Saturday, 23 January 2016

तुम दिल्ली, चाहत सी मेरी

तुम दिल्ली, चाहत सी मेरी
रात रागनी, नई नवेली
सुबह ओस सी होठ तुम्हारे
हंसते ही पड़ जाए गालों पर दरारें
थोड़ी मीठी, थोड़ी मय जैसी
तुम दिल्ली, चाहत सी मेरी

तुम अलसाई, अंगड़ाई सी दिल्ली
दिन चढ़ते मुस्काई दिल्ली
शाम सांस बनकर हो चलती
धड़कन सी हो तुम मेरी दिल्ली
शहर में तुम हो, तुम सा ये शहर है
पूछूं तो इतराये दिल्ली

नैन-नक्श मिलता है सबकुछ
जैसे तुम बकबक करती हो
कुछ भी कहां सुनता है दिल्ली
तुम दिल्ली, तृप्ती सी मेरी

तुम में जिनता शोरगुल है
उतनी चंचल सी वो पागल है
आसमान से आगे का रास्ता
उसपर चलने को वो व्याकुल है

तुम जैसी ही ढीठ वो जिद्दी
प्यारी भी तुमसी है दिल्ली
दिल्ली तुमसे मैं मिलता हूं
तुमसा रौशन हो जाता हूं

मेरी इशक कहानी तुम से
होके जुदा कहां रौशन रहता हूं
ऐसी प्यास, अधूरी दिल्ली
तुम दिल्ली, चाहत सी मेरी

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