Thursday, 27 February 2014

प्रयोग

जब कोई खड़ा होता है, तो वह परंपरा का निर्वहन करता है । लेकिन प्रगति तो चलने से होता है । ऐसे में परंपरा का निर्वहन करना और फिर प्रगति को गति देना दोनों एक साथ करना होता है । प्रगति के पथ पर चलने के लिए प्रयोग का सहारा लेना होता है । बिना प्रयोग के विकास की अवधारणा नहीं रखी जा सकती है । शायद यही वज़ह है कि ईश्वर ने मनुष्य को दो पांव दिए । जिससे वह परंपरा और प्रगति दोनों को साथ लेकर आगे बढ़ सके । एक उदाहरण से इस बात को समझा जा सकता है – जब हम खड़े होते हैं तो परंपरा का निर्वहन करते हैं...लेकिन जब हमारा एक पांव उठता है, तो हम प्रयोग करते हैं और एक पांव को ज़मीन पर स्थिर रखे हुए, परंपरा का निर्वहन भी करते हैं । ऐसी स्तिथि में विकास का एक पूरा समीकरण तैयार होता है । फिर देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस अपने को परंपरा का दुहाई देकर क्यों खुद को समेटने का काम कर रही है ।  17 जनवरी को एआईसीसी की बैठक में कांग्रेस पीएम उम्मीदवार के लिए माथा-पच्ची करने बैठी, लेकिन कांग्रेस के रणनीतिकारों ने परंपरा का दूहाई देते हुए पीएम उम्मीदवार की घोषणा नहीं की । ये शायद कांग्रेस के लिए गर्व की बात हो सकती है, लेकिन देश कांग्रेस से पीएम उम्मीदवार का फेस देखना चाहता था । दरअसल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर कैबिनेट मंत्री और कांग्रेस के कई मुख्यमंत्री राहुल गांधी को पीएम बनना देखना चाहते हैं और इसके लिए उन्होंने सार्वजनिक मंच पर कई बार ऐलान भी किया है, फिर ऐसी कौन सी मजबूरी है, जिसकी वज़ह से कांग्रेस ने राहुल गांधी को पीएम पद के लिए प्रोजेक्ट नहीं किया । गौरतलब है कि कांग्रेस 2012 के चार विधानसभा चुनाव में अपना कुनबा बचाने में असफल रही, जबकि शीला दीक्षित से लेकर अशोक गहलोत जैसे कद्दावर मुख्यमंत्री चुनाव का नेतृत्व कर रहे थे । ऐसे में ये माना जाए कि कांग्रेस राहुल गांधी को बचाने के लिए प्रयोग के नियम को ख़ारिज कर रही है या कांग्रेस ये मान चुकी है कि 2014 का लोकसभा चुनाव उसके पक्ष में नहीं होने वाला है । सवाल कई हैं, लिहाजा जो सबसे अहम सवाल है कि क्या कांग्रेस परंपरा के ढ़ाचा को देश पर थोपना चाहती है ? क्या मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल में विकास गति के थमने की वज़ह कांग्रेस की नीतियों का परिणाम है ? स्पष्ट तौर से देखा जाए तो कांग्रेस पिछले दस सालों में विकास के लिए कोई व्यापक नीति देश को देने में असफल रही है । नतीजा साफ है, अटल बिहारी वाजपेयी के समय में देश 8 फीसदी के ग्रौथ रेट से दुनिया में रौशन हो रहा था, लेकिन अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल ने देश के विकास के गणित को घटाव की दिशा में मोड़ दिया । लिहाजा 2004-2009 यानी पहले कार्यकाल में विकास दर 5 से 6 के आस-पास रही तो दूसरे कार्यकाल में 4 पर आकर सिमट चुकी है । देश एक बार फिर चुनाव के मुहाने पर है और सियासत में भले ही कांग्रेस परंपरा को तरहीज दे रही हो, लेकिन वोटर इस बार प्रयोगात्मक रूख अख्तियार किए हुए हैं । लिहाजा माना जा सकता है कि लगातार दो सत्ता का मैदान जीतनेवाली कांग्रेस इस बार मैदान में उतरने से ही डर रही है । 

