Wednesday, 29 September 2010

प्रेम में पाप के वजूद का होना


मानसिक विकार एक प्रकार का रोग है जिसके कई वज़ह हो सकते हैं । लेकिन प्रेम अगर विकार बन जाए तो मुश्किलात की शुरुआत मानी जा सकती है । हां लोगो को इसे समझने में जरा वक्त लगेगा लेकिन वास्तविकता से इंकार नही किया जा सकता । मैं प्रेम के उस स्वरुप का चित्रण कर रहा हुं जो वास्तव में प्रेम मात्र कहा जा सकता है । परन्तु वो किसी भी संदर्भ में प्रासंगिक नही होता है । कुछ इसी तरह के माहौल से जब मैं रु-ब-रु हुआ तो थोड़ा सा अजीब लगा । अजीब इसलिए कह रहा हूं क्योकि उस माहौल को अध्ययन-अध्यापन के लिए बनाया गया है । लेकिन प्रेम रस में लीन जोड़ें अपने आस पास चल रहे गतिविधियों से मानो कोसों दूर हों । उनके हाव भाव उनके प्रेम में पाप के वजूद को निखार कर सामने ला रहा था । या यूं कहा जा सकता है कि वो यौवन के उस स्वाद को चखना चाह रहे थे जो एक मर्यादित रिश्ता बनने के बाद बनता है । कई दफा मेरे मन में ख्याल आता रहा कि आखिर ये है क्या....आधुनिकता....लेकिन आधुनिक तो मैं भी हुं फिर एक आधुनिक दूसरे आधुनिक के व्यवहार पर मंथन कतई नही कर सकता । खैर प्रेम था तो सभी चुप थे । लेकिन इन चुप्पियों में भी कई सवाल थे जो दोनो के अलग होने के बाद पुछा जाना था । और ऐसा हुआ भी .....पहला ही सवाल था.....बेटा तेरी तो एश है, मजे ले ले....लेकिन इन सभी सवाला का जवाब उसकी हंसी थी । मानो उसने कलिंग साम्राज्य जीत लिया हो । वासना की प्राप्ति सचमुच कलिंग साम्राज्य के सिंहासन पर विजय है । परन्तु वासना के चर्मोत्कर्ष पर से लौट जाना मानसिक विकार का जनक है ।

Tuesday, 21 September 2010

दोबारा बर्बाद होना चाहते है


बर्बादी बर्बाद ना करे तो बर्बाद होना बेहतर है । शायद ये अजीब लग रहा हो मगर इसमें भी सच्चाई है । बस ध्यान यह रखना चाहिये कि आप बर्बाद होने के बाद अपने आप से किस तरह का बरताव करतें हैं । हर चीज में मजा होता है बस उस बर्बादी का आनंद लेना आना चाहिए । जिसने आप को बर्बाद करना चाहा वो तभी संतुष्ट हो पायेगा जब आप अपने आप को बर्बाद शक्स मान लेगें । और यही वो वक्त होता है जब आप अपने आप को संभाल कर के बर्बादी के जश्न को मजा के साथ मनाये । और ऐसे संभले जैसे आप दोबारा बर्बाद होना चाहते है ।

Wednesday, 8 September 2010

इश्क गर एहसास है

इश्क गर एहसास है
तो फिर तुम्हें क्यूं ना होता है
इश्क गर जज़बात है
तो फिर दिल से क्यूं ये होता है

हम तो पुरानी यादों में भी जी लें
दिल है कि देखते ही धड़क लेता है
अहसान मानो मेरे दिल का मेरे महबुब
दूर हो मेरी दुनिया से फिर भी
ख्वाब तेरा ही रात-दिन क्यूं ये संजोता है

इश्क गर एहसास है
तो फिर तुम्हें क्यूं ना होता है
इश्क गर जज़बात है
तो फिर दिल से क्यूं ये होता है

Friday, 20 August 2010

आम जनता पस्त और आम जनता के नुमाइंदे मस्त


काम ढ़ेला भर और तनख्वा 50 हजार....जी हां ये उन लोगों का वेतन है जिनको देश चलाने का जिम्मा सौंपा जाता है । मंहगाई थमने के ना नहीं ले रही है । सूखा अपना प्रकोप पहले ही दिखा चुका है । कई राज्य को सूखा ग्रसित भी घोषित किया जा चुका है । लेह में बादल तो लालगंढ़ में मानव-दल....ये सभी इस देश के प्रमुख समस्या हैं । लेकिन हमारे सभी सासंद को इन सभी मुद्दों से कोई बहस नही है, उन्हें तो बस ओहदों का इस्तमाल कैसे किया जाय । इसका फिक्र रहता है । खासकर कांग्रेस की नीति समझ से परे लगती है । मंहगाई के इस आलम में सासंदो के वेतन में तीन गुना के बढ़ोतरी....ऐसा लगता है कि ये गरीबों के मुहं पे तमाचा हैं.....या फिर गरीबों के उस पंचलाइन का मजाक है जो सोनिया गांधी रट्ट लगाये रहती है....आम लोग...आम लोग....आम लोग......

