Friday, 27 December 2013

इतिहास बनाती 'आप' की राजनीति

राजनीति की परिभाषा ही राजा के नीति का पर्याय है...लेकिन बात जब लोकतंत्र की होती है तो राजनीति की परिभाषा को गढ़ा और मढ़ा जाता है...रामलीला मैदान में वंदे मातरम और भारत माता की जय का उदघोष करता हुआ ये हुंकार...दिल्ली की राजनीति की परिभाषा बदल देगा...किसे पता था ? हम बात कर रहे हैं आम आदमी पार्टी के ऐतिहासिक विजय की...जी ऐतिहासिक...क्योंकि इसने भारतीय राजनीति की धूल पड़ चुके उस किताब को फिर से लिखने के लिए ताजा आंकड़े मुहैया कराया...जिसमें रिकोर्डों को सहेज कर रखा जाता है । दरअसल हरियाणा के एक छोटे से कस्बे से निकले अरविन्द केजरीवाल की पार्टी का गठन 26 नवंबर 2012 को होता है और आम आदमी पार्टी यानी आप दिल्ली में पहली बार चुनाव लड़ती है...बस यहीं से एक नये इतिहास उदय होता है....सत्तारुढ़ कांग्रेस की नीतियां दिल्ली के आम आदमी के पहुंच से बाहर होती जा रही थी...और उपर से भ्रष्टाचार..घपला..घोटाला...भी कांग्रेस के लिए आम हो चली थी...ऐसे में अरविंद केजरीवाल उसी आम आदमी को... पार्टी...संगठन..यूनियन होने का आह्वान करते हैं... और केजरीवाल देश की सबसे ताकतवर महिला मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को 26 हजार से ज्यादा मतों से हराते हैं...शीला दीक्षित के पास देश में सबसे ज्दाया दिनों तक महिला मुख्यमंत्री रहने का रिकोर्ड है...ऐसे में देश के सबसे ताकतवर और सबसे ज्दाया दिनों तक महिला मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को हराना वाकई...किसी अजूबे से कम नहीं है...20 साल के अपने विधानसभा करियर में दिल्ली को मुख्यमंत्री के रुप में चार चेहरा मिला....जिसमें तीन बीजेपी के मदनलाल खुराना...साहेब सिंह वर्मा और सुषमा स्वराज...जबकि कांग्रेस की शीला दीक्षित लगातार तीन बार मुख्यमंत्री रहीं....इतिहास देखिए की दिल्ली में दो बार सरकार प्याज के बढ़ते दोमों से बदल गया...इतिहास के पन्ने पर आम आदमी पार्टी की स्याह की बुंद गिर चुकी थी...और पहली बार दिल्ली में गैर बीजेपी और गैर कांग्रेसी सरकार का विकल्प केजरीवाल की पार्टी आप देती है....पहली बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रामलीला मैदान में शपथ ग्रहण लेते हैं...पहली बार ऐसा होगा कि दिल्ली में सबसे बड़े पार्टी की सरकार नहीं होगी...देश में पहली बार ऐसा होगा कि... सत्तारुढ़ सभी विधायक पहली बार विधानसभा के लिए चुने गये हों...पहली बार ऐसा होगा कि विधानसभा में मंत्रियों की पूरी कैबिनेट नई नवेली होगी.... पहली बार 50 सालों से चुनाव न हारने का विश्व रिकोर्ड बना चुके चौ. प्रेम सिंह को आप के उम्मीदवार अशोक कुमार 16 हजार से ज्यादा मतों से जीत दर्ज करते हैं...पहली बार देश देख रहा है कि पहला चुनाव लड़ने वाली पार्टी सरकार बनाई है...पहली बार ऐसा होगा कि सरकार के सारे मंत्री-संत्री...सरकारी सुविधाओं जैसे आवास...सुरक्षा का बहिष्कार करेंगे...पहली बार ऐसा होगा कि मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के लिए ऑथ सेरोमनी में सीएम पद का उम्मीदवार पब्लिक ट्रांसपोर्ट से आएंगे....पहली बार ऑथ सेरोमनी में आम आदमी को अखबारों में विज्ञापन देकर खुला न्योता दिया गया है...पहली बार समर्थन देने वाली पार्टी कांग्रेस को शर्तों का खत थमाया जाता है...पहली बार नुक्कड़ से...मौहल्ला सा...फेसबुक से तो ट्यूटर से सरकार बनाने के लिए कोई पार्टी रायशुमारी करती है...पहली बार...पहली बार...पहली बार.. ना जाने कितनी पहली बार और है... जो आप को ‘आप’ बताने वाली है ....इंतजार कीजिए पहली बार सत्तारुढ़ हुई आम आदमी पार्टी के नीतिगत फैसलों का...शायद भविष्य में और भी बहुत कुछ पहली बार देखने को मिल जाए....