Tuesday, 4 February 2014

हरियाणा कांग्रेस में हलचल



पहले फूट अब मोहभंगदरअसल हरियाणा कांग्रेस में पहले मनमुटाव का दौड़ चलता है, और अब पार्टी से कांग्रेस नेताओं का मोहभंग होना शुरू हो गया है, और इस कड़ी में कई बड़े नेता कांग्रेस का दामन छोड़ चुके हैं । लोकसभा चुनाव की तैयारियों में सभी पार्टियां जोर-शोर से जुट गई हैं, लेकिन कांग्रेस के लिए मुश्किलें थमने का नाम ही नहीं ले रही हैं । पहले तो पार्टी के नेताओं में मनमुटाव सामने आता है, और अब स्थिती यहां तक पहुंच गई है कि पार्टी के बड़े नेताओं का अब पार्टी से ही मोहभंग होने लगा है ।
                      राव इंद्रजीत सिंह, अतर सिंह सैनी, मांगेराम गुप्ता, शांति राठी, हरि सिंह और अब सुभाष बत्रा, ये कांग्रेस के उन नेताओं की फेहरिस्त है, जिनका कांग्रेस से मोहभंग हो गया है । कभी कांग्रेस पार्टी के लिए जीत का मुकद्दर बने इन नेताओं ने कांग्रेस की नींव हिला कर रख दी है । दक्षिण हरियाणा में राव इंद्रजीत का बोलबाला है, तो रोहतक के पंजाबी बाहुल्य वोटरों पर सुभाष बत्रा की पकड़ है, लेकिन कांग्रेस में चल रहे मनमुटाव अब खुलकर सामने आने लगे हैं । मुख्यमंत्री हुड्डा-सैलजा प्रकरण के बाद पार्टी ने जरूर इसपर नकेल कसनी चाही लेकिन सुभाष बत्रा तो खुलकर कांग्रेस से मोहभंग होने की बात कह रहे हैं और 2 मार्च को पार्टी छोड़ने का एलान भी कर दिए हैं ।   

दरअसल आजकल कांग्रेस के विज्ञापन में राहुल गांधी राजनीति नहीं काजनीति की बात कहते नज़र आ रहे हैं, लेकिन हरियाणा कांग्रेस में तो मनमुटाव, मोहभंग और फूट की राजनीति को साफ तौर पर देखा जा सकता है । बहरहाल कांग्रेस को राजनीति और काजनीति के अंतर को पाटने से ज्यादा फूटनीति पर लगाम लगाने की जरूरत है ।

Monday, 3 February 2014

विकल्प की राजनीति

विकल्प की राजनीति को एक वैचारिक मंच के जरिए ही देश में फैलाया जा सकता है । दरअसल देश युवा है, युवाओं की भागीदारी इस देश में सबसे ज्यादा है । ऐसे में नई सोच और नये विचार के साथ राजनीतिक क्रांति का आगाज करना देश और समाज दोनों के हित में है । लिहाजा समाज के साथ जुड़कर लोगों की जरूरतों को अपने आंखों से देखने और उनके दुख पर अपने कंधे का सहारा देने वाले लोगों को एकजुट होकर इस विकल्प में खाली पड़ी जगह को भरना होगा । 

देश पिछले 6 दशक से विकल्प की राजनीति की तलाश करती रही है । कई आंदोलन हुए और कई वैकल्पिक पार्टियां देश की राजनीति में दस्तक देती रही, लेकिन वैक्लपिक पार्टियां अपने वैचारिक सिद्धांत दम तोड़ती रही है । आम आदमी पार्टी भष्ट्राचार विरोधी विचार से उभरी लेकिन आप की वैचारिक सिद्धांत भी दम तोड़ दी है । दरअसल चुनावी राजनीति में व्यवहारिक्ता और दिखावे के दबाव में विचारधारा हमेशा नेपथ्य में जाती रही है । देश में वैकल्पिक पार्टियां तो बहुत आईं लेकिन मुख्यधारा की राजनीति से अलग वैकल्पिक राजनीति कोई नहीं दे पाया, जिसकी इस देश को हमेशा से दरकार रही । वैकल्पिक राजनीति विचारधारा के फैलाव से पनपती है वोटों के पैमाने से तो वैकल्पिक पार्टी भर निकलती है । आप ने अपनी वैचारिक नींव पक्की करने या उम्मीदवार को विचारधारा के मापदंड पर परखे बिना उसकी ऊपरी छवि को अपना मुख्य बिंदु बनाया । छवि को विचार से ऊपर रखने से नींव पक्की नहीं होती है और पार्टी में टिकाऊपन नहीं होता है । भ्रष्टाचार की मुखालफत के लिए एक वैकल्पिक पार्टी भर बना लेने से वैकल्पिक राजनीति नहीं आती । वैकल्पिक राजनीति में वोट तो सिर्फ एक अंग भर है, बाकी ढांचा तो वह मूल्यों पर आधारित होगा । वैकल्पिक राजनीति का मूलमंत्र है विचारपरक सरकार जो सियासी आडंबरों को तोड़े । यह भी सही है कि पार्टी के अंदर एक व्यक्ति की प्रसिद्धि पार्टी को आगे बढ़ाने में मदद देती है, लेकिन समय के साथ में व्यक्ति प्रमुख और पार्टी गौण हो जाती है । फिर लोग पार्टी को उसकी विचारधारा से नहीं, नेता के नाम से जानते हैं । मुलायम, लालू, मायावती की तरह आप संयोजक केजरीवाल भी परंपरागत रास्ते पर हैं । बदलाव की राजनीति में हमें दिखावे के दबाव से बाहर आकर विचारधारा पर ध्यान देना होगा, और ये तभी संभव होगा जब तमाम सामाजिक आंदोलनों में सक्रीय लोग एकजुट हों, मुद्दों के आधार पर । जिस पार्टी के बैनर तले ये सामाजिक कार्यकर्ता इक्कठे हों वहां अगुआ और अगुआई व्यक्ति की नहीं विचार की हो ।

