Saturday, 14 May 2016

लहू के दो राज्य:- Bihar-Jharkhand

मैं ना किस्मतकार था, ना दशहत का अवतार था, ना मैंने कभी किसी की निगहबानी ली, ना ही किसी की शोहबत में गुलामी की, मैं तो बस लोकतंत्र के माथे पर बिंदी की तरह चमकता एक गैर हिमायती, गैर रसूखदार कलमकार था । मैं कागज पर आग से कलम बोता था, लिखता था मैं दर्द जमाने के और खूद लिखने से पहले खूब रोता था, मैं ना अलंकार छंदों की भाषा बोलता-लिखता था, मुझको तो बस दर्द दिखाई देता था, मैं जनमानस के आक्रोश को शब्द संस्कार देता था, मैं एक कलमकार था । 

आज ना सिर्फ मेरी हत्या हुई है, बल्कि मेरे खून से लोकतंत्र को रक्तचत्रित कर दिया गया है, लेकिन मैं उन खूंखार नादानों को समझाने के लिए श्मशान से आह्वान दे रहा हूं कि मरा तो सिर्फ मेरा शरीर है, मेरी कलम की आग की लपटे तो और तेज हो गयी है । मेरे उस कलम से अब ज्वाला फूटेगा और भस्म कर देगा लोकतंत्र के दैत्य को, जो सियासी रहनुमायी पर खुद को आका समझ बैठे हैं । मेरी हत्या पर मैं खुद गोपालदास नीरज की कविता के माध्यम से सुशासन और अच्छे दिन वाले सरकार को संदेश देना चाहता हूं ।

मैं देख रहा हूं भूख उग रही है गलियों बाजारों में
मैं देख रहा हूं ढूढ रही बेकारी कफन मजारों में
मैं देख रहा हूं दूध उगलने वाली धरती प्यासी है
मैं देख रहा हर दरवाजे पर छाई मौत उदासी है
खुद मिट जाऊंगा या यह सब सामान बदलकर छोड़ूंगा
इंसान है क्या मैं दुनिया का भगवान बदलकर छोड़ूंगा
मैं अंगारे ही गाऊंगा जब तक दिनमान न निकलेगा
आंधी खुद ही बन जाऊंगा जब तक तूफान न निकलेगा
मैं यूं ही अपने शीश रहूंगा पहने ताज कफनवाला
जब तक मेरे शव पर चढ़कर मेरा बलिदान न निकलेगा
मेरा है प्रण जब तक यह काली निशा नहीं उजियाली हो

तब तक रौशनी सकल जग को मेरे लहू की लाली हो
मैं नवयुग-निर्माता हूं रूढ़ी विधान बदल कर छोड़ूंगा
इंसान है क्या मैं दुनिया का भगवान बदलकर छोड़ूगा



मैं ना सिर्फ सीवान का राजदेव रंजन था, ना सिर्फ चतरा का इंद्रदेव यादव था । मैं तो सुशासन का प्रश्नकाल था, हूं और रहूंगा । अच्छे दिनों पर सवाल था, हूं और रहूंगा


Monday, 28 March 2016

भूख से मौत


एक-एक दाने को मोहताज हैं...
घर में चूल्हा है...लेकिन पकाने के लिए ना ही अनाज है...
एक निवाला, सच्चा सपना हो गया...
ये खाट पर सोया बुजुर्ग, मौत का अपना हो गया...
फिर भी कहते हैं, हम में मानवता वर्तमान है
बोलो भइया, क्या सचमुच में भारत महान है ?
दर्द है, बेबसी है, गुमनामी है,
मुफलिसी, मजबूरी, मौत है
ये किसी का घर है, आंगन है
चारों ओर पसरा सन्नाटा से ना समझ लेना ये मसान है
बोलो भइया क्या सचमुच में भारत महान है ?
युग है, कलयुग है
समाज, शासन, सरकार है
हां भइया इनका एक छोटा सा परिवार है
बेटा है, कमाता है
वक्त का तकाजा है
लोभ है ? पाप है ?
पैसा क्या वाकई में अभिशाप है ?
ये बुजुर्ग उस अभागे बेटे का बाप है
ऐसे समाज, शासन, सरकार पर
शर्म है, धिक्कार है, बेजान है
बोलो भइया क्या सचमुच में भारत महान है ?


