Tuesday, 22 May 2012

पत्थरों का क्या कसूर

पत्थरों का क्या कसूर...
वो तो वजूद के लिए तड़पता है...
साथ होने से चट्टान की शक्ल...
और जुदा होने से रेत बनकर मिट्टी में मिल जाता है...

शायद मैं भी वो पत्थर हूं...
मुझे भी अपनी वजूद तलाशनी है...
पर मुझमें तो जान है, ख्वाहिशें है, संवेदनाएं हैं...
तो क्या वही मेरी शक्ल है...

ये इतना आसान नहीं...
इससे इत्तेफाक कर लेना...
तो क्या अपने व्यक्तित्व के पहचान के लिए...
करनी होगी खोज मुझे...

अपने ही नाम रौशन की सार्थकता को लेकर मंथन करने से उपजे शब्द...

Wednesday, 16 May 2012

चांद के हमसफर रात

रात की चक्काचौंध से बेखबर था मैं...
क्योंकि सिर्फ उजालों की बात होती थी...
अंधेरे को तो दिेये-बिजली से मिटाता रहा हूं...
कभी टिमटिमाते सितारों को देखने की कोशिश नहीं की ...

आज जब रात की पनाह में हूं....
तो इसके रोशनी, इसके मोहब्बत को जाना हूं....
आज इस रात में रौशन है, एक ख्वाब एक सपना...
जो सिर्फ रात के सहारे पल रहा है...
सुबह ना जाने क्या होगा...

अज़िब हलचल है...
रात के इस सादापन में ...
जहां भूलाया तो सब जा सकता है...
पर ख्वाब का गुल, इसी के दरिचे में उगते हैं...

चांद के हमसफर रात...
अपनी चक्काचौंध से यूंहीं बेखबर रख मुझे...
क्योंकि मुक्कमल शुकूंन का वजूद है तु...

Saturday, 7 January 2012

तुम इतने निर्दयी कैसे

तुम इतने निर्दयी कैसे
 
मेरे अँसुवन नैनों के नीर
 
दोनों मेरे हो के भी 

सावन मोती बहतें हैं 

निश्छल ह्रदय

 व्याकुल मन मेरा

प्रीत की आस लगाये था

तुम मधुमास 

बसंत तुम फागुन 

सरसों फूल सुनहरी सी 

ज्येष्ठ दोपहरी आग सा झुलसा 

नियत तुम्हारी जो पढ़ ली 

कुंठित प्रेम

कलंक की भाषा 

अभिनव छवि दिखाई थी 

तुम जोवन भूख की माया 

मेरा प्रेम विहंगम सा 

रूप रतन सब तेरे तेज

मुझपे असर ना कर पाया

विचलित हूँ 

की बिसराऊँ कैसे 

पर विवस नहीं हूँ उस माया से 

यह मोह भंग में कष्ट है

लेकिन 

तुम इतने निर्दयी कैसे 

Tuesday, 13 December 2011

तेरे रास्तों का मैं रहगुजर

मेरे साथ तेरा वजूद है
या तेरे वजूद का मैं हमसफर
मेरे राह में तेरा साथ है
या तेरे रास्तों का मैं रहगुजर

मैं सोचता हूं तुम कौंन हो
खामोश इतना मौन हो
अस्तित्व हर पल तेरा भी है
फिर...
मेरे मैं ही है क्यूं तेरा ये घर

पथ हो या हो पगडंडियां
निशा चांदनी या रौशन सुबह
हर पल मेरे 'मैं' में हो
या मैं हूं तेरा दिल जिगर

मेरे साथ ही जन्में हो तुम
मेरे साथ ही तेरा अन्त है
पर अंधेरे पल में तुम
छुप जाते हो जाने कहां
मेरे लौटने की उम्मीद हो
या उम्मीद का हो कारवां



मेरे साथ तेरा वजूद है
या तेरे वजूद का मैं हमसफर
मेरे राह में तेरा साथ है
या तेरे रास्तों का मैं रहगुजर

Friday, 2 December 2011

गुजरे पल की कसक

यूँ सोचता हूँ ..
कि पल जो गुजरतें हैं
वो मेरे थे कभी
            अब भी आता हुआ पल
            मेरा ही है
फिर ...
क्यूँ तलाशता हूँ
गुजरे पल को अक्सर
                   उस फिजा को
                   उस महक को
                   उस रवानगी को
                   जो हमने बनाई थी
ये बात, उफ़ ये बात 
बीतते पल के साथ महसूस होती  है  
कि पल-पल की खासियत है अपनी 
                            मगर फिर भी ...  
गुजरे पल की कसक  
आने वाले पल से ज्यादा होती   है

Wednesday, 23 November 2011

ये मुस्कुराहट तो वो नही

ये तन्हाई कितनी प्यारी है

शायद मेरे महबूब से भी ज्यादा


                   ये ख़ामोशी कितना कुछ कहता है

                   शायद मेरा महबूब भी जो ना कह सका
इस आवारगी में भी कितना सुकून है

शायद सादगी जो ना कर सका
                   ये मुस्कुराहट तो वो नही

                   जिसके खिलते ही लव गुलाब बनते थे
ये आह्ट तो वो नही

जिसके सुनते ही दिल में चिराग चलते थे

                   ये तस्वीर बनावटी है
या फिर ...

                  बनावटीपन ही तम्हारी छवि है

Saturday, 12 November 2011

दिल की आवारगी ना पूछों



इस दिल की आवारगी ना पूछों
उनकी ऑखों के इनायत ब्यां करने होगें
रौशन हुआ ये नहीं यूहीं
उनकी ऑखों के मदहोशी जाया करने होगें
इस दिल की आवरगी ना पूछों
उनकी ऑखों के इनायत ब्यां करने होगें
मुकम्मल जिन्दगी की ना चाह थी
ना ही ख्वाहिशों का कोई दरिचा
ब्यार-ए-इश्क उनकी ऑखों से यूं चला
आवरे दिल में भी
मोहब्बत का धूआं सुगलने लगा
सुलगते इस जलन की बेकरारी ना पूछों
महकते उनके आंचल को ब्यार बनने होगें
इस दिल की आवरगी ना पूछों
उनकी ऑखों के इनायत ब्यां करने होगें
अज़ीब कसमाकस है
प्यारी सी तड़प और दर्द के बीच
जो रहता रात-दिन है
पर समझ पाता नहीं हूं मैं
इस नासमझी का मतलब ना पूछों
उनकी ऑखों के हया होगें ये
इस दिल की आवारगी ना पूछों
उनकी ऑखों के इनायत ब्यां करने होगें
यूहीं इत्तेफ़ाक फिर अचानक मिल जाये वो
कि रौशन चांद कर देगा उन ऑखों को
नया मौसम वो होगा गुलशन की गवाही में
सजी-सवरी फ़िज़ा होगी, हवा की बाहों से
मगर ये आलम ना पूछों
उनकी ऑखों के इंतजार को जवां करने होगें
इस दिल की आवारगी ना पूछों
उनकी ऑखों के इनायत ब्यां करने होगें