Saturday, 4 January 2014

बेवफाई बेहतर है बेइमानी से

नये शहर में रौशन आया तो लगा नया सवेरा होगा....लेकिन ये तो वही सुबह है । हल्की-हल्की किरणों के साथ जागता सुरज....और मध्यम होते शाम में रात की आगोश में सोता सुरज....रात भी वही है, चॉद भी वही है, सितारों की चमक और ख्वाबों का जहां भी वही है । फिर क्यूं इतना बनावटीपन है इस शहर में ?
मैं बात कर रहा हुं दिल्ली की । दिल्ली में बहुत लोगों से जान पहचान हुई । कुछ तो कॉलेज में और कुछ कॉलेज से बाहर । कोई खास बनना चाहा और शायद इसमें वो सफल भी हुआ... लेकिन खास का मतलब यहां सिर्फ उसके लिए जुगाड़ होता है । जुगाड़ से मतलब है रिश्तों में मुनाफे का हिसाब । ये मुनाफा कई तरह के होते हैं । अगर आप इस तरह के मुनाफे से वाकिफ़ हैं तो शायद मेरे कहने का मतलब समझ पा रहे होंगें । खैर रिश्तों में हिसाब-किताब करना ही बेइमानी है ।
शायद यही वज़ह है कि बेवफाई बेहतर है बेइमानी से....और हम तो ये भी मानते हैं कि “ अच्छा हुआ सनम कि...मैं बेवफा हो गया, वफादार तो कुत्ते हुआ करते हैं ’’
कितने वफादार कुत्ते को तो मैंने भी देखा है । लेकिन क्या भौंकने भर से वफादारी होती है ? नही ना.........
क्षणिक भर का सुख बहुत दुखदायी होता है । ये जानते हुए भी क्षण भंगुर संसार में रम जाना कितना आश्चर्यजनक है । नये शहर में पुरानी बातें अजीब लगती है । पर हमें ये मान के चलना चाहिए कि शहर कोई सा भी हो मनुष्य का स्वभाव एक सा ही होता है । जिंदगी के राह चलते-चलते एक रौशन ख्वाब से टकरा गया था मैं । मौजो के इस सफर में उफान सा छा जाता है, जब उस हंसी पल में गोते लगाता हुं । सफर के इस हकीकत को अनचाहे ही कोई समझा गया था मुझे । शायद यकीं था उसे खुद पे इतना मेरा सफर था लम्बा जितना ।

“उजाले अपनी यादों का साथ ही रहने देना
जाने किस गली में जिंदगी की शाम ढ़ल जाए”


ये अल्फ़ाज नही मुकमल्ल एक कहानी है । वो रौशन ख़्वाब यही अल्फ़ाज बनके मेरे ज़ेहन में आज भी अभिनव है । लेकिन जिंदगी के इस अनजाने डगर में, मैं यूहीं चला जा रहा हूं । ना रास्तों का इल्म है, ना मंजील की ख़बर । गुमनामी के इस जहां में हस्तें-मुस्कुरातें, ठोकर खाते, गिरते-सम्भलतें खुद की परछाईं का पिछा किये जा रहा हुं । डर है कहीं जिंदगी के इस दौड़ में रफ्तार से समझोता ना करना पड़ जाये । फिर भी यकीं है कि इस अभिनव जगत में ये रौशन भी कभी मील का पत्थर साबित होगा ।


“अकेला चला था....अकेला चलूंगा
जिंदगी के सहारे.....ना दो साथ मेरा
कभी तो मैं....खुद को साबित करुंगा
सहज़ मिल सके....वो नही लक्ष्य मेरा
बहुत दूर है मेरे....निशां का सवेरा
अगर थक गये हो....तो तुम लौट जाओ
गगन के सितारे....देगें साथ मेरा ”

ईक बात कहूं तुमसे...

