एक नदी
के ह्रदय से अगर कराह की आवाज निकले....एक नदी अगर अपनी
कलकलाहट को छोड़... मौन हो जाये....एक नदी
की आत्मा को जब समाज दूषित करने लगे...तो उस नदी के दर्द को समझना
जरूरी है....तो पलामू की गंगा...यानी कोयल
नदी की कहानी
मैं पलामू
की गंगा हूं....मुझे यहां के लोग कोयल नदी के नाम से जानते
हैं....मैं अपनी सुनदरता, स्वच्छता,
अविरलता के लिए दशकों तक चर्चित रही...मैं समाज
को जीवन...प्रकृति को सौन्दर्य...और राज्य
को समृद्धि प्रदान करती हूं...लेकिन आज मेरे स्वछंदता पर सवाल
है...मेरी अविरलता का अस्तित्व खत्म हो रहा है...मैं खुद अपनी सुनदरता को तरस रही हूं...राज्य व्यवस्था
मुझे कूड़े कचरों की वाहिनी बनाने पर तुली है...लेकिन फिर भी
मैं अपने भाग्य पर रोना नहीं चाहती हूं....मैं सत्तासीनों को
याद दिलाना चाहती हूं कि ... मैं जीवन हूं....और मेरे अस्तित्व से खिलवाड़ तुम्हारा नाश का कारण बन सकता है...इसलिए शासकों, अपनी निन्द्रा से उठो....प्रशासन लापरवाही की हदों को पहचानों और लोगों अपनी मानवता को टटोलो...नहीं तो ऐसा ना हो कि मैं...जीवनदायनी नदी...हमेशा के लिए लुप्त हो जाऊं....क्योंकि सरकार से लेकर
जनता तक सभी को पता है कि मेरे पर लाखों आबादी निर्भर है...सिंचाई
से लेकर पीने के पानी तक के लिए प्रतिदिन लाखों लोगों का जीवन का आधार हूं....मैं खुद अब सरकार और प्रशासन से अपने अस्तित्व को बनाये रखने की गुहार कर रही
हूं...मुझे कूड़े के ढेर...बेतरतीब गंदरी
के अंबार से बचा लो....
देश की
बिडंवना है कि प्रधानमंत्री और उनके मंत्री स्वच्छता अभियान चलाते हैं...पूरे विश्व में वाहवाही लूटी जाती है...लेकिन परिणाम
मेरी तस्वीर है....मुझे लेकर राजनीतिक पार्टियां राजनीति करती
हैं...एक मुझे अविरल और स्वच्छ बनाने का दावा करती है...तो दूसरा
मुझे मुद्दा बना कर सरकार को कोसने का....
प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी ने पलामू की जनता को पानी की समस्या से निजात दिलाने का दावा किया था...लेकिन मुझे प्रतिदिन अभी भी दूषित किया जा रहा है....मैं भले शिकायत कितनी भी कर लूं...लेकिन सरकार है कि
अपने अभियान को सफल मानकर खुद पीठ थपथपा रही है....मेरे दिल से
निकल रही कराह को अगर सरकार सुन ले तो मुझ पर बड़ा उपकार होगा....मैं गंगा बहती हूं क्यों ?


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