सोनिया गांधी आम लोग का स्लोगन गाके के सत्ता में तो आ गई । लेकिन उनकी नीति कभी आम लोगों के हित में नही रहा । इसीका जीता-जागता उदाहरण ही सासंदो का वेतन वृद्धि बिल का पास होना है । केन्द्र सरकार को सुरेश तेन्दूलकर समिति या फिर अर्जुन सेन गुप्ता के रिपोर्ट का सूध नही है । इसलिए ही तो सासंदो के वेतन में बेतहासा वृद्धि की गई है । सासंदो को अब तनख्वाह में पचास हजार रुपया मिलेगा जो पहले 16 हजार हुआ करता था । दैनिक भत्ता भी एक हजार बढ़ा के दो हजार कर दिया गया है । वहीं कार्यालय भत्ता बीस हजार से बढ़ा के चालीस हजार रुपया कर दिया गया है । इसके अलावे इनके पेंशन को आठ हजार रुपया से बढ़ा के बीस हजार कर दिया गया है । ये तो एक संक्षिप्त आंकड़ा है जिसे रुपया के रुप में प्रस्तुत किया जा सकता है । लेकिन यात्रा...मेडिकल....आवास इसका ब्योरा भी इसी रफ्तार से बढ़ाया गया है । इसके बावजूद सासंद सब की बेरुख़ी इस बात को साफ जाहिर करता है कि उनके लिए देश का विकास कोई खास मायने नही रखता है । बल्कि निजी विकास की अहमियत उनके लिए बड़ी बात है । खासकर कांग्रेस की ढुल-मुल नीति तो अमिर को अमिर और गरीब को और गरीब की राह ही दिखाती है । बहरहाल देश मंहगाई और सूखा का मार झेल रहा है और केन्द्र सरकार जनता के प्रतिनिधियों को तीन गुना से भी अधिक वेतन देने के बिल पे मुहर लगाती है । तो शायद यही कहा जा सकता है कि केन्द्र सरकार को लोकसभा से आगे नही दिख रहा है । दरअसल केन्द्र सरकार को आम जनता से क्या लेना-देना । उन्हें तो आम जनता के प्रतिनिधियों से लेना-देना होता है । और शायद यहीं वज़ह है कि "आम जनता पस्त और आम जनता के नुमाइंदे मस्त"

Saturday, 14 August 2010

बस खिंची गई एक संकरी सी LOC है

63वें स्वतंत्रा दिवस की हार्दिक शुभकामना के साथ बहारो के बोलते शब्द...........


बहारें लौट के आई है
देखने ज़लवा तेरा
लेकिन उन्हें क्या पता
कि भारत-पाक अब एक नही
कहानी 1947 के अगस्त की है
ज़ख्म 2010 के अगस्त तक वही है
जुदा ना रुप-रंग ना रौशनी है
बस खिंची गई एक संकरी सी LOC है
ये वही पाक है
जो हिन्दुस्तान था कभी
लिया स्थान
पाकिस्तान बना लिया
मगर क्या चॉद-सितारा
जो पहचान बनी है जिसकी
कभी मांगा हक उससे
अपने यहां रहने की
बड़ा अफसोस है
इन बदमस्त हवाओं को
सरहदोसे नही रिश्ता है फिर भी
अमन और सितम दोनों में कितना फ़र्क है
महसुस करती हैं ये हवाएं एक साथ ही
कभी इन हवाओं में गुलामी की जंजीर थी
बहारों के खुशबुओं में आजादी की दुआ रहती थी
अब तो है स्वराज देश में
मैं बहार हूं
झुमना चाहता हूं
मगर लाहौर से कश्मीर आते-आते रुक जाता हूं
मुझे भी झुमने दो
बहार बनके घूमने दो
रोक दो दहशती कारनामो को
बहार लौट ना पाये इस दफ़ा
बिन देखे ज़लवा तेरा
बहारें लौट के आई है
देखने ज़लवा तेरा
लेकिन उन्हे क्या पता
कि भारत-पाक अब एक नही

Friday, 6 August 2010

मीडिया इतनी डरी सहमी क्यूं है ?