ये कैसी कसक है कि उनकी याद दूर होती नहीं

हर बार मुझे उनसे कुछ कहना होता था

सकुचा के बातों बात में हिम्मत जुटा के

मैं कहता
...
ईक बात कहूं तुमसे...

वो लव्ज़ों को ओठों पे लाके

हां में सिर हिलाती

उसकी आंखें, मेरे चेहरे के हर भंगिमा को

पढ़ने का कोशिश करता

और मैं अनजुमन ही कहता...

कुछ नहीं.
..
शायद उसे भी मालुम था

मेरे ‘कुछ नही’ का मतलब

तभी तो उसके हां में सर हिलाने

में उत्साह होता था

अभिनव की नई छटा और

उत्सव का नया रंग होता था

क्या वाकई उसे ‘कुछ नही’ का मतलब पता था ...

या यूहीं उनकी नज़दिकियों ने

मेरे दिल के साथ है फ़रेब किया

Thursday, 2 January 2014

विश्वास में 'आप' है



विधानसभा में विश्वासमत प्रस्ताव में आम आदमी पार्टी ने 32 के मुकाबले 37 मतो से विश्वासमत हासिल किया है...आप के 28 विधायकों के साथ-साथ कांग्रेस के 8 और जेडीयू के एक विधायक भी आप के समर्थन में वोट डाले...आम आदमी पार्टी ने विधानसभा में विश्वास मत हासिल कर लिया ...कांग्रेस और जेडीयू के समर्थन से आप को बहुमत हासिल हुआ...इससे पहले दिल्लीज सरकार के विश्वारस मत प्रस्ता व पर विधानसभा में गर्मागर्म बहस हुआ...दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल विश्वास मत प्रस्ताव भाषण में आम आदमी के परिभाषा से अपने भाषण की शुरुआत करते हैं..केजरीवाल राजनीति में अपराधिकरण और भ्रष्टाचार की बात करते हुए अपने और अपने विधायकों को राजनीति में आने की मजबूरियां गिनाई....कहा कि आम आदमी की समस्याओं के समाधान के किसी खास पार्टी की जिम्मेदारी नहीं बनती है..बल्कि यह एक सामुहिक जिम्मेदारी होनी चाहिए...इसमें आप...बीजेपी...कांग्रेस जैसी राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए... वहीं 2 :20 बजे बीजेपी के नेता हर्षवर्धन सरकार के विश्वास मत प्रस्ताव पर बोलने आये और जब वह बोलने पर आये तो 45 मिनट तक बोलते रहे...हर्षवर्धन अपने भाषण में आप की सरकार पर सिलसिलेवार आरोपों लगाए..बहरहाल मतदान के बाद सरकार ने विश्वासमत हासिल कर लिया है...लेकिन विपक्ष के पास 15 दिन के बाद अविश्वास प्रस्ताव लाने का विकल्प अभी खुला हुआ है...पर केजरीवाल को समर्थन करने की कांग्रेस की अपनी मजबूरी है...फिलहाल केजरीवाल सरकार के पास बहुमत का जादुई आकड़ा है...


Tuesday, 31 December 2013

चाय की दुकान पर

चाय की दुकान पर
तू जाने की जिद्द ना कर इस सुबह
मैं तेरे एहसास के कोहरा से ढ़क चुका हूं

कुछ देर तू अपनी हाथों को
रहने दे मेरे हथेलियों में
कि लग रहा है जैसे इस सर्दी में
अलाव सेक रहा हूं मैं...

कि देख ना...
चांद सुबह तक रौशन है
सुबह पर चांद का कैसा मिठा सितम है ?

यूं ना जिद्द की अटखेलियां कर
सितम करना है....
तो करने से ना डर
बस मेरी बांहों की लिवास बन जा तू
कि चाय की भी इतनी क्या पड़ी है

मेरे लहजे-मोहब्बत पर
कसूर इन बादलों का है
कि मुझे तेरी आंखों के सिवा
कुछ दिख नहीं रहा 'रौशन'

चलो... मैं आज तुम्हें
मोहब्बत के गर्म चुस्कियों से रु-ब-रु करा दूं
लवों को प्याली में रख के
सांसों का गर्म भाप पिला दूं

तड़प की चिंगारी से
आग जिस्मों में लगा दूं
महक की चाय पत्ती हो
ऐसी चाय तू कह तो बना दूं..

बस...
चाय की दुकान पर
तू जाने की जिद्द ना कर इस सुबह
मैं तेरे एहसास के कोहरा से ढ़क चुका हूं