हर सुबह का उगता सूरज एक नयी उम्मीद लेके आता है..लेकिन हर शाम के ढ़लते सूरज के साथ ये उम्मीदें तोड़ देती है । इंतज़ार है अब बस एक रौशन सुबह की...
Monday, 26 December 2016
Saturday, 24 December 2016
अंत की परिभाषा
असमंजस की स्थिति सबसे आसान होती है
क्योंकि एक रास्ते का विकल्प जानना मुश्किल है
असमंजस सदैव दो रास्तों का विकल्प देता है
ठीक उस झूठ की सच्चाई की तरह
कि आदमी मिट्टी का है और मिट्टी ही शुद्ध है
भ्रांतियों की आयु निर्धारित नहीं
शोध भ्रांतियों का काल है
विजय और पराजय एक दपंत्ति हैं
जिसके कोख में हमेशा युद्ध गर्भ धारण करता है
अस्त की उष्मा आसमान की लहू है
पलायन की उस बेला की तरह, जिसमें मां-बेटे अलग होते हैं
गुजरना अनुभव करना होता है
और अंत की परिभाषा अनुभव है
Labels:
रौशन कुमार
Location:
Sector 63, Noida, Uttar Pradesh, India
Wednesday, 2 November 2016
"रौशन" दो दीये
"रौशन"
दो दीये अरमानों के
उस शहर में जलाना तुम
जहां तुम्हारे एहसास
पल रहे हैं, बढ़ रहे हैं
ह्रदय की अभिलाशायें
दूर देश में रच-बस जाने से मिट जाती नहीं
तुम दीये की बाती को
मन की आंचल से बनाना
ताकि उसके लौ से
तुम खुद को रौशन कर सको
ये अलग बात है
कि मां की हाथों से गुत्थे हुए मिट्टी के वो दीये
उस शहर में नहीं मिलेंगे
लेकिन …
तुम उस पल को महसूस करना
उस मिट्टी की खूशबू में खोना
जिसमें प्यार, स्नेह, और विजय की ऊर्जा है
सपनों का आंगन सजाना तुम
जहां तुम्हारे अपने
तुम्हें दुलार रहे हैं
और तुम्हारी आंखें बिना लजाये
शरारतों की ऐसी रंगोली बना रही है
जिसमें तुम्हारे अपनों के
सारे रंग समाये हुए हैं
तुम चाहो तो...
उस छत पर भी दीये जलाना
जहां कबूतरों का
खुला आशियां होता है
जिसके लिए दिवाली का कोई मतलब नहीं होता
लेकिन रोशनी किसी की जागीर ना बने
इस भ्रम को तोड़ना तुम
दो दीये समानता के
उस शहर में जलाना तुम
मैं तुम्हें इस बात के लिए नहीं कचोट रहा हूं
कि दूर शहर में तुम अपनों से दूर हो
बल्कि
तुम कमजोर ना पड़ो
अपनी भावनाओं से लड़ते-लड़ते
इसलिए एकता के दीये जलाना तुम
दो दीये अरमानों केउस शहर में जलाना तुम
जहां तुम्हारे एहसास
पल रहे हैं, बढ़ रहे हैं
ह्रदय की अभिलाशायें
दूर देश में रच-बस जाने से मिट जाती नहीं
तुम दीये की बाती को
मन की आंचल से बनाना
ताकि उसके लौ से
तुम खुद को रौशन कर सको
ये अलग बात है
कि मां की हाथों से गुत्थे हुए मिट्टी के वो दीये
उस शहर में नहीं मिलेंगे
लेकिन …
तुम उस पल को महसूस करना
उस मिट्टी की खूशबू में खोना
जिसमें प्यार, स्नेह, और विजय की ऊर्जा है
सपनों का आंगन सजाना तुम
जहां तुम्हारे अपने
तुम्हें दुलार रहे हैं
और तुम्हारी आंखें बिना लजाये
शरारतों की ऐसी रंगोली बना रही है
जिसमें तुम्हारे अपनों के
सारे रंग समाये हुए हैं
तुम चाहो तो...
