Friday, 2 April 2010

कलम

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दोस्त की जब हो कमी
जब कोई न साथ दे
पल महीना सा लगे
और महीना चुभने लगे
छोड़ो सब चिंतन मनन
लो मुझे अपना बना
मैं तेरा बचपन का साथी
लोग मुझको कहते हैं कलम
आँसुओं के शब्द हैं मुझसे
खुशियों के लब्ज़ हैं मुझसे
तन्हाईयों में भी साथ तेरे
न छोड़ू कभी तुझको अकेले
लो मुझे अपना बना
मैं तेरा बचपन का साथी
लोग मुझको कहते हैं कलम
मुझसे ही शोहरत मिलेगी
शान, शौकत, इज्ज़त मिलेगी
मेरा साथ जिसने लिया
उसे सब कुछ मैंने दिया
लो मुझे अपना बना
मैं तेरा बचपन का साथी
लोग मुझको कहते हैं कलम

Saturday, 23 January 2010

बाजारू समाज में वेश्यावृति

समाज का सबसे महत्वपूर्ण अंग बाज़ार होता है और बाज़ार कि स्थिति व्यापार कि सार्थकता पर निर्भर करता है हमारा समाज अति प्राचीन अवधारणाओं पे चलीरही है इस समाज ने व्यापार वर्ग को जन्म दिया जिसका कालांतर में सीमा ख़त्म हो गया है अब जरुरी नही कि सोने का व्यापारी सौनर ही हो या लोहे का व्यापारी लोहार या कोई अन्य व्यापर जिसका सम्बन्ध किसी वर्ग विशेष से रहा हो , वही उसका व्यापर करता हो ऐसे मेंवेस्यावृति का व्यापर हमारे देश में किसी वर्ग विशेष से जुड़ा नहीं रहा है परन्तु इसका व्यापक इतिहास रहा है आज जिस तरह से वेश्यावृति के व्यापर के लिए एक सुझाव निकल के सामने रहा है कि इस धंधे को भी सरकारी मान्तया मिलनी चाहिए तो वाकई उन शोषित और पीड़ित महिलाओं के कल्याण के लिए उठाया गया पहला कदम माना जा सकता है। जिसे समाज शोषित तो करना चाहती है परन्तु स्वीकारना नहीं
हमारे कल के समाज और आज के समाज में बहुत अंतर है हमने विकास के कई तालो को पार कर लिया है और आधुनिकता की बुनियाद भी रख दी है पर क्या वेश्याओ की स्थिति सुदृढ़ हो पाई है ? बहुत ही संवेदनशील सवाल है की जब वेश्याओं का इस समाज में दखल एक अभिन्न अंग के रूप में रहा है तो फिर उनके स्वीकार्यता और मान्यता पे प्रश्न क्यूँ ?
कुछ बुद्धिजीवी वर्ग का मानना है कि वेश्यावृति समाज को दूषित करती है और इसकी मान्यता कतई ना दी जाय तो ऐसे में इस राय कि एक पहलु जो सामने आती है वह यह कि वेश्याएं समाज को दूषित करती है परन्तु वेश्याओं को कौन सा समज बढ़ावा दे रहा है ? एक गरीब समाज जिस समाज में बाल -विवाह होता है और संभोग के प्रति कोई लालसा नहीं रहती है या फिर एक पूंजीवादी समाज जहाँ पैसो का कोई मूल्य नहीं होता और ४० वर्ष उम्र सीमा तक कुवारा रहने कि प्रथा बढ़ रही है
हमेसा से यह कवायत चली रही है कि धोती कुरता सफ़ेद दिखे परन्तु उस सफेदी को जो साबुन बरकरार रखती है उसका महत्व कोई नहीं जानता है ठीक उसी साबुन की तरह वेश्याओं का धंधा है , जो समाज को स्वच्छ बनाये रखने में अपने महत्व को खो बैठी है
वेश्याओं के लिए भी वो सारी सुविधाएं होनी चाहिए जो किसी सामजिक व्यक्ति के लिए होता है आखिर वेश्याओं का सम्बन्ध किसी तीसरी दुनिया के लोगो के साथ नहीं होता है हम वेश्याओं के साथ बिस्तर एक करने के लिए राजी है ,परन्तु इसी बिस्तर को स्थाईत्व देने के लिए नही वेश्याएं अपने तन-
बदन- योवन से इस समाज को तृप्त करती रहे और बदले में समाज उसे रंडी , रखैल , छिनाल , वेश्या ,धंधेवाली आदि उपाधियों से ही संतुष्ट रहने की अपेक्षा करें
आख़िरकार फैसला सरकार के हाथों में है कि वे इस सुझाव को अमिलिजामा का रूप देते हैं या फुहरवादी राजनीति का

