दोनों को साथ लेकर आगे बढ़ सके
। एक उदाहरण से इस बात को समझा जा सकता है – जब हम खड़े होते हैं तो परंपरा का
निर्वहन करते हैं...लेकिन जब हमारा एक पांव उठता है, तो हम प्रयोग करते हैं और एक
पांव को ज़मीन पर स्थिर रखे हुए, परंपरा का निर्वहन भी करते हैं । ऐसी स्तिथि में
विकास का एक पूरा समीकरण तैयार होता है । फिर देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस
अपने को परंपरा का दुहाई देकर क्यों खुद को समेटने का काम कर रही है । 17 जनवरी को एआईसीसी की बैठक में कांग्रेस पीएम उम्मीदवार के लिए
माथा-पच्ची करने बैठी, लेकिन कांग्रेस के रणनीतिकारों ने परंपरा का दूहाई देते हुए
पीएम उम्मीदवार की घोषणा नहीं की । ये शायद कांग्रेस के लिए गर्व की बात हो सकती
है, लेकिन देश कांग्रेस से पीएम उम्मीदवार का फेस देखना चाहता था । दरअसल
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर कैबिनेट मंत्री और कांग्रेस के कई मुख्यमंत्री
राहुल गांधी को पीएम बनना देखना चाहते हैं और इसके लिए उन्होंने सार्वजनिक मंच पर
कई बार ऐलान भी किया है, फिर ऐसी कौन सी मजबूरी है, जिसकी वज़ह से कांग्रेस ने
राहुल गांधी को पीएम पद के लिए प्रोजेक्ट नहीं किया । गौरतलब है कि कांग्रेस 2012
के चार विधानसभा चुनाव में अपना कुनबा बचाने में असफल रही, जबकि शीला दीक्षित से
लेकर अशोक गहलोत जैसे कद्दावर मुख्यमंत्री चुनाव का नेतृत्व कर रहे थे । ऐसे में
ये माना जाए कि कांग्रेस राहुल गांधी को बचाने के लिए प्रयोग के नियम को ख़ारिज कर
रही है या कांग्रेस ये मान चुकी है कि 2014 का लोकसभा चुनाव उसके पक्ष में नहीं
होने वाला है । सवाल कई हैं, लिहाजा जो सबसे अहम सवाल है कि क्या कांग्रेस परंपरा
के ढ़ाचा को देश पर थोपना चाहती है ? क्या मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल
में विकास गति के थमने की वज़ह कांग्रेस की नीतियों का परिणाम है ?
स्पष्ट तौर से देखा जाए तो कांग्रेस
पिछले दस सालों में विकास के लिए कोई व्यापक नीति देश को देने में असफल रही है ।
नतीजा साफ है, अटल बिहारी वाजपेयी के समय में देश 8 फीसदी के ग्रौथ रेट से दुनिया
में रौशन हो रहा था, लेकिन अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल ने देश के विकास
के गणित को घटाव की दिशा में मोड़ दिया । लिहाजा 2004-2009 यानी पहले कार्यकाल में
विकास दर 5 से 6 के आस-पास रही तो दूसरे कार्यकाल में 4 पर आकर सिमट चुकी है । देश
एक बार फिर चुनाव के मुहाने पर है और सियासत में भले ही कांग्रेस परंपरा को तरहीज
दे रही हो, लेकिन वोटर इस बार प्रयोगात्मक रूख अख्तियार किए हुए हैं । लिहाजा माना
जा सकता है कि लगातार दो सत्ता का मैदान जीतनेवाली कांग्रेस इस बार मैदान में
उतरने से ही डर रही है ।
हर सुबह का उगता सूरज एक नयी उम्मीद लेके आता है..लेकिन हर शाम के ढ़लते सूरज के साथ ये उम्मीदें तोड़ देती है । इंतज़ार है अब बस एक रौशन सुबह की...