मीडिया पे हमेशा वाद-विदाद चलता रहता है । खासकर मैन स्टीम मीडिया को लेकर बहस का सिलसिला तो कभी थमता ही नही । मीडियाकर्मी अपने आप को लोकतंत्र का प्रहरी मानते हैं । उन्हे लगता है कि सवाल पुछना ही ‌उनकी फितरत है । चाहे संसद का गलियारा हो या फिर सड़क का चौक-चौराहा । मीडिया लगातार हशिये पर जा रही है । इसके पिछे एक खास वज़ह भी है । एक तो मीडिया अपने मापांक के पैमाने पे खड़ा उतरने के लिए बेकरार रहता है । जिसे मीडिया के ही शब्दो में टीआरपी कहते है । यानि टेलिविजन रैंटिंग प्वाइन। तो वहीं दूसरी तरफ बाजार और लोगो की मांग का बहाना बना कर अपने पर उठ रहे सवाल को खारिज करता है । लेकिन इस बात की वास्तविकता ये नही है । सबसे पहले तो मीडिया में अब वो जजवा नही रहा । जिस जजवा के लिए मीडिया का निर्माण किया गया । हरेक मीडिया संगठन किसी ना किसी पॉलिशी के तहत कार्य करता है । और आप को बता दू कि जब तक कोई भी कर्मचारी इन पॉलिशियों से रु-ब-रु नही हो पाता है, तब तक वह उस संगठन के लिए बेकार जैसा रहता है । खैर इन पॉलिशियों को समझने में ज्यादा समय नही लगता है । लेकिन जिस बात को लेकर आज का मंथन है वो ये कि आखिर क्यो मीडिया इतनी डरी सहमी है........ । क्यो आज मीडिया अपना दर्शक वर्ग नही बना पा रही है....... । क्यो मीडिया को क्लाइमेक्स की जरुरत है ......क्यो मीडिया के चैनल हर खबर से अपने आप को स्थापित करना चाहता है ......क्यो मीडिया को ऐसा लगता है कि ब्रेक के बाद दर्शक उनके चैनल के साथ नही बने रहेगें .....क्यो कहा जाता आप बने रहे है ब्रेक के बाद भी......इन सब के पीछे जो एक तर्क कार्य करता कि मीडिया डरी सहमी हुई है । शायद यही वजह है कि प्राइम टाइम में बड़े-बड़े चैनल फिल्मो का प्रोमोशन करता है ।और एक दर्शक वर्ग बनाना चाहता है । लेकिन इतने से ही काम नही चल पाता है तो फिर धारावाहिको क्लाइमेक्स और कॉमेडी, गीत संगीत के कार्यक्रम को समाचार का रुप देकर परोसा जाता है । मीडिया के इन चैनलो के लिए भूत भी खास तरह के न्यूज बनाता है खासकर तब जब प्रतिद्वंदी चैनल के हाथ कोइ पुखता समाचार हो । ऐसे हालात में सवाल ये उठता है कि मीडिया अपने गिरते स्तर के लिए किसको जिम्मेदार माने । उस मीडियाकर्मी को जो नये आते है और थके हारे से महसुस करते हैं । या फिर उन मीडियाकर्मीयों को जो मीडिया में कई दशक से कार्य कर रहें हैं । और कॉर्पोरेटरों के हित को देखते नीति का निर्माण करते हैं । सच्चाई ये है कि मीडिया खुद में एक ऐसा बाजार बन गया है जहां हर कुछ बेचा जाता है । खासकर समाचारों को बेचना यहां मुख्य रुप से होता है । समाचारो को बेचने के लिए एक खास अंदाज एक खास आवाज और एक खास विषय चुना जाता है । इसके कई उदाहरण भी है । जैसे किसी मुद्दा को बहस बना देना या फिर किसी बहस को मुद्दा के तौर पर पेश करना । आये दिन जिस तरह से बॉलिबु़ड वाले मीडिया चैनल को फिल्मो के प्रोमो के लिए इस्तमाल कर रहें हैं लगता है कि नही है कि ये हिन्दुस्तान का न्यूज चैनल है । न्यूज चैनल का ये MTV रुप लोगो को चैनल और इन्टरटेनमेंट चैनल के फर्क को खत्म लगभग खत्म कर दिहा है । शायद यही वजह है कि मंहगाई, अशिक्षा बेरोजगारी, भुखमरी, गरीबी, गांव-देहात , और प्रशासनिक अन्याय कभी मुख्य खबर नही बन पाती है ।

Saturday, 31 July 2010

कभी यकीं ना था...

ये ख्वाब यूं टुटेगा कभी
यकीं ना था
तेरे मेरे बीच
यूं दरमियां होगा कभी
यकीं ना था
वक्त है कि बस...
चला जा रहा है
और याद का यूं...
सिलसिला होगा
कभी यकीं ना था...
मैं मजबूर हूं
या फिर...
ये मोहब्बत है मेरी
बेवफा होके भी
जफ़ा का उम्मीद करता हूं
कभी यकीं ना था


Friday, 30 July 2010

कभी किसी रोज

कभी किसी रोज

एहसास तुमसे पुछेगा


पास आकर तुम्हारे दिल के

दिल की हर बात तुमसे पुछेगा

छुपा लेना अपने सारे जज्बातों को

क्योकि.....