Tuesday, 12 January 2010

शिक्षा

एक भारतीय नगरिक होने का अधिकार इस देश के बच्चे को जन्म के साथ मिलता है / और १८ वर्ष की उर्म में उसे वयस्क धोषित कर संविधान में लिखे गये सभी अधिकारों का उत्तराधिकारी भी बना दिया जाता है / इस नविन उर्म मे जब उसे वयस्क धोषित किया जाता है तो उसे इस देश के लोकतान्त्रिक व्यवस्था को समझने के लिए शिक्षा की आवश्यकता महशुस होती है / परन्तु शिक्षा उससे कोशों दूर होता है / (साक्षरता , शिक्षा का पैमाना नहीं होता है ) महानगरो के नवयुवक अपवाद स्वरूप हैं / अब ऐसें में प्रश्न यह उठता है की शिक्षा के स्तर को उठाने के लिए किसी प्रयोग की आवस्यकता है क्या ? तो जबाब बिलकुल हाँ होगा / आज पूरी दुनिया वैश्विकरण की दौर से गुजर रही है और हमारे देश मे अभी तक शिक्षा को साक्षर बनाने का कुंजी माना जा रहा है / जबकि शिक्षा सिर्फ साक्षर बनाने की किंजी मात्र नहीं है वरन यह मनुष्य के जीवन स्तर सुधारने की संस्था है /
विकाशील राष्ट्र की उपाधि मिलने के बाद से भारतीय किशोरों के लिए शिक्षा सबसे अहम हैं /
जिस तरह पश्चिम के देश ने निरंतर अपने शिक्षा शैली को बदला है वह उनके जीवन स्तर को देखने से साफ स्पस्ट हो जाता है / बात बिलकुल साफ है , इस देश को भी तकनिकी शिक्षा की आवश्यकता है / तकनिकी शिक्षा की शुरुआत हमें माध्यमिक विद्यालयों से करना होगा और इस तकनिकी शिक्षा का आधार कंप्यूटर को बनाना होगा / इस तरह से इंटर विद्यालय तक आते -आते हमरे पास कम से कम ऐसें प्रोग्रम्मेर ,डेवलोपोर, डिजाईनर,आधि हो जायेंगे जो इस गओबल मार्केट मे भी अपने को स्थिर कर पाने में सक्षम होंगे /और इस तरह इन किशोरों के मदद से हम विकसित राष्ट्र के सपने को भी सच कर पाएंगे /
बरहहल जिस तरह से शिक्षा पर राजनीति हो रही है और सिर्फ बहस तक ही सिमटी हुई है /सरकार को इस नव दशक में शिक्षा के सभी खामियों को दूर करने के लिए एवं शिक्षा में प्रयोग के लिए मिशन के तहत कार्य करना होगा /
विकाशील राष्ट्र की उपाधि मिलने के बाद से भारतीय किशोरों के लिए शिक्षा सबसे अहम हैं /