                                      दरअसल भारत महान है । ये हम आप बचपन से पढ़ते, गाते और गर्व करते आए हैं । लेकिन बिहार के शेखपुरा में एक बुजुर्ग की भूख से हुई मौत के बाद भारत के महान होने पर शक पैदा करता है । क्या किसी महान देश में एक बुजुर्ग को एक निवाला नहीं मिलता है ? क्या महान देश का बेटा, अपने बाप को यतीम की तरह छोड़ सकता है ? क्या महान देश का समाज एक बुजुर्ग को कई महीनों तक पल-पल मरता देख सकता है ? बिहार के शेखपुरा के बरबीघा ऐसा ही हुआ है, जहां एक बुजुर्ग की भूख से मौत हो गयी । बेटा हरियाणा में कमाता है, और पैसे की चाहत उसे बाप से ज्यदा है ।
                                        जिसकी मौत हुई उसका नाम जागो मांझी था । जागो की पत्नी भी लकवा ग्रस्त है । जागो की जिन्दगी भले ही जैसी भी रही हो, लेकिन मरने के बाद भी जागो को कफन तक नसीब नहीं हुआ । जागो का अंतिम संस्कार करने वाला भी कोई नहीं था । हालांकि स्थानीय वार्ड पार्षद ने जागो के लिए कफन का इंतजाम किया और उसके बेटे को सूचित कर दिया । वहीं सबसे हैरत की बाद है कि जागो की मौत के बाद अब सियासत तेज हो गयी है । खुद को दलितों का पैरोकार कहने वाले केंद्रीय खाद्य मंत्री रामविलास पासवान ने जागो मांझी की मौत पर बिहार सरकार को जिम्मेदार ठहराया । उनका मानना है कि सरकार ठीक ढंग से दलितों का ख्याल नहीं रख रही है । वहीं बिहार सरकार के खाद्य मंत्री जागो की मौत को आम बता रहे हैं । उनका मानना है कि जागो बीमारी से मरा है । बहरहाल सवाल वही है कि क्या वाकई हमारा देश महान है ।

कुछ निम्नलिखित सवाल भी प्रासांगिक है ।

भूख से मौत पर सियासत ?
मुफलिसी, मजबूरी, मौत बन गया है सियासी मुद्दा ?
क्या संवदेनहीन हो गया है हमारा समाज, शासन और सरकार ?
क्या जागो मांझी की मौत के बाद जागा है सियासतदां ?
मौत के बाद जांच का क्या मतलब ?
क्या जागो मांझी की मौत के बाद बदलेगी तस्वीर ?
क्या गरीबी को भुनाने में लगे हैं सियासतदां ?
क्या गरीबी, भुखमरी सिर्फ मुद्दे बन कर रह गए हैं ?
क्यों मौत से पहले महीनों तक कोई नहीं था सुध लेनेवाला ?
क्या जागो की मौत फिल्मी नथ्था की तरह हो गया है ?
वोट के लिए फिल्मी नथ्था को मारने पर उतारू थी राजनीतिक पार्टियां ?
केंद्रीय खाद्य मंत्री रामविलास पासवान अब तक कहां थे ?
क्या बिहार के सभी गरीबों को मिल रहा है सरकारी अनुदान ?
क्या सभी गरीबों के पहुंच में है खाद्य सुरक्षा अधिनियम ?
क्या खाद्य डीलरों का भ्रष्टाचार भूख दूर करने में है मुख्य बाधा ?
क्या सरकार के पास भुखमरी से लड़ने के लिए नहीं है कोई तंत्र और योजना ?

Monday, 14 March 2016

बड़बोली सियासत !

