Friday, 30 July 2010

कभी किसी रोज

कभी किसी रोज

एहसास तुमसे पुछेगा


पास आकर तुम्हारे दिल के

दिल की हर बात तुमसे पुछेगा

छुपा लेना अपने सारे जज्बातों को

क्योकि.....

बयां-ए-जज्बात ना जाने क्या कह देगें
और फिर मैं चाहता भी तो नही
कि....
यादों की तस्वीर फिर से उभरे
सांसों में फिर से वो तुफान हो
मिलने की व्याकुलता
और होंठो पे मेरा नाम हो
क्योकि.....
ये सब तो बस
एक वहम सा है
कभी किसी रोज
ये वहम टुटेगा
एहसास तुमसे पुछेगा
पास आकर तुम्हारे दिल के
दिल की हर बात तुमसे पुछेगा

कभी किसी रोज
हां कभी किसी रोज...


Saturday, 17 July 2010

बेवफाई बेहतर है बेइमानी से

नये शहर में रौशन आया तो लगा नया सवेरा होगा....लेकिन ये तो वही सुबह है । हल्की-हल्की किरणों के साथ जागता सुरज....और मध्यम होते शाम में रात की आगोश में सोता सुरज....रात भी वही है, चॉद भी वही है, सितारों की चमक और ख्वाबों का जहां भी वही है । फिर क्यूं इतना बनावटीपन है इस शहर में ?
मैं बात कर रहा हुं दिल्ली की । दिल्ली में बहुत लोगों से जान पहचान हुई । कुछ तो कॉलेज में और कुछ कॉलेज से बाहर । कोई खास बनना चाहा और शायद इसमें वो सफल भी हुआ... लेकिन खास का मतलब यहां सिर्फ उसके लिए जुगाड़ होता है । जुगाड़ से मतलब है रिश्तों में मुनाफे का हिसाब । ये मुनाफा कई तरह के होते हैं । अगर आप इस तरह के मुनाफे से वाकिफ़ हैं तो शायद मेरे कहने का मतलब समझ पा रहे होंगें । खैर रिश्तों में हिसाब-किताब करना ही बेइमानी है ।
शायद यही वज़ह है कि बेवफाई बेहतर है बेइमानी से....और हम तो ये भी मानते हैं कि “ अच्छा हुआ सनम कि...मैं बेवफा हो गया, वफादार तो कुत्ते हुआ करते हैं ’’
कितने वफादार कुत्ते को तो मैंने भी देखा है । लेकिन क्या भौंकने भर से वफादारी होती है ? नही ना.........
क्षणिक भर का सुख बहुत दुखदायी होता है । ये जानते हुए भी क्षण भंगुर संसार में रम जाना कितना आश्चर्यजनक है । नये शहर में पुरानी बातें अजीब लगती है । पर हमें ये मान के चलना चाहिए कि शहर कोई सा भी हो मनुष्य का स्वभाव एक सा ही होता है । जिंदगी के राह चलते-चलते एक रौशन ख्वाब से टकरा गया था मैं । मौजो के इस सफर में उफान सा छा जाता है, जब उस हंसी पल में गोते लगाता हुं । सफर के इस हकीकत को अनचाहे ही कोई समझा गया था मुझे । शायद यकीं था उसे खुद पे इतना मेरा सफर था लम्बा जितना ।
“उजाले अपनी यादों का साथ ही रहने देना
जाने किस गली में जिंदगी की शाम ढ़ल जाए”
ये अल्फ़ाज नही मुकमल्ल एक कहानी है । वो रौशन ख़्वाब यही अल्फ़ाज बनके मेरे ज़ेहन में आज भी अभिनव है । लेकिन जिंदगी के इस अनजाने डगर में, मैं यूहीं चला जा रहा हूं । ना रास्तों का इल्म है, ना मंजील की ख़बर । गुमनामी के इस जहां में हस्तें-मुस्कुरातें, ठोकर खाते, गिरते-सम्भलतें खुद की परछाईं का पिछा किये जा रहा हुं । डर है कहीं जिंदगी के इस दौड़ में रफ्तार से समझोता ना करना पड़ जाये । फिर भी यकीं है कि इस अभिनव जगत में ये रौशन भी कभी मील का पत्थर साबित होगा ।“अकेला चला था....अकेला चलूंगा
जिंदगी के सहारे.....ना दो साथ मेरा
कभी तो मैं....खुद को साबित करुंगा
सहज़ मिल सके....वो नही लक्ष्य मेरा
बहुत दूर है मेरे....निशां का सवेरा
अगर थक गये हो....तो तुम लौट जाओ
गगन के सितारे....देगें साथ मेरा ”

