हर सुबह का उगता सूरज एक नयी उम्मीद लेके आता है..लेकिन हर शाम के ढ़लते सूरज के साथ ये उम्मीदें तोड़ देती है । इंतज़ार है अब बस एक रौशन सुबह की...
Monday, 28 December 2015
अदभुत, अद्वितीय, 'अटल'
भारत के राजनीतिक
इतिहास में अटल बिहारी बाजपेयी का संपूर्ण व्यैक्तिक विकास शिखर पुरुष के रुप में
दर्ज हैं....भारत में ही नहीं बल्कि... दुनिया में उनकी पहचान एक कुशल राजनीतिक
राजनीतिज्ञ... प्रशासक... भाषाविद्.... कवि... पत्रकार और लेखक के रूप में है...
स्वाधीनता आंदोलन से लेकर आपातकाल और आधुनिक भारत की राजनीति में अटल बिहारी
वाजपेयी एक अटल योद्धा की धुरी हैं....राजनीति में उदारवाद के सबसे बड़े समर्थक
हैं अलट.... वे विचारधारा की कीलों से कभी अपने को नहीं बांधा... राजनीति को दलगत
और स्वार्थ की वैचारिकता से अलग हट कर अपनाया और उसको जिया.... जीवन में आने वाली
हर विषम परिस्थितियों और चुनौतियों को स्वीकार किया... नीतिगत सिद्धांत और
वैचारिकता का कभी कत्ल नहीं होने दिया... राजनीतिक जीवन के उतार चढ़ाव में
उन्होंने आलोचनाओं के बाद भी अपने को फिट रखा...और अपने आप को अपनी गीतों की तरह
रखा...कभी हार नहीं माना...कभी रार नहीं ठाना...तो आज बात अद्भुत, अद्वितीय अटल की... भारत रत्न अटल बिहारी
वाजपेयी...एक ऐसा नाम....जिसने राजनीति की नई परिभाषा गढ़ी...जिनके होने से विपक्ष
का मर्यादा बढ़ा...जिनके कविताओं के ओज से देश मंत्र मुग्ध हो गया...ना सिर्फ
देश...बल्कि पूरा विश्व पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी के कुशल भाषण शैली का
दिवाना रहा है...एक समय तो ऐसा भी आया था कि अमेरिका को भी अटल के दृढ निश्चय ने
विचलित कर दिया था…25 दिसंबर 1924 ..... हिन्दुस्तान के इतिहास का सबसे स्वर्णीय दिनों
में से दिन था....राष्ट्रीय क्षितिज पर स्वच्छ छवि के साथ अजातशत्रु कहे जाने वाले
कवि और पत्रकार....सरस्वती पुत्र अटल बिहारी वाजपेयी....का जन्म 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर में
ब्रह्ममुहर्त में हुआ
अटल जी का जन्म 25 दिसम्बर 1924 को ब्रह्ममुहर्त
में ग्वालियर में हुआ था.... मान्यता के अनुसार अलट बिहारी की जन्म की खुशी में
जहां घर में फूल की थाली बजाई जा रही थी ....तो वहीं पास के गिरजाघर में घंटियों
और तोपों की आवाज के साथ प्रभु ईसामसीह का जन्मदिन मनाया जा रहा था... शिशु का नाम
बाबा श्यामलाल वाजपेयी ने अटल रखा था.... माता कृष्णा देवी दुलार से उन्हे अटल्ला
कहकर पुकारती थीं....अटल के पिता का नाम पं. कृष्ण बिहारी वाजपेयी था... वे हिन्दी, संस्कृत और अंग्रेजी तीनों भाषा के विद्वान
थे.... पं. कृष्णबिहारी वाजपेयी ग्वालियर राज्य के सम्मानित कवि थे... उनके द्वारा
रचित ईश प्रार्थना राज्य के सभी विद्यालयों में कराई जाती थी....अटल जी की
शिक्षा-दिक्षा ग्वालियर में ही सम्पन्न हुई....1939 में जब वे
ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज में अध्ययन कर रहे थे... तभी से राष्ट्रीय स्वंय संघ
में जाने लगे थे... अपने दोस्त खानवलकर के साथ हरेक रविवार को आर्यकुमार सभा के
कार्यक्रमों में भाग लेते थे... वहीं उनकी मुलाकात शाखा के प्रचारक नारायण जी से
हुई... अटल जी उनसे बहुत प्रभावित हुए और रोज शाखा जाने लगे...
