रोशन सुबह का हो सिल
हर सुबह का उगता सूरज एक नयी उम्मीद लेके आता है..लेकिन हर शाम के ढ़लते सूरज के साथ ये उम्मीदें तोड़ देती है । इंतज़ार है अब बस एक रौशन सुबह की...
Wednesday, 6 January 2010
चेतना
रोशन सुबह का हो सिल
चिंतन
इस बीते हुए साल मे
न चाहते हुए भी,
मै हु आज इस हल में
ये आँसु ये तनहाई
अमानत है मेरी
क्यूकि मै खुद बिखर गया ,
एक अनजाने से ख्याल में
काफी कुछ खत्म हो गया
इस बीते हुए साल में
न चाहते हुए भी,
मै हु आज इस हल में
ये माना मैंने कि नया साल आएगा
क्या फर्क, लेकिन वो भी पुराना पर जायेगा
फिर आने वाले नाये साल का इंतजार होगा
और ये सफ़र तो यू ही बरक़रार होगा
मै सोचता हु ......
इन्ही बीते हुए सालो से तो सभी की जिन्दगी बनती है
ये मेरे बीते हुए साल , ये मेरे बीते हुए लम्हें तेरा मुझपे अहसान तो रहेगा
हर एक पल तुम मुझसे दूर होते हुए जाओगे
मगर तुम्हारी दी हुए याद ऐसे में मेरे पास तो रहेगा
कि अब तेरे हर वक्त का पहचान तो रहेगा
है कहानी बन गयी मेरे इस हल की
फिर लिखूंगा दास्ताँ मैं नाये साल की
कोई समझे या ना समझे
मैं समझने का कोशिश करूँगा समय की हर चल की
काफी कुछ खत्म हो गया
इस बीते हुए साल मे
न चाहते हुए भी,
मै हु आज इस हल में
ये आँसु ये तनहाई
अमानत है मेरी
क्यूकि मै खुद बिखर गया ,
एक अनजाने से ख्याल में
Saturday, 12 December 2009
प्रेम सिद्धांत

यार तु ही सोच न आँधी-तुफान और प्यार कभी बता के आता है, नही न । तो फिर..... मैं कैसे इस प्यार को रोक लू.......सबसे अजीब बात तो यह है मेरे प्यार कि की दिल को बरसात में भींगे बाल अच्छे लगते है तो सर्दियों में सहमें चाल , गर्मियों में पोछती पसीना तो बसंत में फूलो की तरह खिलती हँसी बेमिशाल । अब भला तु ही फैसला कर , दिल तो एक है पर हसिनाएँ......... गिना नही जा सकता । मैं अगर अपने दिल को खुश करने के लिए कुछ हसीनाओं से प्यार कर लेता हूँ तो इन हसीनाओं का क्या जायेगा । वैसे तुझे तो पता है “सारा जमाना हसीनो का दिवाना , जमाना कहें फिर क्यों बुरा है दिल लगाना” ।
यार मेरे दिल में बहुत प्यार है और मैं अपने प्यार को बांटना चाहता हूं । इसीलिए तो ये नायाब राश्ता मैंने अपनाया है “क्योकि प्यार नही वो चीज़ जो बाजार में मिल जाए” और “कैसे खरिदोगे तुम प्यार को , बिकता नही ये बाजार में” और वैसे भी हमारे देश में आय से अधिक संपत्ति रखना जुर्म है । तो फिर तुम मुझे ये बताओं कि प्यार से अधिक प्यार रखना जुर्म नही है । मैं प्यार के नजरो में जुर्म नही करना चाहता हुँ । इसीलिए प्यार बांटता हूँ और हरेक कुछ दिनों बाद अपनी गर्लफ्रेंड बदल लेता हूँ । प्यार को लेकर के मेरे मन में जो श्रद्धा है, लोग शायद समझ नही पाते है । मैं अपने आर्दश के रुप में भगवान श्री कृष्ण को मानता हूँ । मुझे कृष्ण की लिलाओं से सिख मिली है , मेरे दोस्त ।