बयां-ए-जज्बात ना जाने क्या कह देगें
और फिर मैं चाहता भी तो नही
कि....
यादों की तस्वीर फिर से उभरे
सांसों में फिर से वो तुफान हो
मिलने की व्याकुलता
और होंठो पे मेरा नाम हो
क्योकि.....
ये सब तो बस
एक वहम सा है
कभी किसी रोज
ये वहम टुटेगा
एहसास तुमसे पुछेगा
पास आकर तुम्हारे दिल के
दिल की हर बात तुमसे पुछेगा

कभी किसी रोज
हां कभी किसी रोज...


Saturday, 17 July 2010

बेवफाई बेहतर है बेइमानी से

नये शहर में रौशन आया तो लगा नया सवेरा होगा....लेकिन ये तो वही सुबह है । हल्की-हल्की किरणों के साथ जागता सुरज....और मध्यम होते शाम में रात की आगोश में सोता सुरज....रात भी वही है, चॉद भी वही है, सितारों की चमक और ख्वाबों का जहां भी वही है । फिर क्यूं इतना बनावटीपन है इस शहर में ?
मैं बात कर रहा हुं दिल्ली की । दिल्ली में बहुत लोगों से जान पहचान हुई । कुछ तो कॉलेज में और कुछ कॉलेज से बाहर । कोई खास बनना चाहा और शायद इसमें वो सफल भी हुआ... लेकिन खास का मतलब यहां सिर्फ उसके लिए जुगाड़ होता है । जुगाड़ से मतलब है रिश्तों में मुनाफे का हिसाब । ये मुनाफा कई तरह के होते हैं । अगर आप इस तरह के मुनाफे से वाकिफ़ हैं तो शायद मेरे कहने का मतलब समझ पा रहे होंगें । खैर रिश्तों में हिसाब-किताब करना ही बेइमानी है ।
शायद यही वज़ह है कि बेवफाई बेहतर है बेइमानी से....और हम तो ये भी मानते हैं कि “ अच्छा हुआ सनम कि...मैं बेवफा हो गया, वफादार तो कुत्ते हुआ करते हैं ’’
कितने वफादार कुत्ते को तो मैंने भी देखा है । लेकिन क्या भौंकने भर से वफादारी होती है ? नही ना.........
क्षणिक भर का सुख बहुत दुखदायी होता है । ये जानते हुए भी क्षण भंगुर संसार में रम जाना कितना आश्चर्यजनक है । नये शहर में पुरानी बातें अजीब लगती है । पर हमें ये मान के चलना चाहिए कि शहर कोई सा भी हो मनुष्य का स्वभाव एक सा ही होता है । जिंदगी के राह चलते-चलते एक रौशन ख्वाब से टकरा गया था मैं । मौजो के इस सफर में उफान सा छा जाता है, जब उस हंसी पल में गोते लगाता हुं । सफर के इस हकीकत को अनचाहे ही कोई समझा गया था मुझे । शायद यकीं था उसे खुद पे इतना मेरा सफर था लम्बा जितना ।
“उजाले अपनी यादों का साथ ही रहने देना
जाने किस गली में जिंदगी की शाम ढ़ल जाए”
ये अल्फ़ाज नही मुकमल्ल एक कहानी है । वो रौशन ख़्वाब यही अल्फ़ाज बनके मेरे ज़ेहन में आज भी अभिनव है । लेकिन जिंदगी के इस अनजाने डगर में, मैं यूहीं चला जा रहा हूं । ना रास्तों का इल्म है, ना मंजील की ख़बर । गुमनामी के इस जहां में हस्तें-मुस्कुरातें, ठोकर खाते, गिरते-सम्भलतें खुद की परछाईं का पिछा किये जा रहा हुं । डर है कहीं जिंदगी के इस दौड़ में रफ्तार से समझोता ना करना पड़ जाये । फिर भी यकीं है कि इस अभिनव जगत में ये रौशन भी कभी मील का पत्थर साबित होगा ।“अकेला चला था....अकेला चलूंगा
जिंदगी के सहारे.....ना दो साथ मेरा
कभी तो मैं....खुद को साबित करुंगा
सहज़ मिल सके....वो नही लक्ष्य मेरा
बहुत दूर है मेरे....निशां का सवेरा
अगर थक गये हो....तो तुम लौट जाओ
गगन के सितारे....देगें साथ मेरा ”

Monday, 28 June 2010

हम चले कॉलेज जब

इक तमन्ना ले के निकले
हम चले कॉलेज जब
क्या पता था दिल लुटेगा
हम चले कॉलेज जाब

चॉद रौशन हुआ
हम चले कॉलेज जब
कुछ मिला,कुछ मिल गया
हम चले कॉलेज जब

बेफ्रिक, बेशबरी का आलम
और एहसासों का दौर
कितने ख्वाबों का सफर था
हम चले कॉलेज जब

सामने आये जो तुम
हम सभंल पाये नही
खो गया शायद था कुछ
हम चले कॉलेज जब

दास्तां तो थी अधूरी
जाने कितने कारवां के
बस सफर बढ़ने लगी थी
हम चले कॉलेज जब

दिप का अगर नाम लेलू
बदनामी रौशन की होगी
लौ बन के जल लिये
हम चले कॉलेज जब

लाइब्रेरी भी सुना हुआ था
खाली-खाली लग रहा था
नजरो में कोइ बस चुका था
हम चले कॉलेज जब

