Tuesday, 31 December 2013

चाय की दुकान पर

चाय की दुकान पर
तू जाने की जिद्द ना कर इस सुबह
मैं तेरे एहसास के कोहरा से ढ़क चुका हूं

कुछ देर तू अपनी हाथों को
रहने दे मेरे हथेलियों में
कि लग रहा है जैसे इस सर्दी में
अलाव सेक रहा हूं मैं...

कि देख ना...
चांद सुबह तक रौशन है
सुबह पर चांद का कैसा मिठा सितम है ?

यूं ना जिद्द की अटखेलियां कर
सितम करना है....
तो करने से ना डर
बस मेरी बांहों की लिवास बन जा तू
कि चाय की भी इतनी क्या पड़ी है

मेरे लहजे-मोहब्बत पर
कसूर इन बादलों का है
कि मुझे तेरी आंखों के सिवा
कुछ दिख नहीं रहा 'रौशन'

चलो... मैं आज तुम्हें
मोहब्बत के गर्म चुस्कियों से रु-ब-रु करा दूं
लवों को प्याली में रख के
सांसों का गर्म भाप पिला दूं

तड़प की चिंगारी से
आग जिस्मों में लगा दूं
महक की चाय पत्ती हो
ऐसी चाय तू कह तो बना दूं..

बस...
चाय की दुकान पर
तू जाने की जिद्द ना कर इस सुबह
मैं तेरे एहसास के कोहरा से ढ़क चुका हूं

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