Wednesday, 6 January 2010

चेतना

एक सचेतन चेतना

बुद्धि,विवेक और तृष्णा

ज्ञान के भवर में भी

रहे ब्याकुल,विचलित दोगुना

पथ के निर्माण में

अहम् के अभिमान में

रूप की पहचान में

मनुष्य के अज्ञान में

हो एक सचेतन चेतना

बुद्धि,विवेक और तृष्णा

स्मरण में लक्ष्य हो

जाग्रति प्रत्यक्ष हो

स्वप्न का भी तथ्य हो

न हो कोई विडंबना

हो एक सचेतन चेतना

बुद्धि,विवेक और तृष्णा

जीवन की क्षण भंगुरता

ब्रहमांड की है परंपरा

नव आश दीप्त, प्रदीप्त हो

रोशन सुबह का हो सिल

चिंतन

काफी कुछ खत्म हो गया
इस बीते हुए साल मे
न चाहते हुए भी,
मै हु आज इस हल में
ये आँसु ये तनहाई
अमानत है मेरी
क्यूकि मै खुद बिखर गया ,
एक अनजाने से ख्याल में
काफी कुछ खत्म हो गया
इस बीते हुए साल में
न चाहते हुए भी,
मै हु आज इस हल में
ये माना मैंने कि नया साल आएगा
क्या फर्क, लेकिन वो भी पुराना पर जायेगा
फिर आने वाले नाये साल का इंतजार होगा
और ये सफ़र तो यू ही बरक़रार होगा
मै सोचता हु ......
इन्ही बीते हुए सालो से तो सभी की जिन्दगी बनती है
ये मेरे बीते हुए साल , ये मेरे बीते हुए लम्हें तेरा मुझपे अहसान तो रहेगा
हर एक पल तुम मुझसे दूर होते हुए जाओगे
मगर तुम्हारी दी हुए याद ऐसे में मेरे पास तो रहेगा
कि अब तेरे हर वक्त का पहचान तो रहेगा
है कहानी बन गयी मेरे इस हल की
फिर लिखूंगा दास्ताँ मैं नाये साल की
कोई समझे या ना समझे
मैं समझने का कोशिश करूँगा समय की हर चल की
काफी कुछ खत्म हो गया
इस बीते हुए साल मे
न चाहते हुए भी,
मै हु आज इस हल में
ये आँसु ये तनहाई
अमानत है मेरी
क्यूकि मै खुद बिखर गया ,
एक अनजाने से ख्याल में