Thursday, 27 February 2014
Tuesday, 4 February 2014
हरियाणा कांग्रेस में हलचल
पहले फूट अब मोहभंग’ । दरअसल हरियाणा
कांग्रेस में पहले मनमुटाव का दौड़ चलता है, और अब पार्टी से कांग्रेस नेताओं का
मोहभंग होना शुरू हो गया है, और इस कड़ी में कई बड़े नेता कांग्रेस का दामन छोड़
चुके हैं । लोकसभा चुनाव की तैयारियों में सभी पार्टियां जोर-शोर से जुट गई हैं,
लेकिन कांग्रेस के लिए मुश्किलें थमने का नाम ही नहीं ले रही हैं । पहले तो पार्टी
के नेताओं में मनमुटाव सामने आता है, और अब स्थिती यहां तक पहुंच गई है कि पार्टी
के बड़े नेताओं का अब पार्टी से ही मोहभंग होने लगा है ।
राव इंद्रजीत सिंह, अतर सिंह सैनी, मांगेराम
गुप्ता, शांति राठी, हरि सिंह और अब सुभाष बत्रा, ये कांग्रेस के उन नेताओं की
फेहरिस्त है, जिनका कांग्रेस से मोहभंग हो गया है । कभी कांग्रेस पार्टी के लिए
जीत का मुकद्दर बने इन नेताओं ने कांग्रेस की नींव हिला कर रख दी है । दक्षिण
हरियाणा में राव इंद्रजीत का बोलबाला है, तो रोहतक के पंजाबी बाहुल्य वोटरों पर
सुभाष बत्रा की पकड़ है, लेकिन कांग्रेस में चल रहे मनमुटाव अब खुलकर सामने आने
लगे हैं । मुख्यमंत्री हुड्डा-सैलजा प्रकरण के बाद पार्टी ने जरूर इसपर नकेल कसनी
चाही लेकिन सुभाष बत्रा तो खुलकर कांग्रेस से मोहभंग होने की बात कह रहे हैं और 2
मार्च को पार्टी छोड़ने का एलान भी कर दिए हैं ।
दरअसल आजकल कांग्रेस के विज्ञापन में राहुल
गांधी राजनीति नहीं काजनीति की बात कहते नज़र आ रहे हैं, लेकिन हरियाणा कांग्रेस
में तो मनमुटाव, मोहभंग और फूट की राजनीति को साफ तौर पर देखा जा सकता है । बहरहाल
कांग्रेस को राजनीति और काजनीति के अंतर को पाटने से ज्यादा फूटनीति पर लगाम लगाने
की जरूरत है ।
Monday, 3 February 2014
विकल्प की राजनीति
विकल्प की राजनीति को एक वैचारिक मंच के जरिए ही देश में फैलाया जा सकता है । दरअसल देश युवा है, युवाओं की भागीदारी इस देश में सबसे ज्यादा है । ऐसे में नई सोच और नये विचार के साथ राजनीतिक क्रांति का आगाज करना देश और समाज दोनों के हित में है । लिहाजा समाज के साथ जुड़कर लोगों की जरूरतों को अपने आंखों से देखने और उनके दुख पर अपने कंधे का सहारा देने वाले लोगों को एकजुट होकर इस विकल्प में खाली पड़ी जगह को भरना होगा ।
देश पिछले 6 दशक से विकल्प की राजनीति की तलाश करती रही है । कई आंदोलन हुए और कई वैकल्पिक पार्टियां देश की राजनीति में दस्तक देती रही, लेकिन वैक्लपिक पार्टियां अपने वैचारिक सिद्धांत दम तोड़ती रही है । आम आदमी पार्टी भष्ट्राचार विरोधी विचार से उभरी लेकिन आप की वैचारिक सिद्धांत भी दम तोड़ दी है । दरअसल चुनावी राजनीति में व्यवहारिक्ता और दिखावे के दबाव में विचारधारा हमेशा नेपथ्य में जाती रही है । देश में वैकल्पिक पार्टियां तो बहुत आईं लेकिन मुख्यधारा की राजनीति से अलग वैकल्पिक राजनीति कोई नहीं दे पाया, जिसकी इस देश को हमेशा से दरकार रही । वैकल्पिक राजनीति विचारधारा के फैलाव से पनपती है वोटों के पैमाने से तो वैकल्पिक पार्टी भर निकलती है । आप ने अपनी वैचारिक नींव पक्की करने या उम्मीदवार को विचारधारा के मापदंड पर परखे बिना उसकी ऊपरी छवि को अपना मुख्य बिंदु बनाया । छवि को विचार से ऊपर रखने से नींव पक्की नहीं होती है और पार्टी में टिकाऊपन नहीं होता है । भ्रष्टाचार की मुखालफत के लिए एक वैकल्पिक पार्टी भर बना लेने से वैकल्पिक राजनीति नहीं आती । वैकल्पिक राजनीति में वोट तो सिर्फ एक अंग भर है, बाकी ढांचा तो वह मूल्यों पर आधारित होगा । वैकल्पिक राजनीति का मूलमंत्र है विचारपरक सरकार जो सियासी आडंबरों को तोड़े । यह भी सही है कि पार्टी के अंदर एक व्यक्ति की प्रसिद्धि पार्टी को आगे बढ़ाने में मदद देती है, लेकिन समय के साथ में व्यक्ति प्रमुख और पार्टी गौण हो जाती है । फिर लोग पार्टी को उसकी विचारधारा से नहीं, नेता के नाम से जानते हैं । मुलायम, लालू, मायावती की तरह आप संयोजक केजरीवाल भी परंपरागत रास्ते पर हैं । बदलाव की राजनीति में हमें दिखावे के दबाव से बाहर आकर विचारधारा पर ध्यान देना होगा, और ये तभी संभव होगा जब तमाम सामाजिक आंदोलनों में सक्रीय लोग एकजुट हों, मुद्दों के आधार पर । जिस पार्टी के बैनर तले ये सामाजिक कार्यकर्ता इक्कठे हों वहां अगुआ और अगुआई व्यक्ति की नहीं विचार की हो ।
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