साथ दोस्तो का रहता
तन्हा-तन्हा फिर क्यूं लगता
ऐसी हालत पहली दफा था
हम चले कॉलेज जब

घर से आया सोच के
पढ़ना है जी-जान से
जान से ही जी लगा था
हम चले कॉलेज जब

कुछ चुनीन्दे है फ़साने
ख्वाब और मेरे दरमिंया के
यूं ही नही लिख दिया हुं
हम चले कॉलेज जब  

इक तमन्ना ले के निकले
हम चले कॉलेज जब
क्या पता था दिल लुटेगा
हम चले कॉलेज जाब

Saturday, 19 June 2010

रावण को बिहार नसीब नही...

बिहार की राजनीति को पुरा भारत जानता है । केन्द्रीय सरकार खासकर बिहार के राजनीति को बड़े नजदीक से लेती है । आजादी के 6 दशक से लेकर अभि तक बिहार के राजनीति को केन्द्र की राजनीति से जोड़कर देखा जाता रहा है । ऐसा हो भी क्यूं ना..इस राज्य को राजनीति का आखाड़ा माना जाता है । लेकिन क्या वज़ह ऐसा रहा कि राजनीति में अपना स्थान रखने वाला बिहार कभी किसी के लिए बाजार नही बन सका । बाजार की दूर्दशा ने ही बिहार को कभी कॉरपोरेट राज्य नही बनने दिया । एक जमाने में जब झारखंड साथ हुआ करता था तो बिहार के बाजार को सिर्फ यह कह कर नाकार दिया जाता था कि कारखाना, मजदुरी के लिए होती है और मजदूर कभी बाजार नही बना सकते । शायद यही धारणा अभि तक बनी हुइ । बिहार के लोगो को रावण देखने का मौका नही मिल पाया है,या यूं कहे बिहार के लोगो को रावण दिखाना ही नही था । इसकी वजह साफ है बाजार ... बिहार में मनीरत्नम ने रावण रीलीज नही की....कोई जानना नही चाहा की ऐसा मनीरत्नम ने क्यूं किया । लेकिन एक बात जो निकल के सामने आई वोहै बिहार में सिनेमा का बाजार .... सभी जानते है कि बिहार और उत्तर प्रदेश में ही सबसे ज्यादा सिनेमा देखी जाती है । ऐसे में बिहार में रावण का रीलीज ना होना बिहार के सिनेमा घर और वहां के टिकट के रेट से संबंध रखता है । 10,20,या 30 रुपये में बिहार में आसानी से कोई भी नई सिनेमा को रीलीज के दिन ही सिनेमाघर में देखा जा सकता है । मनीरत्नम के लिहाज से रावण को 150 से 1500 वाले दर्शक की दरकार थी । जो उन्हें बिहार में नही मिल सकता था । इसलिए रावण को बिहार में रीलीज नही की गई । लेकिन जिस तरह से रावण को मुंह की खानी पड़ी उससे तो अब बिहार के वो दर्शक भी नही मिलेगें जिसे मनीरत्नम बाजार की श्रेणी में गिनते ही नही ।

Thursday, 17 June 2010

रावण की एंट्री



मनीरत्नम की रावण इस कलयुगी रामायण में कितना सफल होगा । ये तो कल १८ जुन के रीलिज के बाद ही पता चलेगा । लेकिन एक बाद तो ये साफ हो गया है कि रावण में वो नयाब चीज देखने को मिल सकता है जिसके लिए मनीरत्नम जाने जाते हैं । इस से पहले मनीरत्नम की आई फिल्म गुरु सुपरहिट रही थी । और सबसे मजेदार बात उस फिल्म ये थी कि अभिषेक उस फिल्म में अपने पुरे जीवन को जीते हैं । एक कॉरपोरेटर के पुरे समझ को मनीरत्नम ही भाव और भाषा में उतार सकते थे । बहरहाल रावण आने वाला है उत्पात मचाने नही वल्की मनोरंजन करने.....

