Saturday, 14 September 2013

तुम्हारी आंखों में ना जाने कितने रास्तें हैं



तुम्हारी आंखों में ना जाने कितने रास्तें हैं
जब भी मैं इन आंखों को देखता हूं
भटक सा जाता हूं
कभी सोचता हूं...
वो जो रौशन रास्तें हैं,
जो इन आंखों के किनारे-किनारे
तुम्हारे दिल तक का सफर तय करते हैं
पर, मैं भी सफर कर के देखूं क्या ?
लेकिन डरता हूं...
दिल के तुम्हारे उस चौराहे से
जहां पर रास्ते खत्म होते हैं
और एक पतली सी पगडंडी आती है
तुम्हें पता है...
ये पगडंडी इतनी पतली है कि
मेरा जिस्म इसमें समा भी नहीं सकता
यहां से सिर्फ, मैं अपनी दिल की धड़कनों को
तुम्हारे दिल तक भेज सकता हूं
लेकिन...क्या तुम्हारा दिल
मेरी धड़कनों की आवाज को सुन सकता है
जो पगडंडियों के रास्ते तुम्हारे दिल तक पहुंचा है
है ना अजीब सवाल...
ये रास्तें भी तो अजीब है
जहां मैं अपनी धड़कनों को छोड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा
और तुम उस आवाज को नहीं सुन पा रही हो...
जो मेरे दिल में धड़कनें बन के, धक-धक कर रही हैं ।

Sunday, 21 July 2013

ये रस्में-रिवाज़, ये रवायतें

ये मज़हबों के इल्म भी
ख़लल डालते हैं ईमान से
हमें सोख़ गुलशन की दरकार थी
ये हुर रौशन कहां से आ मिला

बड़े नाज़-नख़रे, बड़ी सोखियां
गुप्तगु हुई तो पता चला


वो रकीब मेरा, मैं हबीब सा
नुर-ए-इश्क हमपे मेहरबां हुआ

दो दिल जुड़े, दो जहां मिला
दो मज़हबें ना मिल सकी
ये रस्में-रिवाज़, ये रवायतें
ये मज़हबी दस्तुर के वायदें

मेरी आशिकी को कत्ल किया
खुदा मज़हबों के इल्म ने
क्या है वज़ह इस सितम का रब
या तू रज़ा है मज़हबों के इल्म से

देखो लब्ज़ों से अफ़साने बन गये

गुप्तगु के सिलसिले से अल्फ़ाजों की सौदेबाजी हुई
कि देखो लब्ज़ों से अफ़साने बन गये

अंज़ुमन दो दिन...
और दो हजार लब्ज़ों की सौदेबाजी
हां... जैसे
अचानक से लब्ज़ों का सैलाब लग गया हो

कुछ भी तो नया नहीं था
इस गुप्तगु के सिलसिले में
की-बोर्ड पर तेजी से उंगली चलाने के सिवा

लब्जों के मतलब वही थे
मौसम का मिज़ाज
और नई तरह की अंग्रेजी वाली हिन्दी वही थी

हां... फितूर नहीं था
जो आशिकों में होती है
(माफ कीजियेगा फितूर हम में भी है पर आशिकी...? )

तो समझ में आया
अफ़साने लब्ज़ों से तो बन जाते हैं
पर गुप्तगु से
मौसकी के धून नहीं बनते ।

मेरे गरीब दिल का कोई संविधान नहीं है



मेरे गरीब दिल का कोई संविधान नहीं है
इसका ये मतलब नहीं
कि इसकी इच्छाओं का कोई संरक्षक नहीं
मैं बिना शपथ लिए हुए ही
अपने दिल का संविधान रचता हूं

मुझे संवेदनाओं के मत नहीं चाहिए
जिसके बहुमत से
असंवेदनाओं की बाढ़ आ जाए

इसे बाजारु और बनावटीपन स्नेह से नफरत है
इसलिए नहीं कि...
इसका भाव लगाया जा सकता है
बल्कि इसलिए...
क्योंकि इससे स्नेह का भ्रष्टाचार फैलता है
मर्यादाओं की सीमाएं टूटती है
और कानून की मांग बढ़ती है

कानून का मतलब है...
संविधान...
जिसमें धाराओं और अनुच्छेदों का विस्तार हो

और मैं
स्नेह का भ्रष्टाचार
असंवेदनाओं की बाढ़
और कई तरह की अनियमिताओं को
अपने दिल पर बर्दाश्त नहीं कर सकता
भले ही गरीबी कितनी क्यूं ना हो
इसलिए
मेरे दिल का कोई संविधान नहीं है ।

Saturday, 22 June 2013

लापरवाह हवाओं से


लापरवाह हवाओं से
दिल की बातें बतियाना
लगता तो पागल जैसा है
पर  इन बातों से मुझे क्या लेना

झुल्फों के निचे का बादल
होटों से उसका टक्कराना
सुर्ख़ मुलायम गालों को
चुपके से छुके आना
हवा सुनाती है मुझको
प्यार भरा ये अफ़साना

धूप को आंचल से ढ़कती है
शर्म से उसका मुस्काना
ये सब अदा है जानम का
हवा बताती है मुझसे

