हर साल की तरह इस साल भी
खुद की नुमाइंदगी करता रहा अपने ख्वाबों में
कि चांद से इश्क करना कितना आसां है दोस्तो
मगर सोचो...
गर चांद रु-ब-रु हो जाए ख्वाब के फलक पर तो...
तो...
दिल की धड़कनों पर इख्तियार नहीं रहता
सांसे चलती है, पर जिस्म को इसका दरकार नहीं रहता
बस उस लम्हें में सिमट कर खो जाने की ख्वाहिस होती है
सच कहूं...
नये साल का जरा सा भी इंतजार नहीं रहता
हर साल की तरह इस साल भी
खुद की नुमाइंदगी में मजबूरियों की पैमाइश की
कि वक्त की हुकूमत रही
लेकिन...
आज़माइश के गाढ़े रंगों से
सियासी जिन्दगी में भी...
रंग-ए-नूर बनाता रहा...
तब्दिलियों की सख्त इनाय़त थी मुझको
लेकिन सच कहूं...
नये साल का जरा भी इंतजार नहीं रहा
हर साल की तरह इस साल भी
वायदों और शिकायतों का एक खजाना मिला
और मैं...
बेकसूर आसमां की तरह
आसूंओं की बूंद
दिलों की बिजलियां
और बनने-बिगड़ने की दौर को समेटे रहा
इतने सब को दूर होता देख...
सच कहूं दोस्तो...
नये साल का जरा भी इंतजार नहीं रहा...
खुद की नुमाइंदगी करता रहा अपने ख्वाबों में
कि चांद से इश्क करना कितना आसां है दोस्तो
मगर सोचो...
गर चांद रु-ब-रु हो जाए ख्वाब के फलक पर तो...
तो...
दिल की धड़कनों पर इख्तियार नहीं रहता
सांसे चलती है, पर जिस्म को इसका दरकार नहीं रहता
बस उस लम्हें में सिमट कर खो जाने की ख्वाहिस होती है
सच कहूं...
नये साल का जरा सा भी इंतजार नहीं रहता
हर साल की तरह इस साल भी
खुद की नुमाइंदगी में मजबूरियों की पैमाइश की
कि वक्त की हुकूमत रही
लेकिन...
आज़माइश के गाढ़े रंगों से
सियासी जिन्दगी में भी...
रंग-ए-नूर बनाता रहा...
तब्दिलियों की सख्त इनाय़त थी मुझको
लेकिन सच कहूं...
नये साल का जरा भी इंतजार नहीं रहा
हर साल की तरह इस साल भी
वायदों और शिकायतों का एक खजाना मिला
और मैं...
बेकसूर आसमां की तरह
आसूंओं की बूंद
दिलों की बिजलियां
और बनने-बिगड़ने की दौर को समेटे रहा
इतने सब को दूर होता देख...
सच कहूं दोस्तो...
नये साल का जरा भी इंतजार नहीं रहा...
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