समाज का सबसे महत्वपूर्ण अंग बाज़ार होता है और बाज़ार कि स्थिति व्यापार कि सार्थकता पर निर्भर करता है ।हमारा समाज अति प्राचीन अवधारणाओं पे चली आ रही है । इस समाज ने व्यापार वर्ग को जन्म दिया जिसका कालांतर में सीमा ख़त्म हो गया है । अब जरुरी नही कि सोने का व्यापारी सौनर ही हो या लोहे का व्यापारी लोहार या कोई अन्य व्यापर जिसका सम्बन्ध किसी वर्ग विशेष से रहा हो , वही उसका व्यापर करता हो । ऐसे मेंवेस्यावृति का व्यापर हमारे देश में किसी वर्ग विशेष से जुड़ा नहीं रहा है । परन्तु इसका व्यापक इतिहास रहा है ।आज जिस तरह से वेश्यावृति के व्यापर के लिए एक सुझाव निकल के सामने आ रहा है कि इस धंधे को भी सरकारी मान्तया मिलनी चाहिए । तो वाकई उन शोषित और पीड़ित महिलाओं के कल्याण के लिए उठाया गया पहला कदम माना जा सकता है। जिसे समाज शोषित तो करना चाहती है परन्तु स्वीकारना नहीं ।
हमारे कल के समाज और आज के समाज में बहुत अंतर है । हमने विकास के कई तालो को पार कर लिया है और आधुनिकता की बुनियाद भी रख दी है । पर क्या वेश्याओ की स्थिति सुदृढ़ हो पाई है ? बहुत ही संवेदनशील सवाल है की जब वेश्याओं का इस समाज में दखल एक अभिन्न अंग के रूप में रहा है तो फिर उनके स्वीकार्यता और मान्यता पे प्रश्न क्यूँ ?
कुछ बुद्धिजीवी वर्ग का मानना है कि वेश्यावृति समाज को दूषित करती है और इसकी मान्यता कतई ना दी जाय ।तो ऐसे में इस राय कि एक पहलु जो सामने आती है वह यह कि वेश्याएं समाज को दूषित करती है परन्तु वेश्याओं को कौन सा समज बढ़ावा दे रहा है ? एक गरीब समाज जिस समाज में बाल -विवाह होता है और संभोग के प्रति कोई लालसा नहीं रहती है या फिर एक पूंजीवादी समाज जहाँ पैसो का कोई मूल्य नहीं होता और ४० वर्ष उम्र सीमा तक कुवारा रहने कि प्रथा बढ़ रही है ।
हमेसा से यह कवायत चली आ रही है कि धोती कुरता सफ़ेद दिखे । परन्तु उस सफेदी को जो साबुन बरकरार रखती है उसका महत्व कोई नहीं जानता है । ठीक उसी साबुन की तरह वेश्याओं का धंधा है , जो समाज को स्वच्छ बनाये रखने में अपने महत्व को खो बैठी है ।
वेश्याओं के लिए भी वो सारी सुविधाएं होनी चाहिए जो किसी सामजिक व्यक्ति के लिए होता है । आखिर वेश्याओं का सम्बन्ध किसी तीसरी दुनिया के लोगो के साथ नहीं होता है । हम वेश्याओं के साथ बिस्तर एक करने के लिए राजी है ,परन्तु इसी बिस्तर को स्थाईत्व देने के लिए नही । वेश्याएं अपने तन- बदन- योवन से इस समाज को तृप्त करती रहे और बदले में समाज उसे रंडी , रखैल , छिनाल , वेश्या ,धंधेवाली आदि उपाधियों से ही संतुष्ट रहने की अपेक्षा करें ।
आख़िरकार फैसला सरकार के हाथों में है कि वे इस सुझाव को अमिलिजामा का रूप देते हैं या फुहरवादी राजनीति का ।
No comments:
Post a Comment