अटल बिहारी
वाजपेयी - एक परिचय
बात 1957 की है....दूसरी लोकसभा में भारतीय जन संघ के
सिर्फ़ चार सांसद थे.... इन सासंदों का परिचय तत्कालीन राष्ट्रपति एस राधाकृष्णन
से कराया गया....तब राष्ट्रपति ने हैरानी व्यक्त करते हुए कहा कि वो किसी भारतीय
जन संघ नाम की पार्टी को नहीं जानते….अटल बिहारी
वाजपेयी उन चार सांसदों में से एक थे.....लेकिन चार सांसदों वाला जनसंघ जो बाद में
बीजेपी में तब्दील हो गया...देश की राजनीति में अहम मुकाम रखता है....यह सच है कि
भारतीय जन संघ से भारतीय जनता पार्टी और सांसद से देश के प्रधानमंत्री तक के सफ़र
में अटल बिहारी वाजपेयी ने कई पड़ाव तय किए.... नेहरु-गांधी परिवार के
प्रधानमंत्रियों के बाद अटल बिहारी वाजपेयी का नाम भारत के इतिहास में उन चुनिंदा
नेताओं में शामिल है.... जिन्होंने सिर्फ़ अपने नाम... व्यक्तित्व...और करिश्मे के
बूते पर सरकार बनाई.... एक स्कूल टीचर के घर में पैदा हुए वाजपेयी के लिए शुरुआती
सफ़र ज़रा भी आसान न था.... 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर के एक निम्न मध्यमवर्ग परिवार में
जन्मे वाजपेयी की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा ग्वालियर के ही विक्टोरिया जो कि अब
लक्ष्मीबाई कॉलेज और कानपुर के डीएवी कॉलेज में हुई....उन्होंने राजनीतिक विज्ञान
में स्नातकोत्तर किया और पत्रकारिता में अपना करियर शुरू किया.... उन्होंने
राष्ट्र धर्म, पांचजन्य और वीर अर्जुन
का संपादन किया....
जन संघ और बीजेपी
1951 में वो भारतीय जन संघ के
संस्थापक सदस्य थे....अपनी कुशल भाषण शैली से राजनीति के शुरुआती दिनों में ही
उन्होंने रंग जमा दिया.... हालांकि लखनऊ से लोकसभा के उप चुनाव में वो हार गए
थे.... 1957 में जन संघ ने उन्हें तीन लोकसभा सीटों लखनऊ..
मथुरा और बलरामपुर से चुनाव लड़ाया.... लखनऊ में वो चुनाव हार गए... मथुरा में
उनकी ज़मानत ज़ब्त हो गई... लेकिन बलरामपुर से चुनाव जीतकर वो दूसरी लोकसभा में
पहुंचे...और अगले पांच दशकों के लिए उनके संसदीय करियर की यहीं से शुरुआत हुई....1968 से 1973 तक वो भारतीय जन
संघ के अध्यक्ष रहे.... विपक्षी पार्टियों के अपने दूसरे साथियों की तरह उन्हें भी
आपातकाल के दौरान जेल भेजा गया.... 1977 में जनता पार्टी
सरकार में उन्हें विदेश मंत्री बनाया गया.... इस दौरान संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन
में उन्होंने हिंदी में भाषण दिया और वो इसे अपने जीवन का अब तक का सबसे सुखद क्षण
बताते हैं.... 1980 में अटल बिहारी वाजपेयी
ने लालकृष्ण आडवाणी के साथ मिलकर बीजेपी की संस्थापना की... 1980 से 1986 तक वो बीजेपी के
अध्यक्ष रहे... और इस दौरान वो बीजेपी संसदीय दल के नेता भी रहे....
सांसद से
प्रधानमंत्री
दूसरी लोकसभा से
तेरहवीं लोकसभा तक अटल बिहारी वाजपेयी नौ बार लोकसभा के लिए चुने गए....हालांकि
बीच में कुछ लोकसभाओं से उनकी अनुपस्थिति रही.... ख़ासतौर से 1984 में जब वो ग्वालियर में कांग्रेस के माधवराव
सिंधिया के हाथों पराजित हो गए थे....1962 से 1967 और 1986 में वो राज्यसभा
के सदस्य भी रहे....16 मई 1996 को वो पहली बार प्रधानमंत्री बने....लेकिन
लोकसभा में बहुमत साबित न कर पाने की वजह से 31 मई 1996 को उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा.... इसके बाद 1998 तक वो लोकसभा में विपक्ष के नेता रहे.... 1998 के आम चुनाव में सहयोगी पार्टियों के साथ
उन्होंने लोकसभा में अपने गठबंधन का बहुमत सिद्ध किया और इस तरह एक बार फिर
प्रधानमंत्री बने.... लेकिन AIDMK का गठबंधन से
समर्थन वापस ले लेने के बाद उनकी सरकार गिर गई... और एक बार फिर आम चुनाव हुए....