प्यार की मर्यादा भंग न हो, इसीलिए मैं अलग-अलग लड़कियों से प्यार करता हूँ क्योकि “प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो” ।
इसी बीच वह कहता है कि अब जब तुम प्यार का ज्रिक कर दिया है तो पूरी सिद्धांत सुन के ही जाना । आओ बैठ के चाय पीते है । क्योकि चाय के चुस्की के साथ संवाद अच्छे निकलेगे ।
मैं अपने दोस्त के प्यार सिद्धांत की विस्तृत विवरण लय से अचंभित था । और सोच रहा था कि मेरे दोस्त ने प्यार सिद्धांत के हरेक विषय को किस तार्किक लय से प्रस्तुत कर रहा है । शायद पॉजिटिव थिंक का उदाहरण देना हो तो मेरा यह दोस्त मुझे सबसे पहले याद आयेगा ।
हूँ ! तो प्यार सिद्धांत है, है न ।
यार वाकई मैं तो अपने प्यार सिद्धांत से इस समाज को कुछ सिखाना चाहता हुँ कि प्यार के बिना समाज कितना अधुरा है, क्योकि “दूनिया में आये हो तो लव कर लो, थोड़ा सा जी लो, थोड़ा मर लो” ।
तुझे पता है मैने बजाफते एक गर्लफ्रेंड लिस्ट बना रखी है, और यह लिस्ट क्यूँ बनाई है जानना चाहेगा क्योकि इस लिस्ट के माध्यम से मैं एक सर्वे कर सकुँ, और समाज की स्थिति अभिव्यक्त कर सकुँ । यह लिस्ट मुझे अपनी पुरानी गर्लफ्रेंड से संर्पक बनाये रखने में सहायता करता है । और मैं इस लिस्ट के आधार पर उन सभी का हाल जान लेता हूँ ।
और तो और मैं तुम्हे बता दूँ, लगभगत. वो सारी लड़कियाँ जो कभी मेरी गर्लफ्रेंड हुआ करती थी, आज बॉयफ्रेंड के नाम से चिढ़ती है । इस तरह अगर मेरे प्यार सिद्धांत को दूसरी नजरिया से देखोगे तो तुम्हे लगेगा कि मैं एक समाज सुधारक का काम कर रहा हुं । समाज में बढ़ रही बॉयफ्रेंड- गर्लफ्रेंड रिवाज़ को कम रहा हूँ ।
इतना कहते कहते मेरे दोस्त की आँखें भर आई और मैं अपने दोस्त के होथो को धिरे से पकड़ के दबाया और एक अपरिभाषित लहजे में कहा कि मैं तेरे दर्द को समझ सकता हुं यार.......... तुम तो सचमुच में अपना जीवन समाज सुधार कार्य में लीन कर चुके हो ।
इस वाक्य को सुनते ही मेरा दोस्त मेरे तरफ उम्मीद की नजर के साथ देखते हुए कहता है तो चल आज से इस समाज सुधार कार्य में तु भी लग जा और “आई लव यू” का रट्टा ऐसा मार जैसे बचपन में वन, टु, थ्री का रट्टा लगाया था ।
मुझे लगा मैं फंसने वाला हूँ, सो मैंने उसी के लहजे में उस से कहा कि यार हर कोई समाज सुधारक नही हो सकता है अगर ऐसा होता तो समाज को सुधारने की जरुरत ही नही होती । मेरे दोस्त ने मुझसे तभी शिघ्रता से पुछा, तेरी गर्लफ्रेंड का क्या हाल है, तुम्हारी..........