उस छत पर भी दीये जलाना
जहां कबूतरों का
खुला आशियां होता है
जिसके लिए दिवाली का कोई मतलब नहीं होता
लेकिन रोशनी किसी की जागीर ना बने
इस भ्रम को तोड़ना तुम
दो दीये समानता के
उस शहर में जलाना तुम
मैं तुम्हें इस बात के लिए नहीं कचोट रहा हूं
कि दूर शहर में तुम अपनों से दूर हो
बल्कि
तुम कमजोर ना पड़ो
अपनी भावनाओं से लड़ते-लड़ते
इसलिए एकता के दीये जलाना तुम
Saturday, 14 May 2016
लहू के दो राज्य:- Bihar-Jharkhand
मैं
ना
किस्मतकार
था, ना
दशहत
का
अवतार
था, ना
मैंने
कभी
किसी
की
निगहबानी
ली, ना
ही
किसी
की
शोहबत
में
गुलामी
की, मैं तो
बस
लोकतंत्र
के
माथे
पर
बिंदी
की
तरह
चमकता
एक
गैर
हिमायती, गैर
रसूखदार
कलमकार
था
। मैं
कागज
पर
आग
से
कलम
बोता
था, लिखता था
मैं
दर्द
जमाने
के
और
खूद
लिखने
से
पहले
खूब
रोता
था,
मैं
ना
अलंकार
छंदों
की
भाषा
बोलता-लिखता था, मुझको
तो
बस
दर्द
दिखाई
देता
था,
मैं
जनमानस
के
आक्रोश
को
शब्द
संस्कार
देता
था,
मैं
एक
कलमकार
था
।
आज
ना
सिर्फ
मेरी
हत्या
हुई
है,
बल्कि
मेरे
खून
से
लोकतंत्र
को
रक्तचत्रित
कर
दिया
गया
है,
लेकिन
मैं
उन
खूंखार
नादानों
को
समझाने
के
लिए
श्मशान
से
आह्वान
दे
रहा
हूं
कि
मरा
तो
सिर्फ
मेरा
शरीर
है,
मेरी
कलम
की
आग
की
लपटे
तो
और
तेज
हो
गयी
है
। मेरे
उस
कलम
से
अब
ज्वाला
फूटेगा
और भस्म
कर
देगा
लोकतंत्र
के
दैत्य
को, जो
सियासी
रहनुमायी
पर
खुद
को
आका
समझ
बैठे
हैं
। मेरी
हत्या
पर
मैं
खुद
गोपालदास
नीरज
की
कविता
के
माध्यम
से
सुशासन
और
अच्छे
दिन
वाले
सरकार
को
संदेश
देना
चाहता
हूं
।
मैं
देख
रहा
हूं
भूख
उग
रही
है
गलियों
बाजारों
में
मैं
देख
रहा
हूं
ढूढ
रही
बेकारी
कफन
मजारों
में
मैं
देख
रहा
हूं
दूध
उगलने
वाली
धरती
प्यासी
है
मैं
देख
रहा
हर
दरवाजे
पर
छाई
मौत
उदासी
है
खुद
मिट
जाऊंगा
या
यह
सब
सामान
बदलकर
छोड़ूंगा
इंसान
है
क्या
मैं
दुनिया
का
भगवान
बदलकर
छोड़ूंगा
मैं
अंगारे
ही
गाऊंगा
जब
तक
दिनमान
न
निकलेगा
आंधी
खुद
ही
बन
जाऊंगा
जब
तक
तूफान
न
निकलेगा
मैं
यूं
ही
अपने
शीश
रहूंगा
पहने
ताज
कफनवाला
जब
तक
मेरे
शव
पर
चढ़कर
मेरा
बलिदान
न
निकलेगा
मेरा
है
प्रण
जब
तक
यह
काली
निशा
नहीं
उजियाली
हो
तब
तक
रौशनी
सकल
जग
को
मेरे
लहू
की
लाली
हो
मैं
नवयुग-निर्माता
हूं
रूढ़ी
विधान
बदल
कर
छोड़ूंगा
इंसान
है
क्या
मैं
दुनिया
का
भगवान
बदलकर
छोड़ूगा
मैं
ना
सिर्फ
सीवान
का
राजदेव
रंजन
था,
ना
सिर्फ
चतरा
का
इंद्रदेव
यादव
था
। मैं
तो
सुशासन
का
प्रश्नकाल
था, हूं
और
रहूंगा । अच्छे
दिनों
पर
सवाल
था, हूं
और
रहूंगा
Monday, 28 March 2016
भूख से मौत
एक-एक दाने को मोहताज हैं...
