Thursday, 23 April 2015

जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में संशोधन कितना सार्थक ?


जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में संशोधन को तो मंजूरी मिल गई । लेकिन सवाल ये है कि क्या महज इस पहल से बाल अपराधों पर लगाम लग जाएगा। कई ऐसे भी पहलू हैं जो इन तमाम कोशिशों को चुनौती देते हैं । 

  नजर नेक भी हो बदनाम उमर करती है
  डगर एक ही हो सफर जिंदगी तय करती है

  कहते हैं बच्चों का मन कोरे कागज की तरह होता है, जिसपर कोई भी लकीर खींचों तो वो स्थाई हो जती है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि अगर ये लकीरें जज्बातों से ऊपर उठकर नशेबाजी, संभोग और बेपर्दा शैली के स्याही से रंगी हो नतीजा क्या हो सकता है? जाहिर है अगर आपके भी बच्चे इस दौर से गुजर रहे हैं तो चिंता हो रही होगी । लाजिमी भी है, लेकिन जरा मतलब की बात करते हैं । केंद्रीय कैबिनेट ने जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में संशोधन को मंजूरी दे दी । वाकई सराहनीय पहल है और शायद देर से ही सही लेकिन ऐतिहासिक कदम उठाया गया है, लेकिन क्या इस पहल मात्र से ही अपराध कम हो जाएंगे ?   बड़ा सवाल है, छोटी उम्र में जिस तरह से बड़े जुर्म की बानगी सामने आ रही है वो आपके, हमारे और सबके लिए चिंता का सबब है । समझना जरूरी इसलिए है,  क्योंकि कानूनों में बदलाव से बाल अपराधियों के मन में खौफ तो पैदा किया जा सकता है लेकिन बुनियाद स्तर पर जो अपराधिक प्रवृति पनप रही है, उसपर अंकुश लगाना नामुम्किन है । वजह कई हैं । जरा इस गाने पर गौर फरमाइए 

  चार बोतल वोडका काम मेरा रोज का...
  दम दम दम दम खींच मेरे हमदम
  हां मैं एल्कोहलिक हूं

  क्या इन गानों का असर मासूम दिमाग पर आघात नहीं करता? बिल्कुल करता है, ऐसे गानें डॉयलॉग्स और ना जाने कई ऐसी चीजें बच्चों को गलत कामों के लिए प्रेरित कर रही हैं । जिस उम्र में बच्चे अपना रोल मॉडल तलाशते हैं उस उम्र में पश्चिमी सभ्यता के ये छिंटे बच्चों को बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं । रही सही कसर हमारी समाजिक स्थिति ने पूरा कर दिया है । भौतिकवाद का जमाना है और हम इस रेस में ऐसे भाग रहे हैं कि संयुक्त परिवार से एकल परिवार होते हुए आज हम एकांतवास के प्रारूप में जीने को मजबूर हो गए हैं । पैसे कमाने के लिए परिवार के सदस्य इस कदर व्यस्त हैं कि बच्चों को व्यवहारिक और नैतिक ज्ञान का परिचय भी नहीं पता और ऐसे में चंचल मन को टीवी और इंटरनेट ने अपराध की नई दिशा की ओर धकेलना शुरू कर दिया है, ना चाहते हुए भी जिस तरह से अवांछित चीजें आज परोसी जाती हैं वो बाल मन पर कुठाराघात करने में कोई कसर नहीं छोड़ती । तो ऐसे में लाजिमी हो जाता है ये सवाल कि क्या महज अपराधियों की उम्र का आंकलन कर लेने भर से बाल अपराध थम जाएंगे ? दिल्ली के निर्भया कांड से पहले बाल अपराध होते तो थे लेकिन बहस नहीं होती थी । यही वजह है कि इस पहल को खुद निर्भया के परिजन भी सराह रहे हैं । वाकई सराहनीय पहल है इसमें कोई दो राय नहीं है लेकिन इससे 16 से 18 साल के बीच के बच्चे तो डरेंगे लेकिन जो अपराध 14 या 15 साल के बच्चे कर रहे हैं उनका क्या....इसलिए जरूरी ये है कि अपराध पर लगाम लगाने से ज्यादा अपराधिक प्रवृति को पनपने से रोकने की कवायद की जाए ताकि देश का कल मजबूत और बेदाग हो सके....

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