Saturday, 12 December 2009

प्रेम सिद्धांत

प्यार कोई खेल नही हाँ ! यह वाक्य उन लोगों को तो सावधान करती है जिन्हें कोई भी खेल खेलने में बहुत मजा आता है, और जो सोचते है कि खेल स्वास्थय और मनोरंजन के लिए आवश्यक है लेकिन ये लोग इस वाक्य (प्यार कोई खेल नही) को सुनने के बाद थोड़ा डर जाते है कि “प्यार किया नही जाता हो जाता है”। तब ऐसी स्थिति में ये लोग प्यार को कुछ इस तरह बताते है “प्यार है क्या एक रोग बुरा”
या न मानिये प्यार के तो कई रंग होते है और सभी रंग बिलकुल रंगीन होते है । जिसको जो रंग भाया वह उसी प्यार के रंग में रंगीन हो गया । मेरे मित्र का मानना है कि प्यार करना चाहिए। और जब भी उन से मुलाकात होती है तो वो मुझे कहता है, मुझे प्यार हो गया है, और उसके कहने का अंदाज कुछ इस तरह होता है “थोड़ा सा प्यार हुआ है थो़ड़ा है बाकी” जब मुझसे वो कहता है कि थोड़ा सा प्यार हुआ है, तो मैं उससे ईक बार पुछ बैढ़ा कि यार ये बता तुझे छः महिनों से थोड़ा सा प्यार हुआ है थोड़ा बाकी है, कब पुरा प्यार होगा ? तो इस सवाल को सुन के मेरे मित्र बड़े ही संजिदगी के साथ कहता है कि यार “प्यार मौसम को नही देखती है प्यार को सूखे और पतझड़,सावन और बसंत से मतलब नही है” । प्यार तो एक ऐसा पंछी है जो जंगल के हर डाल पे बैढ़ना चाहता है और तु तो पत्रकारिता कर रहा है तुझे तो मालुम होना चाहिए कि पंछी को कभी पिंजरे में कैद नही करना चाहिए । मैं उसके इस जवाब से थोड़ा सा दंग रह गया पर मेरे मित्र के प्यार सिद्धांत को समझने के लिए मैं और उत्सुक हो गया । मैंने उससे कहा कि यार तु तो बचपन से ही बहुत बड़ा बातुनी है और पत्रकारिता तो तुझे करनी चाहिये थी । तु मुझे अपने इस सिद्धांत को साफ-साफ शब्दों में बता । मेरे प्रशंसा को सुन वह हँसने लगता है और कहता है , मस्का लगाने की जरुरत नही है । मेरे प्यार सिद्धांत में पंछी मेरा दिल है और जंगल यह सारा संसार है, पेड़ की वो सारी डालियाँ प्यारी-प्यारी खुबसुरत सी हसीन लड़कियां है और पिजरे का मतलब है किसी एक लड़की से प्यार कर के बैढ़ जाना । और हर पंछो आजाद रहना चाहता है । मुझे तो हर पल प्यार होता है , हर खुबसुरत लड़की मेरे दिल पे राज करती है । इसलिए मुझे हमेशा लगता है कि “मुझे प्यार दो मुझे प्यार दो दिल बेकरार है प्यार दो, वर्षो किया मैंने इंतजार मुझे प्यार दो मुझे प्यार दो” ।
यार तु ही सोच न आँधी-तुफान और प्यार कभी बता के आता है, नही न । तो फिर..... मैं कैसे इस प्यार को रोक लू.......सबसे अजीब बात तो यह है मेरे प्यार कि की दिल को बरसात में भींगे बाल अच्छे लगते है तो सर्दियों में सहमें चाल , गर्मियों में पोछती पसीना तो बसंत में फूलो की तरह खिलती हँसी बेमिशाल । अब भला तु ही फैसला कर , दिल तो एक है पर हसिनाएँ......... गिना नही जा सकता । मैं अगर अपने दिल को खुश करने के लिए कुछ हसीनाओं से प्यार कर लेता हूँ तो इन हसीनाओं का क्या जायेगा । वैसे तुझे तो पता है “सारा जमाना हसीनो का दिवाना , जमाना कहें फिर क्यों बुरा है दिल लगाना” ।
यार मेरे दिल में बहुत प्यार है और मैं अपने प्यार को बांटना चाहता हूं । इसीलिए तो ये नायाब राश्ता मैंने अपनाया है “क्योकि प्यार नही वो चीज़ जो बाजार में मिल जाए” और “कैसे खरिदोगे तुम प्यार को , बिकता नही ये बाजार में” और वैसे भी हमारे देश में आय से अधिक संपत्ति रखना जुर्म है । तो फिर तुम मुझे ये बताओं कि प्यार से अधिक प्यार रखना जुर्म नही है । मैं प्यार के नजरो में जुर्म नही करना चाहता हुँ । इसीलिए प्यार बांटता हूँ और हरेक कुछ दिनों बाद अपनी गर्लफ्रेंड बदल लेता हूँ । प्यार को लेकर के मेरे मन में जो श्रद्धा है, लोग शायद समझ नही पाते है । मैं अपने आर्दश के रुप में भगवान श्री कृष्ण को मानता हूँ । मुझे कृष्ण की लिलाओं से सिख मिली है , मेरे दोस्त ।
प्यार की मर्यादा भंग न हो, इसीलिए मैं अलग-अलग लड़कियों से प्यार करता हूँ क्योकि “प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो” ।
इसी बीच वह कहता है कि अब जब तुम प्यार का ज्रिक कर दिया है तो पूरी सिद्धांत सुन के ही जाना । आओ बैठ के चाय पीते है । क्योकि चाय के चुस्की के साथ संवाद अच्छे निकलेगे ।
मैं अपने दोस्त के प्यार सिद्धांत की विस्तृत विवरण लय से अचंभित था । और सोच रहा था कि मेरे दोस्त ने प्यार सिद्धांत के हरेक विषय को किस तार्किक लय से प्रस्तुत कर रहा है । शायद पॉजिटिव थिंक का उदाहरण देना हो तो मेरा यह दोस्त मुझे सबसे पहले याद आयेगा ।
हूँ ! तो प्यार सिद्धांत है, है न ।
यार वाकई मैं तो अपने प्यार सिद्धांत से इस समाज को कुछ सिखाना चाहता हुँ कि प्यार के बिना समाज कितना अधुरा है, क्योकि “दूनिया में आये हो तो लव कर लो, थोड़ा सा जी लो, थोड़ा मर लो” ।
तुझे पता है मैने बजाफते एक गर्लफ्रेंड लिस्ट बना रखी है, और यह लिस्ट क्यूँ बनाई है जानना चाहेगा क्योकि इस लिस्ट के माध्यम से मैं एक सर्वे कर सकुँ, और समाज की स्थिति अभिव्यक्त कर सकुँ । यह लिस्ट मुझे अपनी पुरानी गर्लफ्रेंड से संर्पक बनाये रखने में सहायता करता है । और मैं इस लिस्ट के आधार पर उन सभी का हाल जान लेता हूँ ।
और तो और मैं तुम्हे बता दूँ, लगभगत. वो सारी लड़कियाँ जो कभी मेरी गर्लफ्रेंड हुआ करती थी, आज बॉयफ्रेंड के नाम से चिढ़ती है । इस तरह अगर मेरे प्यार सिद्धांत को दूसरी नजरिया से देखोगे तो तुम्हे लगेगा कि मैं एक समाज सुधारक का काम कर रहा हुं । समाज में बढ़ रही बॉयफ्रेंड- गर्लफ्रेंड रिवाज़ को कम रहा हूँ ।