मेरे चेहरे पे खामोशी छा गई । मुझे लगा मैं उस रेगिस्तान में हुँ जहॉ आँधी ने अचानक दम तोड़ दिया हो । और कह रहा हो “पत्थर के सनम तुझे मैंने मोहब्बत का खुदा माना” ।
तभी मेरे दोस्त ने कहा, यार तु तो सच्च में इमोशनल हो गया । मुझे पता है तेरे दिल की हालत “और इस दिल में क्या रखा है तेरा ही प्यार छुपा रखा है, चीर के देखे दिल मेरा तो तेरा ही नाम छुपा रखा है” ।
छुपाये रख अपने प्यार को, साले तुझे पता नही आज की लड़कियां दिल चीर के देखने नही आती है । उन्हें तो बस “दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिए बस एक दफा़ मेरा कहा मान लीजिए” ।
और लड़की पटाने का यह सबसे Simple तरिका है । एक दफा लड़कियों का कहना मान लो......फिर वो तुम्हारी.........समझे ......
मैं अपने दोस्त की बातों से ज़रा प्रभावित हो रहा था और मुझसे रहा नही गया । मैं उससे पुछ बैढ़ा कैसे कर पाता है ये सब ...... । इसका जबाब उसने बड़ा सटीक दिया । सब तुम्हारी कृपा है । मैंने कहा मेरी कृपा है.....तो उसने कहा तुम्हारी......मतलब मीडिया की......
मीडिया ने ही सपना दिखाया कर “लो दूनिया मुट्ठी में” मीडिया की वज़ह से ही आज “थींक हट के” है मेरी । मीडिया ने ही डेयरिंग बनाया क्योकि “डर के आगे जीत है” । मीडिया ही करता है “सीधी बात नो बकवास” । मीडिया ने ही मिंटोस लाइफ जीना सिखाया है जहाँ ये नही सोचा जाता है कि मैं कॉलेज में आ गया और अभी तक एक भी लड़की को नही पटा सका, जहाँ ये सोचा जाता है कि इतनी सारी लड़कियां कॉलेज में है और कोई भी मुझे नही पटा सकी । मीडिया ही आइडिया को तवज्जु देती है क्योकि “एक आइडिया जो बदल दे आपकी दूनिया” । कभी कहती है “पास आओ पास आओ” तो कभी एक ऐसी असंतुष्टि पैदा करती है जो “ये दिल मागें मोर” का रट्ट लगाये रहती है ।
मैं अपने दोस्त के हर नजरिये को सुन रहा था किस तरह से वो विज्ञापन के श्लोगनो को भी प्यार करने के लिए उत्तरदायी मानता है ।
मैं अपने ऐसे दोस्तों का परिचय तो करा दूं, जो इस सिद्धांत के वाहक हैं
राजेश रौशन, सोफ्टवेयर इंजीनियर हैं लेकिन प्यार इनका मुख्य विषय है ।
अभिनव अभि, पत्रकारिता कर रहें हैं लेकिन अपने नाम के अनुरुप प्यार में भी नव अभिनव करना इनका शौख़ है ।
Tuesday, 10 November 2009
हम भारतीय बहुत उदार होते है । और यही उदारता है कि हमने हैदराबाद मैच को भावावेश में आकर मेहमान टीम को तोहफा में दे दिया । अगर यह मैच जीत जाते तो सचीन का जादूइ शतक सफल हो जाता, और अगर ऐसा हो जाता तो फिर मीडिया में ये खबर नही बन पाती कि सचीन मैच जीताऊ नही हैं । वैसे भी हम टीम इंडिया हैं, और हमारे पास पावर भी है । ऐसे में क्यू मेहमान को परेशान करें । गोहाटी में देख लेंगे । लेकिन गोहाटी नाम ही भारतीय टीम के ज़ेहन पे छा गई । क्योकि सभी खिलाड़ी इन फिल्ड तो गो कर रहे थे पर पिच और फर्म से हटी-हटी नजर आ रहे थे । यानि गो और हटी, गोहाटी ।