Saturday, 14 September 2013

तुम्हारी आंखों में ना जाने कितने रास्तें हैं



तुम्हारी आंखों में ना जाने कितने रास्तें हैं
जब भी मैं इन आंखों को देखता हूं
भटक सा जाता हूं
कभी सोचता हूं...
वो जो रौशन रास्तें हैं,
जो इन आंखों के किनारे-किनारे
तुम्हारे दिल तक का सफर तय करते हैं
पर, मैं भी सफर कर के देखूं क्या ?
लेकिन डरता हूं...
दिल के तुम्हारे उस चौराहे से
जहां पर रास्ते खत्म होते हैं
और एक पतली सी पगडंडी आती है
तुम्हें पता है...
ये पगडंडी इतनी पतली है कि
मेरा जिस्म इसमें समा भी नहीं सकता
यहां से सिर्फ, मैं अपनी दिल की धड़कनों को
तुम्हारे दिल तक भेज सकता हूं
लेकिन...क्या तुम्हारा दिल …
मेरी धड़कनों की आवाज को सुन सकता है
जो पगडंडियों के रास्ते तुम्हारे दिल तक पहुंचा है
है ना अजीब सवाल...
ये रास्तें भी तो अजीब है
जहां मैं अपनी धड़कनों को छोड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा
और तुम उस आवाज को नहीं सुन पा रही हो...
जो मेरे दिल में धड़कनें बन के, धक-धक कर रही हैं ।

Sunday, 21 July 2013

ये रस्में-रिवाज़, ये रवायतें

ये मज़हबों के इल्म भी
ख़लल डालते हैं ईमान से
हमें सोख़ गुलशन की दरकार थी
ये हुर रौशन कहां से आ मिला

बड़े नाज़-नख़रे, बड़ी सोखियां
गुप्तगु हुई तो पता चला


वो रकीब मेरा, मैं हबीब सा
नुर-ए-इश्क हमपे मेहरबां हुआ

दो दिल जुड़े, दो जहां मिला
दो मज़हबें ना मिल सकी
ये रस्में-रिवाज़, ये रवायतें
ये मज़हबी दस्तुर के वायदें

मेरी आशिकी को कत्ल किया
खुदा मज़हबों के इल्म ने
क्या है वज़ह इस सितम का रब
या तू रज़ा है मज़हबों के इल्म से

देखो लब्ज़ों से अफ़साने बन गये

गुप्तगु के सिलसिले से अल्फ़ाजों की सौदेबाजी हुई
कि देखो लब्ज़ों से अफ़साने बन गये

अंज़ुमन दो दिन...
और दो हजार लब्ज़ों की सौदेबाजी
हां... जैसे
अचानक से लब्ज़ों का सैलाब लग गया हो

कुछ भी तो नया नहीं था
इस गुप्तगु के सिलसिले में
की-बोर्ड पर तेजी से उंगली चलाने के सिवा

लब्जों के मतलब वही थे
मौसम का मिज़ाज
और नई तरह की अंग्रेजी वाली हिन्दी वही थी

हां... फितूर नहीं था
जो आशिकों में होती है
(माफ कीजियेगा फितूर हम में भी है पर आशिकी...? )

तो समझ में आया
अफ़साने लब्ज़ों से तो बन जाते हैं
पर गुप्तगु से
मौसकी के धून नहीं बनते ।