Saturday, 12 June 2010

विज्ञापन पर राजनीति


विज्ञापन विवाद इस बार बिहार के राजनीति में तहलका मचा रहा है । बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का एक साथ विज्ञापन में नज़र आना बिहार के राजनीति में भुचाल मचा दिया है । हलांकि बिहार में भाजपा, जदयू गठबंधन सरकार है लेकिन हाल ही में आने वाला बिहार विधान सभा चुनाव इस लिहाज से ज्यादा महत्वपुर्ण है कि राजनीति की कौन सी दिशा चुना जाए । नीतीश कुमार हमेशा अपने छवी को एक शांतचित रुप देते आये हैं । लेकिन रात्रिभोज को रद्द करना और विज्ञापन पे कारवाई का फरमान साफ करता है कि वो किस कदर बिहार के चुनाव को लेते हैं । एक ओर जहां नीतीश को सबसे सफल मुख्यमंत्री माना जाता है वहीं नरेन्द्र मोदी गुजरात के विकास का सारा ठिकरा अपने उपर बाधते है । हलांकि नरेन्द्र मोदी आज जिस तरह से बिहारीयों का गुनगान कर रहें थे, उस से तो साफ होता है कि भाजपा अपनी स्थिती ओडिशा की राजनीति की तरह नही करना चाहता है । बहरहाल जिस तरह से राजनीति में विवाद परचार का साधन बनता जा रहा है । तो आने वाला बिहार चुनाल और कई तरह के विवाद को झेल सकता है । अब देखना ये है कि विपक्षी दल इस का कुछ फायदा उठाते है या फिर वो भी इसी तरह के राजनीति में शामिल हो जाते हैं ।

Friday, 11 June 2010

फुटबॉल विश्वकप के आगोश में सिमटा भारत


भारत ईक बार फिर फुटबॉल विश्वकप के आगोश में सिमटा जा रहा है। मीडिया जिस तरह से इस खेल का कवरेज कर रही है, उससे तो लगता है कि भारतीय टीम भी खेल के इस महाकुभं में शिरकत करने वाला है । लोगो का उत्साह और बाजार के रुप में आया ये एक महिने का खेल भारत के उस वर्ग का परचार कर रहा जिसे लोग इंडिया पुकरते हैं । टीवी पे फुटबॉल का खुमार शायद टीआरपी के रफ्तार को कायम रखने के लिए किया जा रहा है । लेकिन टीआरपी के आड़ में बाजार के भागीदारी को नकारा नही जा सकता । शायद यही वज़ह है कि फुटबॉल के खेल में १३३वें स्थान पे रहने वाला भारत इस खेल का कवरेज इतना बढ़-चढ़ के कर रहा है । अभी हाल ही से संपन्न हुआ हॉकी विश्वकप किसी को याद भी नही होगा, वज़ह दो है, पहला इस खेल का बाजार से दूरी और दूसरा सरकार का उदासीपन । कभी हॉकी में सर्वोच्य शिखर पर रहने वाला भारत आज दूसरे राउंड तक भी नही पहुंच पाती है । हम हमेशा मीडिया के सिरे ठेकरा बांध देते है और सरकार को इसका लाभ भी मिल जाता है । सरकार अगर राजनीति तक ही सिमित रहती है तो देश के सर्वांगिक विकास की कल्पना नही की जा सकती है । लेकिन ये इस देश की विडंबना ही है कि यहां हर चीजो पे जमके राजनीति की जाती है । आई पी एल पे हुइ राजनीति क्रिकेट के खेल को जहां शर्मशार करता है, वहीं सरकार के नीति का खुलासा भी साफ तरह से देखा जा सकता है ।फुटबॉल का ब्यार से भारतीय को बहुत कुछ सिखने की जरुरत है ।
खासकर भारत के सरकार को तो जरुर सोचना चाहिए कि आखिर वो कौन सी स्थिती है जिस कारण भारतीय फुटबॉल हाशिये पे है । खैर फुटबॉल के विश्वकप के बहाने ही अगर हम फुटबॉल से जुड़ पाते है तो भी ये फुटबॉल इंडिया के लिए अच्छा ही होगा ।

Tuesday, 8 June 2010

न्याय का अन्याय



यूनियन कार्बाइड के पूर्व प्रमुख और भोपाल गैस त्रादसी के मुख्य अभियुक्त वारेन एंडरसन भले ही अभी भी फरार हों, लेकिन केशव महिंद्रा और उनके छह साथियों को दिया गया दो साल की सज़ा लोगो के दर्द के लिहाज से महज एक मजाक सा लगता है । 26 साल के एक लम्बे इंतजार के बाद फैसला ये आयेगा शायद, दोषियों को भी नही लगा होगा । तमाम तरह के अटकलें और फिर मामूली सी सजा । जहाँ इस फैसले को लेकर भोपाल समेत सारी दुनिया अचम्भित है वही कॉर्पोरेट वल्डॅ के लिए राहत भरी खबर है । अब तो ऐसा लगने लगा है कि भोपाल गैस त्रादसी और दुनिया के सबसे बड़े औद्योगिक दूर्घटना में लोगो की जान की कीमत मशीन के किसी पार्ट में हुई खराबी की तरह आकीं गई है । जिसका मुवावज़ा महज कुछ पैसा होता है । इस तरह के सज़ा से आम लोग तो ये मानने लगे है कि आखिर सजा तो हुई ।