घर में चूल्हा है...लेकिन पकाने के लिए ना ही अनाज है...
एक निवाला, सच्चा सपना हो गया...
ये खाट पर सोया बुजुर्ग, मौत का अपना हो गया...
फिर भी कहते हैं, हम में मानवता वर्तमान है
बोलो भइया, क्या सचमुच में भारत महान है ?
दर्द है, बेबसी है, गुमनामी है,
मुफलिसी, मजबूरी, मौत है
ये किसी का घर है, आंगन है
चारों ओर पसरा सन्नाटा से ना समझ लेना ये मसान है
बोलो भइया क्या सचमुच में भारत महान है ?
युग है, कलयुग है
समाज, शासन, सरकार है
हां भइया इनका एक छोटा सा परिवार है
बेटा है, कमाता है
वक्त का तकाजा है
लोभ है ? पाप है ?
पैसा क्या वाकई में अभिशाप है ?
ये बुजुर्ग उस अभागे बेटे का बाप है
ऐसे समाज, शासन, सरकार पर
शर्म है, धिक्कार है, बेजान है
बोलो भइया क्या सचमुच में भारत महान है ?
दरअसल भारत महान है । ये हम आप बचपन से पढ़ते, गाते और गर्व करते आए हैं । लेकिन बिहार के शेखपुरा में एक बुजुर्ग की भूख से हुई मौत के बाद भारत के महान होने पर शक पैदा करता है । क्या किसी महान देश में एक बुजुर्ग को एक निवाला नहीं मिलता है ? क्या महान देश का बेटा, अपने बाप को यतीम की तरह छोड़ सकता है ? क्या महान देश का समाज एक बुजुर्ग को कई महीनों तक पल-पल मरता देख सकता है ? बिहार के शेखपुरा के बरबीघा ऐसा ही हुआ है, जहां एक बुजुर्ग की भूख से मौत हो गयी । बेटा हरियाणा में कमाता है, और पैसे की चाहत उसे बाप से ज्यदा है ।
जिसकी मौत हुई उसका नाम जागो मांझी था । जागो की पत्नी भी लकवा ग्रस्त है । जागो की जिन्दगी भले ही जैसी भी रही हो, लेकिन मरने के बाद भी जागो को कफन तक नसीब नहीं हुआ । जागो का अंतिम संस्कार करने वाला भी कोई नहीं था । हालांकि स्थानीय वार्ड पार्षद ने जागो के लिए कफन का इंतजाम किया और उसके बेटे को सूचित कर दिया । वहीं सबसे हैरत की बाद है कि जागो की मौत के बाद अब सियासत तेज हो गयी है । खुद को दलितों का पैरोकार कहने वाले केंद्रीय खाद्य मंत्री रामविलास पासवान ने जागो मांझी की मौत पर बिहार सरकार को जिम्मेदार ठहराया । उनका मानना है कि सरकार ठीक ढंग से दलितों का ख्याल नहीं रख रही है । वहीं बिहार सरकार के खाद्य मंत्री जागो की मौत को आम बता रहे हैं । उनका मानना है कि जागो बीमारी से मरा है । बहरहाल सवाल वही है कि क्या वाकई हमारा देश महान है ।
कुछ निम्नलिखित सवाल भी प्रासांगिक है ।
भूख से मौत पर सियासत ?
मुफलिसी, मजबूरी, मौत बन गया है सियासी मुद्दा ?