Monday, 28 June 2010

हम चले कॉलेज जब

इक तमन्ना ले के निकले
हम चले कॉलेज जब
क्या पता था दिल लुटेगा
हम चले कॉलेज जाब

चॉद रौशन हुआ
हम चले कॉलेज जब
कुछ मिला,कुछ मिल गया
हम चले कॉलेज जब

बेफ्रिक, बेशबरी का आलम
और एहसासों का दौर
कितने ख्वाबों का सफर था
हम चले कॉलेज जब

सामने आये जो तुम
हम सभंल पाये नही
खो गया शायद था कुछ
हम चले कॉलेज जब

दास्तां तो थी अधूरी
जाने कितने कारवां के
बस सफर बढ़ने लगी थी
हम चले कॉलेज जब

दिप का अगर नाम लेलू
बदनामी रौशन की होगी
लौ बन के जल लिये
हम चले कॉलेज जब

लाइब्रेरी भी सुना हुआ था
खाली-खाली लग रहा था
नजरो में कोइ बस चुका था
हम चले कॉलेज जब

साथ दोस्तो का रहता
तन्हा-तन्हा फिर क्यूं लगता
ऐसी हालत पहली दफा था
हम चले कॉलेज जब

घर से आया सोच के
पढ़ना है जी-जान से
जान से ही जी लगा था
हम चले कॉलेज जब

कुछ चुनीन्दे है फ़साने
ख्वाब और मेरे दरमिंया के
यूं ही नही लिख दिया हुं
हम चले कॉलेज जब  

इक तमन्ना ले के निकले
हम चले कॉलेज जब
क्या पता था दिल लुटेगा
हम चले कॉलेज जाब

Saturday, 19 June 2010

रावण को बिहार नसीब नही...

बिहार की राजनीति को पुरा भारत जानता है । केन्द्रीय सरकार खासकर बिहार के राजनीति को बड़े नजदीक से लेती है । आजादी के 6 दशक से लेकर अभि तक बिहार के राजनीति को केन्द्र की राजनीति से जोड़कर देखा जाता रहा है । ऐसा हो भी क्यूं ना..इस राज्य को राजनीति का आखाड़ा माना जाता है । लेकिन क्या वज़ह ऐसा रहा कि राजनीति में अपना स्थान रखने वाला बिहार कभी किसी के लिए बाजार नही बन सका । बाजार की दूर्दशा ने ही बिहार को कभी कॉरपोरेट राज्य नही बनने दिया । एक जमाने में जब झारखंड साथ हुआ करता था तो बिहार के बाजार को सिर्फ यह कह कर नाकार दिया जाता था कि कारखाना, मजदुरी के लिए होती है और मजदूर कभी बाजार नही बना सकते । शायद यही धारणा अभि तक बनी हुइ । बिहार के लोगो को रावण देखने का मौका नही मिल पाया है,या यूं कहे बिहार के लोगो को रावण दिखाना ही नही था । इसकी वजह साफ है बाजार ... बिहार में मनीरत्नम ने रावण रीलीज नही की....कोई जानना नही चाहा की ऐसा मनीरत्नम ने क्यूं किया । लेकिन एक बात जो निकल के सामने आई वोहै बिहार में सिनेमा का बाजार .... सभी जानते है कि बिहार और उत्तर प्रदेश में ही सबसे ज्यादा सिनेमा देखी जाती है । ऐसे में बिहार में रावण का रीलीज ना होना बिहार के सिनेमा घर और वहां के टिकट के रेट से संबंध रखता है । 10,20,या 30 रुपये में बिहार में आसानी से कोई भी नई सिनेमा को रीलीज के दिन ही सिनेमाघर में देखा जा सकता है । मनीरत्नम के लिहाज से रावण को 150 से 1500 वाले दर्शक की दरकार थी । जो उन्हें बिहार में नही मिल सकता था । इसलिए रावण को बिहार में रीलीज नही की गई । लेकिन जिस तरह से रावण को मुंह की खानी पड़ी उससे तो अब बिहार के वो दर्शक भी नही मिलेगें जिसे मनीरत्नम बाजार की श्रेणी में गिनते ही नही ।

Thursday, 17 June 2010

रावण की एंट्री



मनीरत्नम की रावण इस कलयुगी रामायण में कितना सफल होगा । ये तो कल १८ जुन के रीलिज के बाद ही पता चलेगा । लेकिन एक बाद तो ये साफ हो गया है कि रावण में वो नयाब चीज देखने को मिल सकता है जिसके लिए मनीरत्नम जाने जाते हैं । इस से पहले मनीरत्नम की आई फिल्म गुरु सुपरहिट रही थी । और सबसे मजेदार बात उस फिल्म ये थी कि अभिषेक उस फिल्म में अपने पुरे जीवन को जीते हैं । एक कॉरपोरेटर के पुरे समझ को मनीरत्नम ही भाव और भाषा में उतार सकते थे । बहरहाल रावण आने वाला है उत्पात मचाने नही वल्की मनोरंजन करने.....