टीम इंडिया शायद उस श्रण को सबसे ज्यादा इनजॉय कर रही थी, जब ट्रोफी मेहमान को दिया जा रहा था । क्योकि भारतीय संस्कार के मुताबिक अतिथी का सम्मान करना और अतिथी को खुश करना ही सबसे बड़ी जीत होती है । और आप सभी को तो ये पता भी होगा अतिथी देवो भवः ।
अब औपचारिकता शेष है, और अगर हम मैच जीत भी जाते हैं तो भी हमारे मेहमान को बुरा नही लगेगा । टीम इंडिया ।
Sunday, 8 November 2009
बने इंटरनेट यूज़र
एक ऐसा दौड़ था कि खबरो को जोड़ने के लिए संमवदीया ही जरीया हुआ करता था । और जब संमवदीया कभी भी किसी खबर को लेकर पहुचता था तो, उस खबर में वही आवेग होता था, जो मूल खबर होती थी। धिरे-धिरे पत्र पत्रकारिता का दौड़ आया और फिर समाज की मांग ने खबरों को टी.वी से जोड़ते हुये इलेक्ट्रोनिक बना दिया । जै
इंटरनेट ने तो सभी तरह के भरम को दूर कर दिया और देवताओं के संमवदीया नारद को भी पिछे छोड़ दिया है
भारत में इंटरनेट को आये एक दशक से अधिक हो चुका है। लेकिन अभी भी इंटरनेट की पहुच एक खास शहरो तक या यूँ कह सकते है कि एक खास शिक्षित वर्ग तक ही सिमटी हुई है । ऐसे में बिहार के एक छोटे से कस्वे पुपरी में ‘नीटिजन कम्प्यूटर’ ने नगरवासियों को इंटरनेट से रु-ब-रु कराया । और एक संगोष्ठी का आयोजन कर नगर के शिक्षाविदों, डॉक्टर, वकील और पत्रकारों को इंटरनेट यूज़र बनने की अपील की । मौका था ‘नीटिजन कम्प्यूटर’ के वेवसाइड लाँच का । इस मौके पर ‘नीटिजन कम्प्यूटर’ के संस्थापक निर्देशक पंकज झा ने कहा के हम तकनीक से दूर रहकर विकसित समाज की कल्पना नही कर सकते हैं । आज का युग इंटरनेट युग हो गया है इसलिए कम्प्यूटर की जानकारी सभी के लिए आवश्यक हो गया है । अगर हमें शहरो का मुकाबला करना है तो नेट ही वो एक मात्र जरिया है, जिससे हम शहरी परिवेश और शहर की गतिविधियों पर नज़र रख सकते है । पंकज झा पिछले सात वर्षों से इस संस्था को चला रहें हैं । अभी इनकी ये संस्था “विश्व कम्प्यूटर साक्षरता मिशन” से जुड़ी हुइ है ।
पंकज जी कहते है कि ग्रामिणों में कम्प्यूटर को लेकर एक भर्म बना हुआ है, की इसे अंग्रेजी जानने वाले ही पढ़ सकते हैं । और यह उच्चे तपको के लोगों की पढ़ाई हैं । पंकज झा के अनुसार इस संगोष्ठी के
बाद लोगों की राय बदली है ।
और उनकी यह संस्था आगे भी पुपरी नगर में इस तरह का आयोजन कर, लोगो को कम्प्यूटर और इंटरनेट के प्रति जागृत करती रहेगी
।
Tuesday, 22 September 2009
हिन्दी दिवस
पिछले सप्ताह (14 सितम्बर) हिन्दी दिवस के रुप में मनाया गया । देश के तमाम हिन्दी संगठन इस जद्दो-जेहद में लगे रहें के किस तरह हिन्दी को विश्व मंच पर भारत का प्रतिनिधीत्व सौपा जाय । हिन्दी के विद्धानों ने हिन्दी के प्रगति के लिए अपने विचार और सिद्धांत को लगभग सभी संचार माध्यम से जनता को रु-ब-रु कराने की कोशिश की । कईयों ने तो अपने विचार को हिन्दी के विधायो में पिरो कर प्रस्तुत किया हैं । चूँकि मैं हिन्दी से पत्रकारिता कर रहा हूँ और हिन्दी प्रदेश से हूँ इसलिए स्वत: मेरी हिन्दी से लगाव कुछ अधिक हो जाती है और मेरी भी लेखनी हिन्दी दिवस पर रुक न सकी । और इस तरह मैं प्रस्तुत करता हूँ अपनी स्वरचित कविता ................. “ हिन्दी ”
