Saturday, 23 January 2010

बाजारू समाज में वेश्यावृति

समाज का सबसे महत्वपूर्ण अंग बाज़ार होता है और बाज़ार कि स्थिति व्यापार कि सार्थकता पर निर्भर करता है हमारा समाज अति प्राचीन अवधारणाओं पे चलीरही है इस समाज ने व्यापार वर्ग को जन्म दिया जिसका कालांतर में सीमा ख़त्म हो गया है अब जरुरी नही कि सोने का व्यापारी सौनर ही हो या लोहे का व्यापारी लोहार या कोई अन्य व्यापर जिसका सम्बन्ध किसी वर्ग विशेष से रहा हो , वही उसका व्यापर करता हो ऐसे मेंवेस्यावृति का व्यापर हमारे देश में किसी वर्ग विशेष से जुड़ा नहीं रहा है परन्तु इसका व्यापक इतिहास रहा है आज जिस तरह से वेश्यावृति के व्यापर के लिए एक सुझाव निकल के सामने रहा है कि इस धंधे को भी सरकारी मान्तया मिलनी चाहिए तो वाकई उन शोषित और पीड़ित महिलाओं के कल्याण के लिए उठाया गया पहला कदम माना जा सकता है। जिसे समाज शोषित तो करना चाहती है परन्तु स्वीकारना नहीं
हमारे कल के समाज और आज के समाज में बहुत अंतर है हमने विकास के कई तालो को पार कर लिया है और आधुनिकता की बुनियाद भी रख दी है पर क्या वेश्याओ की स्थिति सुदृढ़ हो पाई है ? बहुत ही संवेदनशील सवाल है की जब वेश्याओं का इस समाज में दखल एक अभिन्न अंग के रूप में रहा है तो फिर उनके स्वीकार्यता और मान्यता पे प्रश्न क्यूँ ?
कुछ बुद्धिजीवी वर्ग का मानना है कि वेश्यावृति समाज को दूषित करती है और इसकी मान्यता कतई ना दी जाय तो ऐसे में इस राय कि एक पहलु जो सामने आती है वह यह कि वेश्याएं समाज को दूषित करती है परन्तु वेश्याओं को कौन सा समज बढ़ावा दे रहा है ? एक गरीब समाज जिस समाज में बाल -विवाह होता है और संभोग के प्रति कोई लालसा नहीं रहती है या फिर एक पूंजीवादी समाज जहाँ पैसो का कोई मूल्य नहीं होता और ४० वर्ष उम्र सीमा तक कुवारा रहने कि प्रथा बढ़ रही है
हमेसा से यह कवायत चली रही है कि धोती कुरता सफ़ेद दिखे परन्तु उस सफेदी को जो साबुन बरकरार रखती है उसका महत्व कोई नहीं जानता है ठीक उसी साबुन की तरह वेश्याओं का धंधा है , जो समाज को स्वच्छ बनाये रखने में अपने महत्व को खो बैठी है
वेश्याओं के लिए भी वो सारी सुविधाएं होनी चाहिए जो किसी सामजिक व्यक्ति के लिए होता है आखिर वेश्याओं का सम्बन्ध किसी तीसरी दुनिया के लोगो के साथ नहीं होता है हम वेश्याओं के साथ बिस्तर एक करने के लिए राजी है ,परन्तु इसी बिस्तर को स्थाईत्व देने के लिए नही वेश्याएं अपने तन-
बदन- योवन से इस समाज को तृप्त करती रहे और बदले में समाज उसे रंडी , रखैल , छिनाल , वेश्या ,धंधेवाली आदि उपाधियों से ही संतुष्ट रहने की अपेक्षा करें
आख़िरकार फैसला सरकार के हाथों में है कि वे इस सुझाव को अमिलिजामा का रूप देते हैं या फुहरवादी राजनीति का