Friday, 2 April 2010

कलम

-->
दोस्त की जब हो कमी
जब कोई न साथ दे
पल महीना सा लगे
और महीना चुभने लगे
छोड़ो सब चिंतन मनन
लो मुझे अपना बना
मैं तेरा बचपन का साथी
लोग मुझको कहते हैं कलम
आँसुओं के शब्द हैं मुझसे
खुशियों के लब्ज़ हैं मुझसे
तन्हाईयों में भी साथ तेरे
न छोड़ू कभी तुझको अकेले
लो मुझे अपना बना
मैं तेरा बचपन का साथी
लोग मुझको कहते हैं कलम
मुझसे ही शोहरत मिलेगी
शान, शौकत, इज्ज़त मिलेगी
मेरा साथ जिसने लिया
उसे सब कुछ मैंने दिया
लो मुझे अपना बना
मैं तेरा बचपन का साथी
लोग मुझको कहते हैं कलम

Saturday, 23 January 2010

बाजारू समाज में वेश्यावृति

समाज का सबसे महत्वपूर्ण अंग बाज़ार होता है और बाज़ार कि स्थिति व्यापार कि सार्थकता पर निर्भर करता है हमारा समाज अति प्राचीन अवधारणाओं पे चलीरही है इस समाज ने व्यापार वर्ग को जन्म दिया जिसका कालांतर में सीमा ख़त्म हो गया है अब जरुरी नही कि सोने का व्यापारी सौनर ही हो या लोहे का व्यापारी लोहार या कोई अन्य व्यापर जिसका सम्बन्ध किसी वर्ग विशेष से रहा हो , वही उसका व्यापर करता हो ऐसे मेंवेस्यावृति का व्यापर हमारे देश में किसी वर्ग विशेष से जुड़ा नहीं रहा है परन्तु इसका व्यापक इतिहास रहा है आज जिस तरह से वेश्यावृति के व्यापर के लिए एक सुझाव निकल के सामने रहा है कि इस धंधे को भी सरकारी मान्तया मिलनी चाहिए तो वाकई उन शोषित और पीड़ित महिलाओं के कल्याण के लिए उठाया गया पहला कदम माना जा सकता है। जिसे समाज शोषित तो करना चाहती है परन्तु स्वीकारना नहीं
हमारे कल के समाज और आज के समाज में बहुत अंतर है हमने विकास के कई तालो को पार कर लिया है और आधुनिकता की बुनियाद भी रख दी है पर क्या वेश्याओ की स्थिति सुदृढ़ हो पाई है ? बहुत ही संवेदनशील सवाल है की जब वेश्याओं का इस समाज में दखल एक अभिन्न अंग के रूप में रहा है तो फिर उनके स्वीकार्यता और मान्यता पे प्रश्न क्यूँ ?
कुछ बुद्धिजीवी वर्ग का मानना है कि वेश्यावृति समाज को दूषित करती है और इसकी मान्यता कतई ना दी जाय तो ऐसे में इस राय कि एक पहलु जो सामने आती है वह यह कि वेश्याएं समाज को दूषित करती है परन्तु वेश्याओं को कौन सा समज बढ़ावा दे रहा है ? एक गरीब समाज जिस समाज में बाल -विवाह होता है और संभोग के प्रति कोई लालसा नहीं रहती है या फिर एक पूंजीवादी समाज जहाँ पैसो का कोई मूल्य नहीं होता और ४० वर्ष उम्र सीमा तक कुवारा रहने कि प्रथा बढ़ रही है
हमेसा से यह कवायत चली रही है कि धोती कुरता सफ़ेद दिखे परन्तु उस सफेदी को जो साबुन बरकरार रखती है उसका महत्व कोई नहीं जानता है ठीक उसी साबुन की तरह वेश्याओं का धंधा है , जो समाज को स्वच्छ बनाये रखने में अपने महत्व को खो बैठी है
वेश्याओं के लिए भी वो सारी सुविधाएं होनी चाहिए जो किसी सामजिक व्यक्ति के लिए होता है आखिर वेश्याओं का सम्बन्ध किसी तीसरी दुनिया के लोगो के साथ नहीं होता है हम वेश्याओं के साथ बिस्तर एक करने के लिए राजी है ,परन्तु इसी बिस्तर को स्थाईत्व देने के लिए नही वेश्याएं अपने तन-
बदन- योवन से इस समाज को तृप्त करती रहे और बदले में समाज उसे रंडी , रखैल , छिनाल , वेश्या ,धंधेवाली आदि उपाधियों से ही संतुष्ट रहने की अपेक्षा करें
आख़िरकार फैसला सरकार के हाथों में है कि वे इस सुझाव को अमिलिजामा का रूप देते हैं या फुहरवादी राजनीति का