1999 में हुए चुनाव राष्ट्रीय
जनतांत्रिक गठबंधन के साझा घोषणापत्र पर लड़े गए... और इस चुनाव में वाजपेयी के
नेतृत्व को एक प्रमुख मुद्दा बनाया गया.... गठबंधन को बहुमत हासिल हुआ और वाजपेयी
ने एक बार फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली....पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी
वाजपेयी को 27 मार्च, 2015 को देश के सर्वोच्चय सम्मान भारत रत्न पुरस्कार
से सम्मानित किया गया...जिसमें राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र
मोदी समेत कई अन्य गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
Saturday, 16 May 2015
अपनी गेसुओं से लड़ती रहती हैं वो
अपनी गेसुओं से लड़ती रहती हैं वो
लापरवाह तो नहीं....
पर जब भी देखूं, बड़ी रौशन लगती हैं वो
उनकी जुल्फों से जाके ऐ हवा तू ही कह दे
है खबर उनको भी...
फिर क्यों बेखबर सी रहती हैं वो
ये माना कि सितम का सिलसिला
उनके हुस्न और जुल्फों के बीच है
पर ये दिल सितम सहता है...
ये क्यों नहीं जानती हैं वो
अख्तियार सही न सही तेरा
गेसुओं के खुलने बिगड़ने पर
पर लुट सा जाता है रौशन
जब वो जुल्फों से लड़ती झगड़ती हैं
हो यकीन तुझको भले न ऐ जुल्फ
कुछ बेपरवाह, कुछ तुमसे खासमखास जुड़ी हैं वो
वजह यही है कि जब भी मैं...
उनकी जुल्फों को संवारने की कोशिश करुं तो
कुछ उनकी आंखें, कुछ आइना से हया उतार लेती हैं वो
उनकी फितरत पर शक है रौशन
बार-बार खुलती है, फिर भी बेमिसाल लगती हैं वो
दो चार गेसुओं के लट ऐसे भी हैं रौशन
जो बार-बार उनकी गालोें को चूमती हैं
फिर भी बेख्याल रहती हैं वो
इत्तेफाकन नहीं मेरी नजरों में उनकी जुल्फें आ बसी है
ये तो दिल है मेरा जो जानना चाहता है
जुल्फों पर इनायत इतना, रौशन से क्यों भागती हैं वो
अपनी गेसुओं से लड़ती रहती हैं वो
लापरवाह तो नहीं....
पर जब भी देखूं, बड़ी रौशन लगती हैं वो
लापरवाह तो नहीं....
पर जब भी देखूं, बड़ी रौशन लगती हैं वो
उनकी जुल्फों से जाके ऐ हवा तू ही कह दे
है खबर उनको भी...
फिर क्यों बेखबर सी रहती हैं वो
ये माना कि सितम का सिलसिला
उनके हुस्न और जुल्फों के बीच है
पर ये दिल सितम सहता है...
ये क्यों नहीं जानती हैं वो
अख्तियार सही न सही तेरा
गेसुओं के खुलने बिगड़ने पर
पर लुट सा जाता है रौशन
जब वो जुल्फों से लड़ती झगड़ती हैं
हो यकीन तुझको भले न ऐ जुल्फ
कुछ बेपरवाह, कुछ तुमसे खासमखास जुड़ी हैं वो
वजह यही है कि जब भी मैं...
उनकी जुल्फों को संवारने की कोशिश करुं तो
कुछ उनकी आंखें, कुछ आइना से हया उतार लेती हैं वो
उनकी फितरत पर शक है रौशन
बार-बार खुलती है, फिर भी बेमिसाल लगती हैं वो
दो चार गेसुओं के लट ऐसे भी हैं रौशन
जो बार-बार उनकी गालोें को चूमती हैं
फिर भी बेख्याल रहती हैं वो
इत्तेफाकन नहीं मेरी नजरों में उनकी जुल्फें आ बसी है
ये तो दिल है मेरा जो जानना चाहता है
जुल्फों पर इनायत इतना, रौशन से क्यों भागती हैं वो
अपनी गेसुओं से लड़ती रहती हैं वो
लापरवाह तो नहीं....