Tuesday, 12 January 2010

शिक्षा

एक भारतीय नगरिक होने का अधिकार इस देश के बच्चे को जन्म के साथ मिलता है / और १८ वर्ष की उर्म में उसे वयस्क धोषित कर संविधान में लिखे गये सभी अधिकारों का उत्तराधिकारी भी बना दिया जाता है / इस नविन उर्म मे जब उसे वयस्क धोषित किया जाता है तो उसे इस देश के लोकतान्त्रिक व्यवस्था को समझने के लिए शिक्षा की आवश्यकता महशुस होती है / परन्तु शिक्षा उससे कोशों दूर होता है / (साक्षरता , शिक्षा का पैमाना नहीं होता है ) महानगरो के नवयुवक अपवाद स्वरूप हैं / अब ऐसें में प्रश्न यह उठता है की शिक्षा के स्तर को उठाने के लिए किसी प्रयोग की आवस्यकता है क्या ? तो जबाब बिलकुल हाँ होगा / आज पूरी दुनिया वैश्विकरण की दौर से गुजर रही है और हमारे देश मे अभी तक शिक्षा को साक्षर बनाने का कुंजी माना जा रहा है / जबकि शिक्षा सिर्फ साक्षर बनाने की किंजी मात्र नहीं है वरन यह मनुष्य के जीवन स्तर सुधारने की संस्था है /
विकाशील राष्ट्र की उपाधि मिलने के बाद से भारतीय किशोरों के लिए शिक्षा सबसे अहम हैं /
जिस तरह पश्चिम के देश ने निरंतर अपने शिक्षा शैली को बदला है वह उनके जीवन स्तर को देखने से साफ स्पस्ट हो जाता है / बात बिलकुल साफ है , इस देश को भी तकनिकी शिक्षा की आवश्यकता है / तकनिकी शिक्षा की शुरुआत हमें माध्यमिक विद्यालयों से करना होगा और इस तकनिकी शिक्षा का आधार कंप्यूटर को बनाना होगा / इस तरह से इंटर विद्यालय तक आते -आते हमरे पास कम से कम ऐसें प्रोग्रम्मेर ,डेवलोपोर, डिजाईनर,आधि हो जायेंगे जो इस गओबल मार्केट मे भी अपने को स्थिर कर पाने में सक्षम होंगे /और इस तरह इन किशोरों के मदद से हम विकसित राष्ट्र के सपने को भी सच कर पाएंगे /
बरहहल जिस तरह से शिक्षा पर राजनीति हो रही है और सिर्फ बहस तक ही सिमटी हुई है /सरकार को इस नव दशक में शिक्षा के सभी खामियों को दूर करने के लिए एवं शिक्षा में प्रयोग के लिए मिशन के तहत कार्य करना होगा /
विकाशील राष्ट्र की उपाधि मिलने के बाद से भारतीय किशोरों के लिए शिक्षा सबसे अहम हैं /

Wednesday, 6 January 2010

चेतना

एक सचेतन चेतना

बुद्धि,विवेक और तृष्णा

ज्ञान के भवर में भी

रहे ब्याकुल,विचलित दोगुना

पथ के निर्माण में

अहम् के अभिमान में

रूप की पहचान में

मनुष्य के अज्ञान में

हो एक सचेतन चेतना

बुद्धि,विवेक और तृष्णा

स्मरण में लक्ष्य हो

जाग्रति प्रत्यक्ष हो

स्वप्न का भी तथ्य हो

न हो कोई विडंबना

हो एक सचेतन चेतना

बुद्धि,विवेक और तृष्णा

जीवन की क्षण भंगुरता

ब्रहमांड की है परंपरा

नव आश दीप्त, प्रदीप्त हो

रोशन सुबह का हो सिल

चिंतन

काफी कुछ खत्म हो गया
इस बीते हुए साल मे
न चाहते हुए भी,
मै हु आज इस हल में
ये आँसु ये तनहाई
अमानत है मेरी
क्यूकि मै खुद बिखर गया ,
एक अनजाने से ख्याल में
काफी कुछ खत्म हो गया
इस बीते हुए साल में
न चाहते हुए भी,
मै हु आज इस हल में
ये माना मैंने कि नया साल आएगा
क्या फर्क, लेकिन वो भी पुराना पर जायेगा
फिर आने वाले नाये साल का इंतजार होगा
और ये सफ़र तो यू ही बरक़रार होगा
मै सोचता हु ......
इन्ही बीते हुए सालो से तो सभी की जिन्दगी बनती है
ये मेरे बीते हुए साल , ये मेरे बीते हुए लम्हें तेरा मुझपे अहसान तो रहेगा
हर एक पल तुम मुझसे दूर होते हुए जाओगे
मगर तुम्हारी दी हुए याद ऐसे में मेरे पास तो रहेगा
कि अब तेरे हर वक्त का पहचान तो रहेगा
है कहानी बन गयी मेरे इस हल की
फिर लिखूंगा दास्ताँ मैं नाये साल की
कोई समझे या ना समझे
मैं समझने का कोशिश करूँगा समय की हर चल की
काफी कुछ खत्म हो गया
इस बीते हुए साल मे
न चाहते हुए भी,
मै हु आज इस हल में
ये आँसु ये तनहाई
अमानत है मेरी
क्यूकि मै खुद बिखर गया ,
एक अनजाने से ख्याल में