Tuesday, 12 January 2010

शिक्षा

एक भारतीय नगरिक होने का अधिकार इस देश के बच्चे को जन्म के साथ मिलता है / और १८ वर्ष की उर्म में उसे वयस्क धोषित कर संविधान में लिखे गये सभी अधिकारों का उत्तराधिकारी भी बना दिया जाता है / इस नविन उर्म मे जब उसे वयस्क धोषित किया जाता है तो उसे इस देश के लोकतान्त्रिक व्यवस्था को समझने के लिए शिक्षा की आवश्यकता महशुस होती है / परन्तु शिक्षा उससे कोशों दूर होता है / (साक्षरता , शिक्षा का पैमाना नहीं होता है ) महानगरो के नवयुवक अपवाद स्वरूप हैं / अब ऐसें में प्रश्न यह उठता है की शिक्षा के स्तर को उठाने के लिए किसी प्रयोग की आवस्यकता है क्या ? तो जबाब बिलकुल हाँ होगा / आज पूरी दुनिया वैश्विकरण की दौर से गुजर रही है और हमारे देश मे अभी तक शिक्षा को साक्षर बनाने का कुंजी माना जा रहा है / जबकि शिक्षा सिर्फ साक्षर बनाने की किंजी मात्र नहीं है वरन यह मनुष्य के जीवन स्तर सुधारने की संस्था है /
विकाशील राष्ट्र की उपाधि मिलने के बाद से भारतीय किशोरों के लिए शिक्षा सबसे अहम हैं /
जिस तरह पश्चिम के देश ने निरंतर अपने शिक्षा शैली को बदला है वह उनके जीवन स्तर को देखने से साफ स्पस्ट हो जाता है / बात बिलकुल साफ है , इस देश को भी तकनिकी शिक्षा की आवश्यकता है / तकनिकी शिक्षा की शुरुआत हमें माध्यमिक विद्यालयों से करना होगा और इस तकनिकी शिक्षा का आधार कंप्यूटर को बनाना होगा / इस तरह से इंटर विद्यालय तक आते -आते हमरे पास कम से कम ऐसें प्रोग्रम्मेर ,डेवलोपोर, डिजाईनर,आधि हो जायेंगे जो इस गओबल मार्केट मे भी अपने को स्थिर कर पाने में सक्षम होंगे /और इस तरह इन किशोरों के मदद से हम विकसित राष्ट्र के सपने को भी सच कर पाएंगे /
बरहहल जिस तरह से शिक्षा पर राजनीति हो रही है और सिर्फ बहस तक ही सिमटी हुई है /सरकार को इस नव दशक में शिक्षा के सभी खामियों को दूर करने के लिए एवं शिक्षा में प्रयोग के लिए मिशन के तहत कार्य करना होगा /
विकाशील राष्ट्र की उपाधि मिलने के बाद से भारतीय किशोरों के लिए शिक्षा सबसे अहम हैं /

Wednesday, 6 January 2010

चेतना

एक सचेतन चेतना

बुद्धि,विवेक और तृष्णा

ज्ञान के भवर में भी

रहे ब्याकुल,विचलित दोगुना

पथ के निर्माण में

अहम् के अभिमान में

रूप की पहचान में

मनुष्य के अज्ञान में

हो एक सचेतन चेतना

बुद्धि,विवेक और तृष्णा

स्मरण में लक्ष्य हो

जाग्रति प्रत्यक्ष हो

स्वप्न का भी तथ्य हो

न हो कोई विडंबना

हो एक सचेतन चेतना

बुद्धि,विवेक और तृष्णा

जीवन की क्षण भंगुरता

ब्रहमांड की है परंपरा

नव आश दीप्त, प्रदीप्त हो

रोशन सुबह का हो सिल

चिंतन

काफी कुछ खत्म हो गया
इस बीते हुए साल मे
न चाहते हुए भी,
मै हु आज इस हल में
ये आँसु ये तनहाई
अमानत है मेरी
क्यूकि मै खुद बिखर गया ,
एक अनजाने से ख्याल में
काफी कुछ खत्म हो गया
इस बीते हुए साल में
न चाहते हुए भी,
मै हु आज इस हल में
ये माना मैंने कि नया साल आएगा
क्या फर्क, लेकिन वो भी पुराना पर जायेगा
फिर आने वाले नाये साल का इंतजार होगा
और ये सफ़र तो यू ही बरक़रार होगा
मै सोचता हु ......
इन्ही बीते हुए सालो से तो सभी की जिन्दगी बनती है
ये मेरे बीते हुए साल , ये मेरे बीते हुए लम्हें तेरा मुझपे अहसान तो रहेगा
हर एक पल तुम मुझसे दूर होते हुए जाओगे
मगर तुम्हारी दी हुए याद ऐसे में मेरे पास तो रहेगा
कि अब तेरे हर वक्त का पहचान तो रहेगा
है कहानी बन गयी मेरे इस हल की
फिर लिखूंगा दास्ताँ मैं नाये साल की
कोई समझे या ना समझे
मैं समझने का कोशिश करूँगा समय की हर चल की
काफी कुछ खत्म हो गया
इस बीते हुए साल मे
न चाहते हुए भी,
मै हु आज इस हल में
ये आँसु ये तनहाई
अमानत है मेरी
क्यूकि मै खुद बिखर गया ,
एक अनजाने से ख्याल में