हिन्दी
हम चाहते हैं हिन्दी निशां हो
हम चाहते हैं हिन्दी कारवां हो
हम चाहते हैं हिन्दी जां हो
हम चाहते हैं हिन्दी ये जहां हो
है जन से कहना, जनमत बनाना
हिन्दी को अपनी प्रतिष्ठा दिलाना
हम भारत के हैं, नये भारत बनाना
हिन्दी भाषा जन साधारण तक पहुचाना
हम चाहते हैं हिन्दी निशां हो
हम चाहते हैं हिन्दी हिन्दुस्तान हो
कठिनाईयों से भरी रास्ता हैं
हिन्दी का अभी जो दूर्दशा चल रहा है
बहुत सोचने की ये मंथना है
भारतीय हैं हम, फिर क्यूँ इंग्लिश यहां हैं
हम चाहते हैं हिन्दी निशां हो
हम चाहते हैं हिन्दी ये जहां हो
परछाइयों में हमें न है चलना
भूल के सब कुछ, रौशन हिन्दी को है करना
आओ मिलाओं मेरे हाथ से हाथ
हिन्दी पुछेगी फिर इंग्लिश से औकाद
हम चाहते हैं हिन्दी निशां हो
हम चाहते हैं हिन्दी हिन्दुस्तान हो
ये राष्ट्रभाषा हिन्दी हमारी
सत-सत नमन हम हैं तेरे आभारी
तुम अस्मिता हो मेरे देश की
तुम पिता हो मेरे संदेश की
हम चाहते हैं हिन्दी निशां हो
हम चाहते हैं हिन्दी ये जहां हो
Sunday, 23 August 2009
नाबालिक बच्चों के खून से काँग्रेशी नेता ने मनायी राजीव गाँधी जन्मोत्सव
सामाजिक कल्याण और भारतीय राजनीति का संबंध आजादी के समय से ही है। और सभी राजनैतिक नेता अपने आप को एक सामाजिक कल्याण कर्ता मानते हैं। समाज से जुड़े मुद्दे और उससे मिलनेवाली वोट नेताओं के लिए सबसे अहम मुद्दा होता है। इस बात की प्रमाणिकता राजीव गाँधी के जन्मोत्सव पर जयपुर के निकट गाँव में देखने को मिली है।
विधायक महोदय अपने बर्चस्व को बढाने के लिए राजीव गाँधी के जन्म दिवस पे रक्तदान सिविर लगा के अपने और अपने पार्टी के लिए वाहवाही बटोरना चाहते थे, लेकिन ये कौन सा तरिका है, वाहवाही बटोरने का, जो पार्टी तथा समाज दोनों को आघात पहुचाती है ? मासुम बच्चों को प्रमाण पत्र और कई अन्य तरह के प्रलोभन देने का वादा और उसके बदले खून।
राजनीति में शायद सब जायज हो, मगर हमारे देश
के कानून में नाबालिक बच्चों से रक्तदान कराना जुर्म है। अब ऐसे में काँग्रेश के लिए यह अहम सवाल है कि, वह ऐसे विधायक के साथ किस तरह का बरताव करती है।
हमारे देश में मुद्दा हमेशा राजनीतिक गलियारों में खो जाती है। एक तरफ वो नाबालिक बच्चे हैं, जिनसे रक्तदान करवाया गया, तो दूसरी ओर विधायक जी हैं, जिन्होनें न सिर्फ इन बच्चो से रक्तदान करवाया वरन नकली
ऊर्म प्रमाण पत्र भी बना डाले। अब मुख्यमंत्री अशोक गहलोत आश्वासन देकर पल्लु झाड़ते हैं या राजनीति के शतरंज पे दूरगामी सोच के साथ कोई कारवाई करते हैं। लेकिन कुछ भी हो मासुम बच्चो के खून की भरपाई नही की जा सकती है।