देश को इन दिनों सुलगाने की कोशिश की जा रही है । देश में ऐसे मुद्दों को हवा दिया जा रहा है, जिससे आम लोगों के मानस पर बुरा असर पड़े और फिर ऐसे ही आम लोगों को हथियार बनाकर राजनीति की लौ जलाई जाए । देश में कई ज्वलंत मुद्दें हैं, जिन पर सियादतदां चुपी साधे हुए हैं । गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, भुखमरी, किसानों की हत्या, जैसे कई जमीनी मुद्दे हैं, जहां देश हांफ रहा है, और हमारे सियासतदां,  देश को इन तमाम मुद्दों से भटकाने में मशगूल हैं । बड़बोलापन और बेतुके बयानों का मानों जैसे बहार आ गया हो । सियासतदां एक शिगूफा छोड़ते हैं, और पूरा देश उनके शिगूफा पर मंथन करने लगता है । आरोप-प्रत्यारोपों की लड़ाई शुरू हो जाती है । इतना ही नहीं, संसद में ऐसे शिगूफों पर बहस होती है, हंगामा होता है, कार्य स्थगन तक करना पड़ता है । ताजा मामला कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद से जुड़ा है, जिन पर आरोप है कि उन्होंने संघ की तुलना आतंकी संगठन ISIS से की है । संघ का विरोध IS जैसे आतंकी संगठन से करने का मतलब क्या होता है ? जाहिर सी बात है, ये बीजेपी के लिए बर्दाश्त करना मुश्किल था । गुलाम नबी के इस बयान को लेकर राज्यसभा में बीजेपी सांसदों ने जमकर हंगामा किया । बीजेपी सांसद मुख्तार अब्बास नकवी ने कांग्रेस से इस बयानबाजी पर माफी मांगने की मांग की । ऐसे में राज्यसभा में हंगामे के बीच गुलाम नबी आजाद ने कहा कि अगर उनके भाषण में कुछ भी गलत हो तो मेरे खिलाफ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव ला सकते हैं । वहीं AIMIM के नेता असुउद्दीन ओवैसी ने भी विवादित बयान दिया है । उन्होंने कहा कि मैं भारत माता की जय नहीं कहूंगा, गर्दन पर कोई छूरी रख दे तब भी नहीं कहूंगा ।  देश में पहले से ही सौहार्द्र, जाति, आरक्षण जैसे जटिल मुद्दे मुंह बांये है, और अब संघ की तुलना IS से करने का मामला तुल पकड़ रहा है । ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सियासतदां आक्रोश की बीज बो कर राजनीति की फसल को हरी-भरी रखते हैं । 

Saturday, 23 January 2016

तुम दिल्ली, चाहत सी मेरी

तुम दिल्ली, चाहत सी मेरी
रात रागनी, नई नवेली
सुबह ओस सी होठ तुम्हारे
हंसते ही पड़ जाए गालों पर दरारें
थोड़ी मीठी, थोड़ी मय जैसी
तुम दिल्ली, चाहत सी मेरी

तुम अलसाई, अंगड़ाई सी दिल्ली
दिन चढ़ते मुस्काई दिल्ली
शाम सांस बनकर हो चलती
धड़कन सी हो तुम मेरी दिल्ली
शहर में तुम हो, तुम सा ये शहर है
पूछूं तो इतराये दिल्ली

नैन-नक्श मिलता है सबकुछ
जैसे तुम बकबक करती हो
कुछ भी कहां सुनता है दिल्ली
तुम दिल्ली, तृप्ती सी मेरी

तुम में जिनता शोरगुल है
उतनी चंचल सी वो पागल है
आसमान से आगे का रास्ता
उसपर चलने को वो व्याकुल है

तुम जैसी ही ढीठ वो जिद्दी
प्यारी भी तुमसी है दिल्ली
दिल्ली तुमसे मैं मिलता हूं
तुमसा रौशन हो जाता हूं

मेरी इशक कहानी तुम से
होके जुदा कहां रौशन रहता हूं
ऐसी प्यास, अधूरी दिल्ली
तुम दिल्ली, चाहत सी मेरी

Saturday, 9 January 2016

सुशासन का 'गन'तंत्र

बिहार में भले ही सुशासन बाबू नीतीश कुमार की सरकार है...लेकिन लगता है कि बिहार में अपराधियों के लिए बहार है...शायद यही वजह है कि दारोगा को गोलियों से छलनी कर दी जाती है...खुलेआम हथियारों की आजमाइश होती है....और कार्रवाई के नाम पर महज आश्वसान मिलता है...


बिहार में सुशासन का राज स्थापित करने का दावा सीएम नीतीश का कतई चुनावी नहीं था....उन्होंने अपने पिछले दस साल के कार्यकाल में ये काफी हद तक साबित कर दिया था कि बिहार में जंगल राज बीते दिनों की बात है....लेकिन अब जबकि नीतीश कुमार पांचवीं बार सत्तासीन हुए हैं...तो उनके सामने सुशासन के राज को कायम रखने की सबसे बड़ी चुनौती आन पड़ी है....एक के बाद एक बिहार में आपराधिक वारदातों ने नीतीश के राज पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है....सांस्कृतिक धरोहर से भरपूर वैशाली में दहशत की आग आसमान छू रही है...जी हां....क्योंकि हाजीपुर सदर थाना क्षेत्र के मनुआ में सड़क किनारे चौर में ASI अशोक कुमार यादव को गोलियों से छलनी कर दी जाती है...आरोपी एएसआई का पिस्टल लेकर फरार हो जाता है....और किसी को भनक तक नहीं लगता...एएसआई अशोक कुमार वैशाली के दारोगा थे...अब सोचिये...अगर दारोगा बाबू की सरेराह हत्या कर दी जाए...तो सुशासन के राज पर सवाल उठना लाजिमी है....