पर जब भी देखूं, बड़ी रौशन लगती हैं वो
Sunday, 10 May 2015
वो हवा बनूं, मैं दुआ करूं
वो जो चूमती तेरे लब को जो
वो हवा बनूं, मैं दुआ करूं
सुबह ओस की तरह तुम्हें भीगा सकूं
शाम जुगनूओं सी तुम में सजा करूं
मेरे यार, दोस्त, मेरा शहर, जहां
मेरी आरजू, मेरी इंतहां
इन्हें नाज है तुमपे उस ताज सा
जो महल है मोहब्बत की निशां
वो जो चूमती तेरे लब को जो
वो हवा बनूं, मैं दुआ करूं
वो जो जुल्फे रेशम तुझे रौशन करे
मैं घटा बनकर उसे बिगाड़ दूं
तू लड़ा करे अपने हुस्न से
मैं आइना बनकर तुझे सवार दूं
वो जो चूमती तेरे लब को जो
वो हवा बनूं, मैं दुआ करुं
कुछ ख्वाब अहसासों की हो
कोई लब्ज तेरा बन सकूं
वो जो गीत तेरे ओठों पर हो
वो मैं लिखूं, उसे मैं सुनूं
वो जो चूमती तेरे लब को जो
वो हवा बनु, मैं दुआ करूं
वो जो चहक उठना तेरा अंजुमन
वो पल बनूं, तुझपे फना करूं
वो कहीं दूर दरिया के साथ यूं
हाथों में हाथ लेकर चला करूं
वो जो चूमती तेरे लब को जो
वो हवा बनूं, मैं दुआ करूं
वो जो दिल तेरा, तेरे पास है
वो दिल बनूं, उस दिल में समा सकूं
तू यकीन कर मेरे इश्क पर
मैं रौशन सुबह तुझे दिखा सकूं
वो जो चूमती तेरे लब को जो
वो हवा बनूं, मैं दुआ करूं
वो जो मानती जिसे रब है तू
वो शिला बनूं, तुझे पास अपने बुला सकूं
ये दिल के मजहब का सवाल है
तू कबूल कर, मैं दुनिया को बता सकूं
वो जो फूल तितली परी रंग है
सबसे कहूं तुमसे हया करे
वो जो चूमती तेरे लब को जो
वो हवा बनूं, मैं दुआ करूं
वो हवा बनूं, मैं दुआ करूं
सुबह ओस की तरह तुम्हें भीगा सकूं
शाम जुगनूओं सी तुम में सजा करूं
मेरे यार, दोस्त, मेरा शहर, जहां
मेरी आरजू, मेरी इंतहां
इन्हें नाज है तुमपे उस ताज सा
जो महल है मोहब्बत की निशां
वो जो चूमती तेरे लब को जो
वो हवा बनूं, मैं दुआ करूं
वो जो जुल्फे रेशम तुझे रौशन करे
मैं घटा बनकर उसे बिगाड़ दूं
तू लड़ा करे अपने हुस्न से
मैं आइना बनकर तुझे सवार दूं
वो जो चूमती तेरे लब को जो
वो हवा बनूं, मैं दुआ करुं
कुछ ख्वाब अहसासों की हो
कोई लब्ज तेरा बन सकूं
वो जो गीत तेरे ओठों पर हो
वो मैं लिखूं, उसे मैं सुनूं
वो जो चूमती तेरे लब को जो
वो हवा बनु, मैं दुआ करूं
वो जो चहक उठना तेरा अंजुमन
वो पल बनूं, तुझपे फना करूं
वो कहीं दूर दरिया के साथ यूं
हाथों में हाथ लेकर चला करूं
वो जो चूमती तेरे लब को जो
वो हवा बनूं, मैं दुआ करूं
वो जो दिल तेरा, तेरे पास है
वो दिल बनूं, उस दिल में समा सकूं
तू यकीन कर मेरे इश्क पर
मैं रौशन सुबह तुझे दिखा सकूं
वो जो चूमती तेरे लब को जो
वो हवा बनूं, मैं दुआ करूं
वो जो मानती जिसे रब है तू
वो शिला बनूं, तुझे पास अपने बुला सकूं
ये दिल के मजहब का सवाल है
तू कबूल कर, मैं दुनिया को बता सकूं
वो जो फूल तितली परी रंग है
सबसे कहूं तुमसे हया करे
वो जो चूमती तेरे लब को जो
वो हवा बनूं, मैं दुआ करूं
Thursday, 23 April 2015
जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में संशोधन कितना सार्थक ?