इतना कहते कहते मेरे दोस्त की आँखें भर आई और मैं अपने दोस्त के होथो को धिरे से पकड़ के दबाया और एक अपरिभाषित लहजे में कहा कि मैं तेरे दर्द को समझ सकता हुं यार.......... तुम तो सचमुच में अपना जीवन समाज सुधार कार्य में लीन कर चुके हो ।
इस वाक्य को सुनते ही मेरा दोस्त मेरे तरफ उम्मीद की नजर के साथ देखते हुए कहता है तो चल आज से इस समाज सुधार कार्य में तु भी लग जा और “आई लव यू” का रट्टा ऐसा मार जैसे बचपन में वन, टु, थ्री का रट्टा लगाया था ।
मुझे लगा मैं फंसने वाला हूँ, सो मैंने उसी के लहजे में उस से कहा कि यार हर कोई समाज सुधारक नही हो सकता है अगर ऐसा होता तो समाज को सुधारने की जरुरत ही नही होती । मेरे दोस्त ने मुझसे तभी शिघ्रता से पुछा, तेरी गर्लफ्रेंड का क्या हाल है, तुम्हारी..........
मेरे चेहरे पे खामोशी छा गई । मुझे लगा मैं उस रेगिस्तान में हुँ जहॉ आँधी ने अचानक दम तोड़ दिया हो । और कह रहा हो “पत्थर के सनम तुझे मैंने मोहब्बत का खुदा माना” ।
तभी मेरे दोस्त ने कहा, यार तु तो सच्च में इमोशनल हो गया । मुझे पता है तेरे दिल की हालत “और इस दिल में क्या रखा है तेरा ही प्यार छुपा रखा है, चीर के देखे दिल मेरा तो तेरा ही नाम छुपा रखा है” ।
छुपाये रख अपने प्यार को, साले तुझे पता नही आज की लड़कियां दिल चीर के देखने नही आती है । उन्हें तो बस “दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिए बस एक दफा़ मेरा कहा मान लीजिए” ।
और लड़की पटाने का यह सबसे Simple तरिका है । एक दफा लड़कियों का कहना मान लो......फिर वो तुम्हारी.........समझे ......
मैं अपने दोस्त की बातों से ज़रा प्रभावित हो रहा था और मुझसे रहा नही गया । मैं उससे पुछ बैढ़ा कैसे कर पाता है ये सब ...... । इसका जबाब उसने बड़ा सटीक दिया । सब तुम्हारी कृपा है । मैंने कहा मेरी कृपा है.....तो उसने कहा तुम्हारी......मतलब मीडिया की......
मीडिया ने ही सपना दिखाया कर “लो दूनिया मुट्ठी में” मीडिया की वज़ह से ही आज “थींक हट के” है मेरी । मीडिया ने ही डेयरिंग बनाया क्योकि “डर के आगे जीत है” । मीडिया ही करता है “सीधी बात नो बकवास” । मीडिया ने ही मिंटोस लाइफ जीना सिखाया है जहाँ ये नही सोचा जाता है कि मैं कॉलेज में आ गया और अभी तक एक भी लड़की को नही पटा सका, जहाँ ये सोचा जाता है कि इतनी सारी लड़कियां कॉलेज में है और कोई भी मुझे नही पटा सकी । मीडिया ही आइडिया को तवज्जु देती है क्योकि “एक आइडिया जो बदल दे आपकी दूनिया” । कभी कहती है “पास आओ पास आओ” तो कभी एक ऐसी असंतुष्टि पैदा करती है जो “ये दिल मागें मोर” का रट्ट लगाये रहती है ।
मैं अपने दोस्त के हर नजरिये को सुन रहा था किस तरह से वो विज्ञापन के श्लोगनो को भी प्यार करने के लिए उत्तरदायी मानता है ।
मैं अपने ऐसे दोस्तों का परिचय तो करा दूं, जो इस सिद्धांत के वाहक हैं
राजेश रौशन, सोफ्टवेयर इंजीनियर हैं लेकिन प्यार इनका मुख्य विषय है ।
अभिनव अभि, पत्रकारिता कर रहें हैं लेकिन अपने नाम के अनुरुप प्यार में भी नव अभिनव करना इनका शौख़ है ।