क्या संवदेनहीन हो गया है हमारा समाज, शासन और सरकार ?
क्या जागो मांझी की मौत के बाद जागा है सियासतदां ?
मौत के बाद जांच का क्या मतलब ?
क्या जागो मांझी की मौत के बाद बदलेगी तस्वीर ?
क्या गरीबी को भुनाने में लगे हैं सियासतदां ?
क्या गरीबी, भुखमरी सिर्फ मुद्दे बन कर रह गए हैं ?
क्यों मौत से पहले महीनों तक कोई नहीं था सुध लेनेवाला ?
क्या जागो की मौत फिल्मी नथ्था की तरह हो गया है ?
वोट के लिए फिल्मी नथ्था को मारने पर उतारू थी राजनीतिक पार्टियां ?
केंद्रीय खाद्य मंत्री रामविलास पासवान अब तक कहां थे ?
क्या बिहार के सभी गरीबों को मिल रहा है सरकारी अनुदान ?
क्या सभी गरीबों के पहुंच में है खाद्य सुरक्षा अधिनियम ?
क्या खाद्य डीलरों का भ्रष्टाचार भूख दूर करने में है मुख्य बाधा ?
क्या सरकार के पास भुखमरी से लड़ने के लिए नहीं है कोई तंत्र और योजना ?
Monday, 14 March 2016
बड़बोली सियासत !
देश को
इन दिनों सुलगाने की कोशिश की जा रही है । देश में ऐसे मुद्दों को हवा दिया जा रहा
है, जिससे आम लोगों के मानस पर बुरा असर पड़े और फिर ऐसे ही आम लोगों को हथियार बनाकर
राजनीति की लौ जलाई जाए । देश में कई ज्वलंत मुद्दें हैं, जिन पर सियादतदां चुपी
साधे हुए हैं । गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, भुखमरी, किसानों की हत्या, जैसे कई जमीनी मुद्दे हैं, जहां देश हांफ रहा है, और हमारे सियासतदां, देश को इन
तमाम मुद्दों से भटकाने में मशगूल हैं । बड़बोलापन और बेतुके बयानों का मानों जैसे
बहार आ गया हो । सियासतदां एक शिगूफा छोड़ते हैं, और पूरा देश उनके शिगूफा पर मंथन
करने लगता है । आरोप-प्रत्यारोपों की लड़ाई शुरू हो जाती है । इतना ही नहीं, संसद
में ऐसे शिगूफों पर बहस होती है, हंगामा होता है, कार्य स्थगन तक करना पड़ता है । ताजा
मामला कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद से जुड़ा है, जिन पर आरोप है कि उन्होंने संघ
की तुलना आतंकी संगठन ISIS से की है । संघ
का विरोध IS जैसे आतंकी संगठन से करने
का मतलब क्या होता है ? जाहिर सी बात
है, ये बीजेपी के लिए बर्दाश्त करना मुश्किल था । गुलाम नबी
के इस बयान को लेकर राज्यसभा में बीजेपी सांसदों ने जमकर हंगामा किया । बीजेपी
सांसद मुख्तार अब्बास नकवी ने कांग्रेस से इस बयानबाजी पर माफी मांगने की मांग की
। ऐसे में राज्यसभा में हंगामे के बीच गुलाम नबी आजाद ने कहा कि अगर उनके भाषण में
कुछ भी गलत हो तो मेरे खिलाफ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव ला सकते हैं । वहीं AIMIM के नेता असुउद्दीन ओवैसी ने भी विवादित बयान दिया है । उन्होंने
कहा कि मैं भारत माता की जय नहीं कहूंगा, गर्दन पर कोई छूरी रख दे तब भी नहीं कहूंगा
। देश में पहले से ही सौहार्द्र, जाति, आरक्षण जैसे
जटिल मुद्दे मुंह बांये है, और अब संघ की तुलना IS से करने का मामला तुल पकड़ रहा है । ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सियासतदां
आक्रोश की बीज बो कर राजनीति की फसल को हरी-भरी रखते हैं ।
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