शोहदों के सर पर किसका हाथ ?

जी हां...ये सवाल भी सुशासन बाबू नीतीश कुमार से की जानी चाहिए कि आखिर शोहदें किसके शह पर वारदातों को बेखौफ होकर अंजाम दे रहे हैं....नीतीश बाबू ऐसी वारदातों पर गौर करना चाहिए...कैसे शोहदें हाथों को लहराते ... हेला बाजार के निजी क्लीनिक पर फायरिंग करते हैं....बेखौफी की इंतहां यहीं नहीं रुकती...अपराधी एक के बाद एक 12 राउंड फायरिंग करता है....बड़े इत्मीनान से क्लीनिक में घुसता है...धमकी देता है और फिर बड़ी बेफिक्री से बाहर निकल...फरार हो जाता है...

पुलिस महकमा हर वारदात के बाद, जो करती और कहती है...वही हाजीपुर के इन दोनों वारदातों के बाद,  कही और की जा रही है....बहरहाल ये वारदातें के सामने से जनता अब पूछना चाह रही है...क्या इसे सुशासन राज कहते हैं...या फिर बिहार में 'गन' तंत्र की स्थापना हो गयी है...
 


मैं पलामू की गंगा हूं

एक नदी के ह्रदय से अगर कराह की आवाज निकले....एक नदी अगर अपनी कलकलाहट को छोड़... मौन हो जाये....एक नदी की आत्मा को जब समाज दूषित करने लगे...तो उस नदी के दर्द को समझना जरूरी है....तो पलामू की गंगा...यानी कोयल नदी की कहानी



मैं पलामू की गंगा हूं....मुझे यहां के लोग कोयल नदी के नाम से जानते हैं....मैं अपनी सुनदरता, स्वच्छता, अविरलता के लिए दशकों तक चर्चित रही...मैं समाज को जीवन...प्रकृति को सौन्दर्य...और राज्य को समृद्धि प्रदान करती हूं...लेकिन आज मेरे स्वछंदता पर सवाल है...मेरी अविरलता का अस्तित्व खत्म हो रहा है...मैं खुद अपनी सुनदरता को तरस रही हूं...राज्य व्यवस्था मुझे कूड़े कचरों की वाहिनी बनाने पर तुली है...लेकिन फिर भी मैं अपने भाग्य पर रोना नहीं चाहती हूं....मैं सत्तासीनों को याद दिलाना चाहती हूं कि ... मैं जीवन हूं....और मेरे अस्तित्व से खिलवाड़ तुम्हारा नाश का कारण बन सकता है...इसलिए शासकों, अपनी निन्द्रा से उठो....प्रशासन लापरवाही की हदों को पहचानों और लोगों अपनी मानवता को टटोलो...नहीं तो ऐसा ना हो कि मैं...जीवनदायनी नदी...हमेशा के लिए लुप्त हो जाऊं....क्योंकि सरकार से लेकर जनता तक सभी को पता है कि मेरे पर लाखों आबादी निर्भर है...सिंचाई से लेकर पीने के पानी तक के लिए प्रतिदिन लाखों लोगों का जीवन का आधार हूं....मैं खुद अब सरकार और प्रशासन से अपने अस्तित्व को बनाये रखने की गुहार कर रही हूं...मुझे कूड़े के ढेर...बेतरतीब गंदरी के अंबार से बचा लो....

देश की बिडंवना है कि प्रधानमंत्री और उनके मंत्री स्वच्छता अभियान चलाते हैं...पूरे विश्व में वाहवाही लूटी जाती है...लेकिन परिणाम मेरी तस्वीर है....मुझे लेकर राजनीतिक पार्टियां राजनीति करती हैं...एक  मुझे अविरल और स्वच्छ बनाने का दावा करती है...तो दूसरा मुझे मुद्दा बना कर सरकार को कोसने का.... 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पलामू की जनता को पानी की समस्या से निजात दिलाने का दावा किया था...लेकिन मुझे प्रतिदिन अभी भी दूषित किया जा रहा है....मैं भले शिकायत कितनी भी कर लूं...लेकिन सरकार है कि अपने अभियान को सफल मानकर खुद पीठ थपथपा रही है....मेरे दिल से निकल रही कराह को अगर सरकार सुन ले तो मुझ पर बड़ा उपकार होगा....मैं गंगा बहती हूं क्यों ?