Tuesday, 10 November 2009

लो आज मुझे कुछ मत कहना । मैं तो फर्म मैं लौट आया । शायद मैच और सिरीज हारने के बाद यही सोच रहे होंगे रविन्द्र जडेजा ।
हम भारतीय बहुत उदार होते है । और यही उदारता है कि हमने हैदराबाद मैच को भावावेश में आकर मेहमान टीम को तोहफा में दे दिया । अगर यह मैच जीत जाते तो सचीन का जादूइ शतक सफल हो जाता, और अगर ऐसा हो जाता तो फिर मीडिया में ये खबर नही बन पाती कि सचीन मैच जीताऊ नही हैं । वैसे भी हम टीम इंडिया हैं, और हमारे पास पावर भी है । ऐसे में क्यू मेहमान को परेशान करें । गोहाटी में देख लेंगे । लेकिन गोहाटी नाम ही भारतीय टीम के ज़ेहन पे छा गई । क्योकि सभी खिलाड़ी इन फिल्ड तो गो कर रहे थे पर पिच और फर्म से हटी-हटी नजर आ रहे थे । यानि गो और हटी, गोहाटी ।
टीम इंडिया शायद उस श्रण को सबसे ज्यादा इनजॉय कर रही थी, जब ट्रोफी मेहमान को दिया जा रहा था । क्योकि भारतीय संस्कार के मुताबिक अतिथी का सम्मान करना और अतिथी को खुश करना ही सबसे बड़ी जीत होती है । और आप सभी को तो ये पता भी होगा अतिथी देवो भवः ।
अब औपचारिकता शेष है, और अगर हम मैच जीत भी जाते हैं तो भी हमारे मेहमान को बुरा नही लगेगा । टीम इंडिया ।