लापरवाह हवाओं से
दिल की बातें बतियाना

मौसम संग संवरती है वो
चांद सा अंग निखरती है वो
जूगनु की रौशन हो जैसे
तितली पर मरती है वो

लापरवाह हवाओं से
दिल की बातें बतियाना



Thursday, 28 March 2013

अजनबी बनके मैं तुमसे रहुं सदा


अजनबी बनने के लिए अक्सर ईमानदारी का सहारा लेता हूं । खुद से थोड़ी सी बेवफाई और ढ़ेर सारी उम्मीद, उम्मीद इस बात की कि शायद ईमानदारी से निभा रहा अजनबीपन खत्म होगा कभी । आप सब को नज़र-ए-रौशन कर रहा हूं इसी गूथ्थम-गूथ्थी से उपज़े शब्दों को...।



मुझसे उम्मीद तू कर मेरे दोस्त
अजनबी बनके मैं तुमसे रहुं सदा

इतना आसान नहीं होगा मेरे लिए
फिर भी...
कर वादा कि ...
मेरे परेशां वक्त में भी,
तू मुझसे ना मिलेगा कभी

अचानक से अजनबी बनना
बहुत मुश्किल है...
पर तेरे ख़्वाहिश को जिंदा रखना
मेरी चाहत है...

लिख के अपनी बातों को मिटा सकता हूं
कह कर अपनी बातों को दोहरा सकता हूं
लेकिन वो बात ही...
क्यूं कहूं तुमसे
जिसमें लिखने की गुंजाइश हो
जिसमें कहने की जरूरत हो
और....
ये तभी मुमकिन है
जब...
हम इतने अजनबी बने कि
मेरे चौराहे पर खड़े होने से
तुम अपना एक रास्ता बदल दो

मुझसे उम्मीद तू कर मेरे दोस्त
अजनबी बनके मैं तुमसे रहुं सदा

शाम की धूप
जो रात की आगंन में ना खिलता हो कभी
रात का चांद
जो सुबहों की रोशनी से ना मिलता हो कभी
मेरे अजनबी-पन पर भी ये इनाय़त हो
कि हिज़्र के लम़्हें मेरे हो
और ख़्वाब का आइना हो उसका

इतना आसान नहीं होगा मेरे लिए
फिर भी...
टूटते तारों से भी लोग उम्मीद करते हैं

तू मुझसे भी उम्मीद कर मेरे दोस्त
अजनबी बनके मैं तुमसे रहुं सदा












Friday, 15 March 2013

आगरा के कुछ अनछुए पहलु


मेरे जेहन में हमेशा ये रहता था कि ताज की वजह से आगरावासियों की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई होगी, 

लेकिन जमीनी स्तर पर हकीकत इससे काफी परे है । वहां के एक रिक्सेवाले ने बताया आगरा का 

समाजशास्त्र ।वह कहता है साहब ताजमहल आगरा के लोगों के लिए हमेशा से शोषण का कारखाना रहा है । 

राजा के तानाशाही वर्ताव ने ताजमहल के कारीगरों पर जो जुल्म किए हैं वो तो जग जाहिर है, आपने भी 

किताब में पढ़ी होगी, लेकिन आज के ये मुर्ति वाली माता (मायादेवी) और लेपटॉप वाले बाबा (अखिलेश 

यादव) ने भी कम जुल्म नहीं ढ़ाये हैं । ताज की खूबसुरती ने वहां के पारंपरिक रोजगार (जूता-चप्पल 

निर्माण) को काफी प्रभावित किया है । सरकार ने खूबसुरती के नाम पर आगरा से सभी चमड़ा कारखाना 

को बंद करा दिया । यहां पर संसाधन होने के बावजूद भी कोई नये कारखाना की बात नहीं कर सकता है । 

ये बेरोजगारी ताज की देन है । ताजमहल शानो-शौकत, रुतबा, की बात है, लेकिन हम तो गरीब हैं, ना ही 

रुतबा है, ना ही शानो-शौकत । इसलिए रोज जलिल होते हैं, कभी अपने देश के लोगों के सामने तो कभी 

फिरंगियों के सामने । साहब सरकार का ताजमहल पर इतना ताम-झाम होता है कि यहां की जनता 

परेशान रहते हैं । आपलोगों को तो लगता है कि आपकी वजह से (ताज-पर्यटक) यहां के लोगों का रोजी 

रोटी चलता है । लेकिन इसमे सच्चाई कम है । हम दिल्ली के जितने नजदिक हैं उस हिसाब से हमारी 

प्रगति नही हूई है, वजह है ताज । नहीं तो हम भी नोयडा, गुड़गांव की तरह डेवलोप हो गये होते । आखिर 

हमसे मेहनती तो नहीं है वहां के लोग । ताजमहल की बुनियाद ने आगरा के आसमान को हड़्ड़प लिया है । 

और क्या बताउं साहब आपको किताब लिखनी हो तो बताना हमने सुना है, ऐसे ही बातों को लिखकर लोग 

महान लेखक बन जाते हैं ।