Tuesday, 13 December 2011

तेरे रास्तों का मैं रहगुजर

मेरे साथ तेरा वजूद है
या तेरे वजूद का मैं हमसफर
मेरे राह में तेरा साथ है
या तेरे रास्तों का मैं रहगुजर

मैं सोचता हूं तुम कौंन हो
खामोश इतना मौन हो
अस्तित्व हर पल तेरा भी है
फिर...
मेरे मैं ही है क्यूं तेरा ये घर

पथ हो या हो पगडंडियां
निशा चांदनी या रौशन सुबह
हर पल मेरे 'मैं' में हो
या मैं हूं तेरा दिल जिगर

मेरे साथ ही जन्में हो तुम
मेरे साथ ही तेरा अन्त है
पर अंधेरे पल में तुम
छुप जाते हो जाने कहां
मेरे लौटने की उम्मीद हो
या उम्मीद का हो कारवां



मेरे साथ तेरा वजूद है
या तेरे वजूद का मैं हमसफर
मेरे राह में तेरा साथ है
या तेरे रास्तों का मैं रहगुजर

Friday, 2 December 2011

गुजरे पल की कसक

यूँ सोचता हूँ ..
कि पल जो गुजरतें हैं
वो मेरे थे कभी
            अब भी आता हुआ पल
            मेरा ही है
फिर ...
क्यूँ तलाशता हूँ
गुजरे पल को अक्सर
                   उस फिजा को
                   उस महक को
                   उस रवानगी को
                   जो हमने बनाई थी
ये बात, उफ़ ये बात 
बीतते पल के साथ महसूस होती  है  
कि पल-पल की खासियत है अपनी 
                            मगर फिर भी ...  
गुजरे पल की कसक  
आने वाले पल से ज्यादा होती   है

Wednesday, 23 November 2011

ये मुस्कुराहट तो वो नही

ये तन्हाई कितनी प्यारी है

शायद मेरे महबूब से भी ज्यादा


                   ये ख़ामोशी कितना कुछ कहता है

                   शायद मेरा महबूब भी जो ना कह सका
इस आवारगी में भी कितना सुकून है

शायद सादगी जो ना कर सका
                   ये मुस्कुराहट तो वो नही

                   जिसके खिलते ही लव गुलाब बनते थे
ये आह्ट तो वो नही

जिसके सुनते ही दिल में चिराग चलते थे

                   ये तस्वीर बनावटी है
या फिर ...

                  बनावटीपन ही तम्हारी छवि है

Saturday, 12 November 2011

दिल की आवारगी ना पूछों



इस दिल की आवारगी ना पूछों
उनकी ऑखों के इनायत ब्यां करने होगें
रौशन हुआ ये नहीं यूहीं
उनकी ऑखों के मदहोशी जाया करने होगें
इस दिल की आवरगी ना पूछों
उनकी ऑखों के इनायत ब्यां करने होगें
मुकम्मल जिन्दगी की ना चाह थी
ना ही ख्वाहिशों का कोई दरिचा
ब्यार-ए-इश्क उनकी ऑखों से यूं चला
आवरे दिल में भी
मोहब्बत का धूआं सुगलने लगा
सुलगते इस जलन की बेकरारी ना पूछों
महकते उनके आंचल को ब्यार बनने होगें
इस दिल की आवरगी ना पूछों
उनकी ऑखों के इनायत ब्यां करने होगें
अज़ीब कसमाकस है
प्यारी सी तड़प और दर्द के बीच
जो रहता रात-दिन है
पर समझ पाता नहीं हूं मैं
इस नासमझी का मतलब ना पूछों
उनकी ऑखों के हया होगें ये
इस दिल की आवारगी ना पूछों
उनकी ऑखों के इनायत ब्यां करने होगें
यूहीं इत्तेफ़ाक फिर अचानक मिल जाये वो
कि रौशन चांद कर देगा उन ऑखों को
नया मौसम वो होगा गुलशन की गवाही में
सजी-सवरी फ़िज़ा होगी, हवा की बाहों से
मगर ये आलम ना पूछों
उनकी ऑखों के इंतजार को जवां करने होगें
इस दिल की आवारगी ना पूछों
उनकी ऑखों के इनायत ब्यां करने होगें

Wednesday, 2 November 2011

ईक बात कहूं तुमसे...

ये कैसी कसक है कि उनकी याद दूर होती नहीं
हर बार मुझे उनसे कुछ कहना होता था
सकुचा के बातों बात में हिम्मत जुटा के
मैं कहता ...
ईक बात कहूं तुमसे...
वो लव्ज़ों को ओठों पे लाके
हां में सिर हिलाती
उसकी आंखें, मेरे चेहरे के हर भंगिमा को पढ़ने

की कोशिश करताऔर मैं अनजुमन ही कहता...
कुछ नहीं...
शायद उसे भी मालुम था
मेरे ‘कुछ नही’ का मतलब
तभी तो उसके हां में सर हिलाने
में उत्साह होता था
अभिनव की नई छटा और
उत्सव का नया रंग होता था
क्या वाकई उसे ‘कुछ नही’ का मतलब पता था ...
या यूहीं उनकी नज़दिकियों ने
मेरे दिल के साथ है फ़रेब किया

Saturday, 15 October 2011

चल शाम तू जा रही जिस कदर

चल शाम तू जा रही जिस कदर
मै भी अपने घर को चला
तू ढल रही जिस कदर
मै भी थक चूका

क्या तू कल फिर हसीं शाम आएगी
अपने आगोश में मौसम की जवानी और रात होने का अहसास लाएगी
अगर हाँ
तो क्यू ???
तम्हारे हिस्से का ये कैसा पल है
तम्हारी आवारगी का ये शिला है या
मोहब्बते रंजिश में तुम रोज़ आती हो
खैर ...
तम्हारे आने जाने का ये सिलसिला
मुझे उत्साहित करता है
तुम रोज़ ढल के आ सकती हो
तो क्या मै रोज़ थक के तम्हारे साथ नही जा सकता हूँ

Wednesday, 12 October 2011

तर्क करना वाजिब नहीं होगा

लोगों के आक्रोश और देश में व्याप्त धांधली का माहौल कभी भी किसी को भी
अपने आगोश में ले लेगा शायद यही वजह है की प्रशांत भूषण पिट गये और
अन्ना टीम हस्त्प्रद हैं .
नेतागण भले इस बात को यह कह कर मुकर जाये कि मेरे पास इस विषय में कोई जानकारी नहीं है
लेकिन ये वारदात उनको सचेत राजनीति करने पर मजबूर कर देगा, अन्यथा अंजाम के विषय में
तर्क करना वाजिब नहीं होगा