Saturday, 12 June 2010

विज्ञापन पर राजनीति


विज्ञापन विवाद इस बार बिहार के राजनीति में तहलका मचा रहा है । बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का एक साथ विज्ञापन में नज़र आना बिहार के राजनीति में भुचाल मचा दिया है । हलांकि बिहार में भाजपा, जदयू गठबंधन सरकार है लेकिन हाल ही में आने वाला बिहार विधान सभा चुनाव इस लिहाज से ज्यादा महत्वपुर्ण है कि राजनीति की कौन सी दिशा चुना जाए । नीतीश कुमार हमेशा अपने छवी को एक शांतचित रुप देते आये हैं । लेकिन रात्रिभोज को रद्द करना और विज्ञापन पे कारवाई का फरमान साफ करता है कि वो किस कदर बिहार के चुनाव को लेते हैं । एक ओर जहां नीतीश को सबसे सफल मुख्यमंत्री माना जाता है वहीं नरेन्द्र मोदी गुजरात के विकास का सारा ठिकरा अपने उपर बाधते है । हलांकि नरेन्द्र मोदी आज जिस तरह से बिहारीयों का गुनगान कर रहें थे, उस से तो साफ होता है कि भाजपा अपनी स्थिती ओडिशा की राजनीति की तरह नही करना चाहता है । बहरहाल जिस तरह से राजनीति में विवाद परचार का साधन बनता जा रहा है । तो आने वाला बिहार चुनाल और कई तरह के विवाद को झेल सकता है । अब देखना ये है कि विपक्षी दल इस का कुछ फायदा उठाते है या फिर वो भी इसी तरह के राजनीति में शामिल हो जाते हैं ।

Friday, 11 June 2010

फुटबॉल विश्वकप के आगोश में सिमटा भारत


भारत ईक बार फिर फुटबॉल विश्वकप के आगोश में सिमटा जा रहा है। मीडिया जिस तरह से इस खेल का कवरेज कर रही है, उससे तो लगता है कि भारतीय टीम भी खेल के इस महाकुभं में शिरकत करने वाला है । लोगो का उत्साह और बाजार के रुप में आया ये एक महिने का खेल भारत के उस वर्ग का परचार कर रहा जिसे लोग इंडिया पुकरते हैं । टीवी पे फुटबॉल का खुमार शायद टीआरपी के रफ्तार को कायम रखने के लिए किया जा रहा है । लेकिन टीआरपी के आड़ में बाजार के भागीदारी को नकारा नही जा सकता । शायद यही वज़ह है कि फुटबॉल के खेल में १३३वें स्थान पे रहने वाला भारत इस खेल का कवरेज इतना बढ़-चढ़ के कर रहा है । अभी हाल ही से संपन्न हुआ हॉकी विश्वकप किसी को याद भी नही होगा, वज़ह दो है, पहला इस खेल का बाजार से दूरी और दूसरा सरकार का उदासीपन । कभी हॉकी में सर्वोच्य शिखर पर रहने वाला भारत आज दूसरे राउंड तक भी नही पहुंच पाती है । हम हमेशा मीडिया के सिरे ठेकरा बांध देते है और सरकार को इसका लाभ भी मिल जाता है । सरकार अगर राजनीति तक ही सिमित रहती है तो देश के सर्वांगिक विकास की कल्पना नही की जा सकती है । लेकिन ये इस देश की विडंबना ही है कि यहां हर चीजो पे जमके राजनीति की जाती है । आई पी एल पे हुइ राजनीति क्रिकेट के खेल को जहां शर्मशार करता है, वहीं सरकार के नीति का खुलासा भी साफ तरह से देखा जा सकता है ।फुटबॉल का ब्यार से भारतीय को बहुत कुछ सिखने की जरुरत है ।
खासकर भारत के सरकार को तो जरुर सोचना चाहिए कि आखिर वो कौन सी स्थिती है जिस कारण भारतीय फुटबॉल हाशिये पे है । खैर फुटबॉल के विश्वकप के बहाने ही अगर हम फुटबॉल से जुड़ पाते है तो भी ये फुटबॉल इंडिया के लिए अच्छा ही होगा ।