मेरे गरीब दिल का कोई संविधान नहीं है



मेरे गरीब दिल का कोई संविधान नहीं है
इसका ये मतलब नहीं
कि इसकी इच्छाओं का कोई संरक्षक नहीं
मैं बिना शपथ लिए हुए ही
अपने दिल का संविधान रचता हूं

मुझे संवेदनाओं के मत नहीं चाहिए
जिसके बहुमत से
असंवेदनाओं की बाढ़ आ जाए

इसे बाजारु और बनावटीपन स्नेह से नफरत है
इसलिए नहीं कि...
इसका भाव लगाया जा सकता है
बल्कि इसलिए...
क्योंकि इससे स्नेह का भ्रष्टाचार फैलता है
मर्यादाओं की सीमाएं टूटती है
और कानून की मांग बढ़ती है

कानून का मतलब है...
संविधान...
जिसमें धाराओं और अनुच्छेदों का विस्तार हो

और मैं
स्नेह का भ्रष्टाचार
असंवेदनाओं की बाढ़
और कई तरह की अनियमिताओं को
अपने दिल पर बर्दाश्त नहीं कर सकता
भले ही गरीबी कितनी क्यूं ना हो
इसलिए
मेरे दिल का कोई संविधान नहीं है ।

Saturday, 22 June 2013

लापरवाह हवाओं से


लापरवाह हवाओं से
दिल की बातें बतियाना
लगता तो पागल जैसा है
पर  इन बातों से मुझे क्या लेना

झुल्फों के निचे का बादल
होटों से उसका टक्कराना
सुर्ख़ मुलायम गालों को
चुपके से छुके आना
हवा सुनाती है मुझको
प्यार भरा ये अफ़साना

धूप को आंचल से ढ़कती है
शर्म से उसका मुस्काना
ये सब अदा है जानम का
हवा बताती है मुझसे

लापरवाह हवाओं से
दिल की बातें बतियाना

मौसम संग संवरती है वो
चांद सा अंग निखरती है वो
जूगनु की रौशन हो जैसे
तितली पर मरती है वो

लापरवाह हवाओं से
दिल की बातें बतियाना



Thursday, 28 March 2013

अजनबी बनके मैं तुमसे रहुं सदा


अजनबी बनने के लिए अक्सर ईमानदारी का सहारा लेता हूं । खुद से थोड़ी सी बेवफाई और ढ़ेर सारी उम्मीद, उम्मीद इस बात की कि शायद ईमानदारी से निभा रहा अजनबीपन खत्म होगा कभी । आप सब को नज़र-ए-रौशन कर रहा हूं इसी गूथ्थम-गूथ्थी से उपज़े शब्दों को...।



मुझसे उम्मीद तू कर मेरे दोस्त
अजनबी बनके मैं तुमसे रहुं सदा

इतना आसान नहीं होगा मेरे लिए
फिर भी...
कर वादा कि ...
मेरे परेशां वक्त में भी,
तू मुझसे ना मिलेगा कभी

अचानक से अजनबी बनना
बहुत मुश्किल है...
पर तेरे ख़्वाहिश को जिंदा रखना
मेरी चाहत है...

लिख के अपनी बातों को मिटा सकता हूं
कह कर अपनी बातों को दोहरा सकता हूं
लेकिन वो बात ही...
क्यूं कहूं तुमसे
जिसमें लिखने की गुंजाइश हो
जिसमें कहने की जरूरत हो
और....
ये तभी मुमकिन है
जब...
हम इतने अजनबी बने कि
मेरे चौराहे पर खड़े होने से
तुम अपना एक रास्ता बदल दो

मुझसे उम्मीद तू कर मेरे दोस्त
अजनबी बनके मैं तुमसे रहुं सदा

शाम की धूप
जो रात की आगंन में ना खिलता हो कभी
रात का चांद
जो सुबहों की रोशनी से ना मिलता हो कभी
मेरे अजनबी-पन पर भी ये इनाय़त हो
कि हिज़्र के लम़्हें मेरे हो
और ख़्वाब का आइना हो उसका

इतना आसान नहीं होगा मेरे लिए
फिर भी...
टूटते तारों से भी लोग उम्मीद करते हैं

तू मुझसे भी उम्मीद कर मेरे दोस्त
अजनबी बनके मैं तुमसे रहुं सदा