विकल्प की राजनीति
विकल्प की राजनीति को एक वैचारिक मंच के जरिए ही देश में
फैलाया जा सकता है । दरअसल देश युवा
है, युवाओं की भागीदारी इस देश में सबसे ज्यादा है । ऐसे में नई सोच और नये विचार
के साथ राजनीतिक क्रांति का आगाज करना देश और समाज दोनों के हित में है । लिहाजा
समाज के साथ जुड़कर लोगों की जरूरतों को अपने आंखों से देखने और उनके दुख पर अपने
कंधे का सहारा देने वाले लोगों को एकजुट होकर इस विकल्प में खाली पड़ी जगह को भरना
होगा ।
देश पिछले 6 दशक से विकल्प की राजनीति की तलाश करती रही है । कई आंदोलन
हुए और कई वैकल्पिक पार्टियां देश की राजनीति में दस्तक देती रही, लेकिन वैक्लपिक
पार्टियां अपने वैचारिक सिद्धांत दम तोड़ती रही है । आम आदमी पार्टी भष्ट्राचार
विरोधी विचार से उभरी लेकिन आप की वैचारिक सिद्धांत भी दम तोड़ दी है । दरअसल चुनावी
राजनीति में व्यवहारिक्ता और दिखावे के दबाव में विचारधारा हमेशा नेपथ्य में जाती
रही है । देश में वैकल्पिक पार्टियां तो बहुत आईं लेकिन मुख्यधारा की राजनीति से
अलग वैकल्पिक राजनीति कोई नहीं दे पाया, जिसकी इस देश को हमेशा से दरकार रही । वैकल्पिक
राजनीति विचारधारा के फैलाव से पनपती है वोटों के पैमाने से तो वैकल्पिक पार्टी भर
निकलती है । आप ने अपनी वैचारिक नींव पक्की करने या उम्मीदवार को विचारधारा के
मापदंड पर परखे बिना उसकी ऊपरी छवि को अपना मुख्य बिंदु बनाया । छवि को विचार से
ऊपर रखने से नींव पक्की नहीं होती है और पार्टी में टिकाऊपन नहीं होता है ।
भ्रष्टाचार की मुखालफत के लिए एक वैकल्पिक पार्टी भर बना लेने से वैकल्पिक राजनीति
नहीं आती । वैकल्पिक राजनीति में वोट तो सिर्फ एक अंग भर है, बाकी ढांचा तो वह
मूल्यों पर आधारित होगा । वैकल्पिक राजनीति का मूलमंत्र है विचारपरक सरकार जो
सियासी आडंबरों को तोड़े । यह भी सही है कि पार्टी के अंदर एक व्यक्ति की
प्रसिद्धि पार्टी को आगे बढ़ाने में मदद देती है, लेकिन समय के साथ में व्यक्ति
प्रमुख और पार्टी गौण हो जाती है । फिर लोग पार्टी को उसकी विचारधारा से नहीं, नेता के नाम से
जानते हैं । मुलायम, लालू, मायावती की तरह
आप संयोजक केजरीवाल भी परंपरागत रास्ते पर हैं । बदलाव की राजनीति में हमें दिखावे
के दबाव से बाहर आकर विचारधारा पर ध्यान देना होगा, और ये तभी संभव होगा जब तमाम
सामाजिक आंदोलनों में सक्रीय लोग एकजुट हों, मुद्दों के आधार पर । जिस पार्टी के बैनर तले ये सामाजिक
कार्यकर्ता इक्कठे हों वहां अगुआ और अगुआई व्यक्ति की नहीं विचार की हो ।
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