नजर नेक भी हो
बदनाम उमर करती है
डगर एक ही हो सफर जिंदगी तय करती है
कहते हैं बच्चों का मन कोरे कागज की तरह होता है, जिसपर
कोई भी लकीर खींचों तो वो स्थाई हो जती है, लेकिन क्या आपने
कभी सोचा है कि अगर ये लकीरें जज्बातों से ऊपर उठकर नशेबाजी, संभोग और बेपर्दा शैली के स्याही से रंगी हो नतीजा क्या हो सकता है?
जाहिर है अगर आपके भी बच्चे इस दौर से गुजर रहे हैं तो चिंता हो रही
होगी । लाजिमी भी है, लेकिन जरा मतलब की
बात करते हैं । केंद्रीय कैबिनेट ने जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में
संशोधन को मंजूरी दे दी । वाकई सराहनीय पहल है और शायद देर से
ही सही लेकिन ऐतिहासिक कदम उठाया गया है, लेकिन क्या इस पहल
मात्र से ही अपराध कम हो जाएंगे ? बड़ा सवाल है, छोटी उम्र में जिस तरह से बड़े जुर्म की बानगी सामने आ रही है वो आपके,
हमारे और सबके लिए चिंता का सबब है । समझना जरूरी
इसलिए है, क्योंकि कानूनों में बदलाव से बाल अपराधियों के मन में खौफ तो पैदा किया जा
सकता है लेकिन बुनियाद स्तर पर जो अपराधिक प्रवृति पनप रही है, उसपर अंकुश लगाना नामुम्किन
है । वजह कई हैं । जरा इस गाने पर गौर फरमाइए
चार बोतल वोडका
काम मेरा रोज का...
दम दम दम दम खींच
मेरे हमदम
हां मैं एल्कोहलिक
हूं
क्या इन गानों
का असर मासूम दिमाग पर आघात नहीं करता? बिल्कुल करता है, ऐसे गानें डॉयलॉग्स और ना जाने कई ऐसी चीजें बच्चों को गलत कामों के लिए प्रेरित
कर रही हैं । जिस उम्र में बच्चे अपना रोल मॉडल तलाशते हैं उस
उम्र में पश्चिमी सभ्यता के ये छिंटे बच्चों को बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं । रही सही कसर हमारी समाजिक स्थिति ने पूरा कर दिया है । भौतिकवाद का जमाना है और हम इस रेस में ऐसे भाग रहे हैं कि संयुक्त परिवार
से एकल परिवार होते हुए आज हम एकांतवास के प्रारूप में जीने को मजबूर हो गए हैं । पैसे कमाने के लिए परिवार के सदस्य इस कदर व्यस्त हैं कि बच्चों को व्यवहारिक
और नैतिक ज्ञान का परिचय भी नहीं पता और ऐसे में चंचल मन को
टीवी और इंटरनेट ने अपराध की नई दिशा की ओर धकेलना शुरू कर दिया है, ना चाहते हुए भी जिस तरह से अवांछित चीजें आज परोसी जाती हैं वो बाल मन पर
कुठाराघात करने में कोई कसर नहीं छोड़ती । तो ऐसे में लाजिमी
हो जाता है ये सवाल कि क्या महज अपराधियों की उम्र का आंकलन कर लेने भर से बाल अपराध
थम जाएंगे ? दिल्ली के निर्भया कांड से पहले बाल अपराध होते
तो थे लेकिन बहस नहीं होती थी । यही वजह है कि इस पहल को खुद
निर्भया के परिजन भी सराह रहे हैं । वाकई सराहनीय
पहल है इसमें कोई दो राय नहीं है लेकिन इससे 16 से 18 साल के बीच के बच्चे तो डरेंगे लेकिन जो अपराध 14 या
15 साल के बच्चे कर रहे हैं उनका क्या....इसलिए
जरूरी ये है कि अपराध पर लगाम लगाने से ज्यादा अपराधिक प्रवृति को पनपने से रोकने की
कवायद की जाए ताकि देश का कल मजबूत और बेदाग हो सके....
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